"सफ़र" किन्हीं दिनों मैं दरिया हुआ करता था साहिल हुआ करता था एक नाव मेरे साथ सफ़र करती मेरे पास ठहरती थी
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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"हब्स" अब तो लौट आओ बीत गए दिन, मह-ओ-साल तुम इसे खेल समझती हो पस-ए-पर्दा तुम हो ना अब तो बाहर निकल आओ ऐसे कौन याद करता है रोज़ किसी का नाम तस्बीह में कौन पढ़ता है कहीं भूल न जाऊँ तुम्हें फ़क़त इतना ही याद आओ किसी रोज़ तुम्हें ख़त लिखूँगा जिस में सिर्फ़ अपना पता लिखूँगा कोई जवाब नहीं चाहिए तुम सेे बस इतना चाहिए ही तुम सेे ढूँढती हुई तुम ख़ुद आओ अब ख़ल्वत में हब्स है देखो मेरा क्या हश्र है तुम्हारा ख़ुदा का ओहदा है मेरे फ़ायदे का सौदा है तुम थोड़ा ज़क उठाने आओ मैं किस की दस्तरस में हूँ तुम्हें इल्म है हर चीज़ का तुम तो सब कुछ जानती हो तुम किस की दस्तरस में हो उस का नाम ही बताने आओ शायद ये आख़िरी नज़्म हो शायद ये आख़िरी ज़ख़्म हो शायद सब कुछ ख़त्म हो तुम्हारा आना न फ़िज़ूल हो सो यूँँ करो तुम मत आओ
Rahul
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"इंतिज़ार" जब कभी बारिश ज़मीं को छूती है मुझे याद आता है वो वक़्त जब हम दस क़दम की दूरी पर रहते थे दस क़दम की दूरी अब दो सौ दस मील में बदल गई है वो सब कुछ बदल गया है जो सोचा भी नहीं था क्या तू भी बदल गई है अगर हाँ तो उन मसाइल को समझ वक़्त रहते जिन का हल न मिला मुझे मुझे अफ़सोस भी है कि एक लफ़्ज़ भी न कहा तुझ सेे इतना डर लगता था मुझे मैं जानता हूँ मोहब्बत डरने वालों का काम नहीं है ख़बर तुझे भी है ख़बर मुझे भी है मेरी मोहब्बत नाकाम नहीं है नाकाम तो मैं हूँ दुनिया की नज़र में कच्चा घर जिस के सामने कच्ची गलियाँ तेरे शौक़ के लिए यहाँ कुछ भी नहीं है हाँ मगर ज़रूरत का सब सामान है काग़ज़, क़लम, शजर, महकती कलियाँ वो कलियाँ जिन्हें कब से तेरे एक लम्स की दरकार है वो शजर जो बूढ़ा हो गया है उस सेे कहा था कभी किसी ने प्यार तो इंतिज़ार है
Rahul
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"बहाने" क्यूँ आए हो तुम मेरी गली में गाँव में क्यूँ बैठे हो यहाँ मंदिर की छाँव में जहाँ समन के फूल हैं भीड़ है और तुम हो तुम्हारी नज़र में क्या है मेरी नज़र में तुम हो अभी तो हम-तुम मिले भी नहीं हैं अभी मैं ने तुम सेे कुछ कहा भी नहीं है और तुम हो कि उठकर जाने लगे हो कितने झूठे बहाने बनाने लगे हो तुम जा तो रहे हो मगर सुनते जाओ लौट कर जब कभी तुम वापस आओ तो ये न पूछना क्यूँ जाते हुए देखती रही तुम्हें मैं मुस्कुराते हुए
Rahul
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"मुझे नहीं मालूम" मुझे नहीं मालूम क्या आबाद करेगा ये शौक़-ए-सुख़न मुझे बर्बाद करेगा मेरा साया तो स्याह तमस है मेरा परतव आख़िर किसे रौशन करेगा ज़िंदा मख़्सूस नहीं किसी के लिए जाने के बा'द कौन याद करेगा सही कहा था लिखना छोड़ दो माना लोग पढ़ेंगे समझा कौन करेगा
Rahul
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"दस्तक" बाहर कौन है कोई भी तो नहीं ऐसा लगा जैसे किसी ने दस्तक दी देखो क्या रह गई कोई खिड़की खुली चलो चराग़ बुझा दो रखा है क़रीब ही सोने के वक़्त यहाँ आएगा कौन ही तुम जगा देना मुझे जो सुनो दस्तक कोई पानी रख लिया क्या हाँ, और दवाई भी अब मैं जो सोचती हूँ कह देते हो तुम वही झूठ कहते हैं सब चार दिन की ज़िन्दगी सत्तर बरस के हम साथ हैं आज भी
Rahul
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