nazmKuch Alfaaz

हमें जो ज़िंदगी दी गई है बरा-ए-मेहरबानी दी गई है समाअ'त छीन कर अहल ख़िरद की हमें जादू बयानी दी गई है मुझे लिखने को इक अच्छा सा उनवाँ मिरी अपनी कहानी दी गई है जो राह-ए-हक़ में जाँ देते हैं उन को हयात-ए-जावेदानी दी गई है मगर जो मौत से डरते हैं उन को वफ़ात-ए-ना-गहानी दी गई है ज़ईफ़ी में जवानी दी गई है घड़ी इक इम्तिहानी दी गई है जवानों को जो तोहफ़े में मिली है हमें वो मुँह-ज़बानी दी गई है बदल दी है किसी ने शेरवानी नई ले कर पुरानी दी गई है जवानों को मुबारक हो जवानी हमें तो नौजवानी दी गई है लगाएँगे वो आग अब भाषणों से जिन्हें जादू-बयानी दी गई है दिवाना 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' बनता न कैसे निकाह में इक दिवानी दी गई है

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"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं

Arpit Sharma

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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है

ZafarAli Memon

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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है

ZafarAli Memon

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लोग तो लोग हैं, अक्सर मज़ाक़ करते हैं वो अलग बात है- कुछ दरमियाँ नहीं, फिर भी हमें मालूम है तुम बे-वफ़ा नहीं, फिर भी सुना है- आजकल तुम बे-क़रार रहते हो और इतने, कि- शायद बेशुमार रहते हो सुना है- आदतन खाना भी छोड़ रक्खा है तुम ने घर से कहीं जाना भी छोड़ रक्खा है हाँ बेशक! हम को मिले एक अर्सा बीत गया हाँ मगर, अजनबी लोगों का भी भरोसा क्या! हमें मालूम है तुम बे-वफ़ा नहीं, फिर भी लोग तो लोग हैं, अक्सर मज़ाक़ करते हैं वो अक्सर तंज़ करते हैं कि इस ज़माने में तुम्हारी तरह कोई दूसरा कहाँ होगा? तुम्हारी रुख़ है, कि है चाँद जैसा नूर इस में जो तुझ पर मरते हैं उन का भी क्या क़ुसूर इस में बड़ा कम्बख़्त है, ये सबकी ख़बर रखता है ज़माना हर किसी हरकत पे नज़र रखता है. यहाँ लोगों की बातों का भरोसा तो नहीं, पर ये बात सच है बहर-हाल इस ज़माने में तुम्हारी तरह कोई दूसरा कहाँ होगा? ख़ैर, लोग तो लोग हैं, अक्सर मज़ाक़ करते हैं

Ravi Prakash

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"ख़्वाबों की तन्हाई" क्या तुम्हें नींद आती है? क्या तुम्हें ख़्वाब आते है? क्या तुम रातों को सो जाती हो? मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मेरी तो नींद तुम्हारी है ना मेरे तो ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई? हम्म्म, अच्छा तन्हाई क्या है? तुम नहीं जानती? हाँ, तुम तो ख़्वाब देखने वाली हो ना तुम ने मेरे कमरा भी तो नहीं देखा ये बिस्तर ये दीवारें किताबें अधूरी जली सिगरेट चाय के छींटों से भरे कप ये बेवजह शोर करता हुआ फेन ये टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक, टिक टिक टिक टिक ! ये टिक टिक करती घड़ी जो मौत के आने की ख़बर देती है ये बिस्तर के चारों तरफ़ फैला सन्नाटा ये खिंडकियों से झाँकता धूप का ख़ाली-पन ये मोबाइल जो आधे वक़्त अब बंद ही रहता है तेरे बा'द किसी से बात नहीं की मैं ने अब कोई मुझे भी कॉल नहीं करता ये मोबाइल लाश के जैसे बिस्तर पर पड़ा है किसी रोज़ इस का भी जनाज़ा उठायेंगे ख़ैर छोड़ो ये सब ये क्यूँ किसी की आँखों में ख़्वाब नहीं है क्यूँ किसी के ख़्वाबों में बस आँखें है अरे तुम भी ना! छोड़ो ये सब मैं तुम्हें क्या बता रहा था वैसे? हाँ तन्हाई! तन्हाई सुकून से बनी वो बेतरतीब शह है जो कुन की यकताई का मौजज़ा है ख़्वाबों का सन्नाटा सुना है? उस सन्नाटे को समेट कर एक पेकर में डालो तब जा कर तन्हाई बनती है, चाय से भरे ठंडे कप देखे है? हाँ, वो ठंड तन्हाई है, तुम ने सुना है परिंदों की चह-चहाहट? उन के परों का फड़-फड़ाना? क्या तुम ने बादल आते देखें हैं? क्या तुम ने देखा है केसे कोई बूँद अपने जिस्म की रूह को छोड़ कर ज़मीं की तरफ़ दौड़ी चली आती है? क्या तुम ने देखा है केसे वो बूँद ज़मीं पर गिर कर उसी की हो कर रह जाती है, तुम ख़्वाब देखती हो ना? चलो तो फिर बताओ क्या क्या देखती हों? क्या देखा है तुम ने किसी रूह से उस के दिल का निकल जाना? क्या देखा है तुम ने रक़्स करता हुआ हिज्र? क्या देखा है तुम ने क़ैस को समुंदर पर चलते? क्या देखा है तुम ने कुन के बा'द किसी का न बनना? क्या देखा है तुम ने उन हक़ीक़तों को जो हक़ीक़त से दूर है? क्या देखा है तुम ने टूटी पत्तियों का फिर से शाखों पर चले जाना? क्या देखा है तुम ने आँसुओं से आँखों का बहना? क्या देखा है तुम ने उन गुलदस्तों को जो माज़ी को समेट कर बनाए गए? क्या देखा है तुम ने तारों को आसमाँ से ख़ाली होते? क्या देखा है तुम ने केसे हँसते हँसते कोई दर्द छुपाता है? क्या देखा है तुम ने फूलों को किताबों में लाल होते? क्या देखा है तुम ने लाल लहू का सफ़ेद होना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर दुपट्टा लेते हुए डर को चलते? क्या देखा है तुम ने एक जिस्म का दूसरे जिस्म का शिकार होते? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे उस तीन फीट की ज़िंदा मूर्ति को जिस की आँखें बंद कर दी गई हैं? क्या देखा है तुम ने उन के हाथ काट दिए गए हैं और पैर न जाने किस नाले में बह रहे हैं? क्या देखा है तुम ने एक पत्थर का ख़ुदा हो जाना? क्या देखा है तुम ने एक ख़ुदा का पत्थर हो जाना? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे झपकते लाइट के नीचे देश का मुकद्दर पलते? क्या देखा है तुम ने पाँच सितारा होटल में भारी प्लेट छोड़ आना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर एक रोटी पर दो ख़ून का बहना? क्या देखा है तुम ने सियासत को मज़हब से हटा कर? क्या देखा है तुम ने मोहब्बत को सियासत से हटा कर? क्या देखा है तुम ने लगे हुए पोधो का सुख जाना? क्या देखा है तुम ने मौत ज़िंदगी से ज़्यादा ख़ूब-सूरत है? क्या क्या क्या? ये सब नहीं देखा! मतलब तुम ख़्वाब नहीं देखती तुम्हें नहीं पता ख़्वाबों का दर्द कैसा है ये तपती रेत पर नंगे पाँव चलने का दर्द ये बारिशों में एक जगह खड़े रहने का दर्द ये धूप में जलते शजर, ये शजर से लिपटी परिंदों की लाश ये समुंदर किनारे प्यास से मर जाने का दुख ये समुंदर की हिफाज़त करते किनारे, ये किनारों पर तैनात दरख़्त ओर फिर उन के सर चढ़ कर नाचती धूप अगर ये सब नहीं देखती तो पिक्चर देखती हो तुम सच मानो ख़्वाब नहीं देखती हो तुम अरे रुको रुको हाँ यहीं, बस यहीं! रुको रुको रुको बस यहीं रुको और देखो वो दूर से आता ज़िंदगी का ग़म वो ग़म अब तुम्हें भी सोने नहीं देगा ख़ैर! मैं तुम सेे कुछ पूछ रहा था? हाँ, मैं ये पूछ रहा था के क्या तुम्हें नींद आती है क्या तुम्हें ख़्वाब आते है क्या तुम रातों को सो जाती हो मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मैं ने बताया ना! मेरी तो नींद तुम्हारी है मेरे ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई, तन्हाई, तन्हाई तन्हाई? हम्म ख़ैर छोड़ो ये सब और बताओ कैसी हो तुम?

Aves Sayyad

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वा'दा क्या किसी बात के पाबंद नहीं हैं बूढ़े हैं ना जज़्बात के पाबंद नहीं हैं ख़्वाबों में निकल जाते हैं अरमान हमारे हम दिन में मुलाक़ात के पाबंद नहीं हैं बे-वज्ह भी आँखों में उमड आते हैं अक्सर सैलाब जो बरसात के पाबंद नहीं हैं हालात की गर्दिश रही पाबंद हमारी हम गर्दिश-ए-हालात के पाबंद नहीं हैं जब वक़्त के पाबंद नहीं आप तो हम भी पाबंदी-ए-औक़ात के पाबंद नहीं हैं हम रिंद-ए-ख़राबात हैं जो चाहे पिएँगे साक़ी की हिदायात के पाबंद नहीं हैं ज़ंजीर लिए पाँव में फिरते हैं सर-ए-राह दीवाने हवालात के पाबंद नहीं हैं हाकिम ने कहा है कि वही हुक्म को टालें जो मर्ग-ए-मुफ़ाजात के पाबंद नहीं हैं मफ़्हूम शब-ए-वस्ल का समझाया तो बोले हम ऐसी किसी रात के पाबंद नहीं हैं ये दौर तरक़्क़ी का है हम शर्म-ओ-हया की फ़र्सूदा रिवायात के पाबंद नहीं हैं हम 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' पाबंद हैं आते हुए पल के गुज़रे हुए लम्हात के पाबंद नहीं हैं

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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मेरी महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की क़सम अपनी हल्की सी शराफ़त का इशारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे ऐ मिरी जाँ मिरे उलझे हुए मक़्ते की ग़ज़ल जिसे देखा नहीं उस ख़्वाब की उल्टी ता'बीर तू मेहरबाँ हो तो खिल जाए मिरे दिल का कँवल अपनी बे-लौस मोहब्बत की दिखा दे तासीर आ के धोबी है खड़ा उस का उधारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे क्या भुला सकती है तू पहली मुलाक़ात अपनी मेरी साइकल से जो तू जान के टकराई थी एक दिन आड़ थे कुछ बाल तिरे सर पे मगर तेरी चोटी मिरी मुट्ठी में सिमट आई थी बाल नक़ली ही सही उन का उतारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे याद है तुझ को मिरे हाथ की सोने की घड़ी तिरी ख़ातिर ही जिसे छाँव में रखवाया है सूद के पैसे जो माँगे हैं छुड़ाने के लिए तिरछी आँखों में तिरी ख़ून उतर आया है ये तिरी तिरछी अदा भी है गवारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे नाक फूली हुई दो नाली तफ़ंचे की तरह तेरे तर्शे हुए अबरू ने किया दिल घाइल ले गए चैन मिरा पिचके हुए गाल तिरे दिल के दरमाँ के लिए आया हूँ बन कर साइल क़ल्ब-ए-मुज़्तर के लिए आलू-बुख़ारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे आरज़ू थी मिरे बच्चे तुझे अम्मी कहते इसी हसरत में गुज़ारी है जवानी मैं ने शौक़-ए-औलाद ने क्या दिल पे सितम तोड़े हैं सादा लफ़्ज़ों में सुनाई है कहानी मैं ने अब भी है वक़्त बुढ़ापे का सहारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे सारे कपड़े मिरे अब हो गए ढीले-ढाले नए फ़ैशन का मैं पतलून कहाँ से लाऊँ 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' आउँगा ससुराल पहन कर लुंगी गर तिरी ज़िद है कि मैं पैंट पहन कर आऊँ ले के पतलून मिरी अपना ग़रारा दे दे जेब से मारा हुआ नोट करारा दे दे

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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है यही दस्तूर दुनिया और यही देखा गया फूल से ख़ुश्बू निकलते ही उसे फेंका गया बाग़-ए-हिन्दोस्तान जिन जिन के ख़ून से सींचा गया दार ना-क़दरी पे बिल-आख़िर उन्हें खींचा गया ज़िंदगी में मिल गए कितनों को सरकारी ख़िताब मुफ़्त में इन को ख़रीदा मुफ़्त में बेचा गया मरने वालों को भी हर ए'ज़ाज़ पार्लिया मेंट में एहतिमामन वारिसों के हाथ में सौंपा गया थे रक़म जिन में जिहाद-ओ-जंग-ए-आज़ादी के बाब ताक़-ए-निस्याँ में उन्हीं औराक़ को फेंका गया हिन्द की तारीख़ का बाब दरख़्शाँ पूछिए क्यूँँ सियासी मस्लहत की आग में झोंका गया मुल्क में फ़िरक़ा-परस्तों की हुआ चल ही गई न किसी ने सरज़निश की न उन्हें टोका गया तंग-नज़री बुग़्ज़ और नफ़रत-भरे त्रिशूल को पीठ में इंसानियत की इस तरह घोंपा गया हज़रत-ए-'आज़ाद' को ए'ज़ाज़ भारत-रत्न का 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' उन के पते पर डाक से भेजा गया

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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कमयाब हो गईं जो ज़हानत की रोटियाँ खाने लगे हैं लोग जहालत की रोटियाँ मेहनत से जिन को आर है वो भीक माँग कर दिन-रात तोड़ते हैं सख़ावत की रोटियाँ खा तो रहे हो देखना पछताओगे इक दिन होती नहीं हैं हज़्म अदावत की रोटियाँ लीडर हमारे बाहमी नफ़रत की आग पर जब सेंक चुके गंदी सियासत की रोटियाँ अब आरज़ी फ़त्ह पे नदीदों को देखिए इतरा के खा रहे हैं हिमाक़त की रोटियाँ कुत्तों को खिलाएँगे मोहब्बत की ग़िज़ाएँ मेहमाँ को खिलाते हैं हिक़ारत की रोटियाँ चर्बी घटा लें अपनी सेहत-मंद औरतें परहेज़ में खाती हैं नज़ाकत की रोटियाँ घर के किचन का बुज़ुर्गो रखना ज़रा ख़याल देखो वहाँ पकें न बग़ावत की रोटियाँ अक़्ल-ए-कुल ही जिन्हें छू कर नहीं गई बाँटो न उन में फ़हम-ओ-फ़रासत की रोटियाँ इंसाँ को सताएगी सदा भूक हवस की जब तक न मुयस्सर हों क़नाअ'त की रोटियाँ मेरी सेहत का राज़ बस इतना है 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' खाता हूँ रोज़ तंज़-ओ-ज़राफ़त की रोटियाँ

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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लम्हों में ज़िंदगी का सफ़र यूँँ गुज़र गया साए में जैसे कोई मुसाफ़िर ठहर गया मख़मूर था नशे में ग़म-ए-रोज़गार के होश आ गया तो उम्र का पैमाना भर गया दौलत भी उस के हाथ न आई तमाम-उम्र कुछ नाम ही न अपना ज़माने में कर गया सब उस के ख़ैर-ख़्वाह बुलंदी पे रह गए शोहरत की सीढ़ियों से वो नीचे उतर गया मौका-परस्त आब-ओ-हवा में न जी सका अपनी अना की क़ैद में जाँ से गुज़र गया मौत उस की सारी मुश्किलें आसान कर गई इक बोझ ज़िंदगी का था सर से उतर गया अफ़्सोस कम हुआ मगर हैरत बहुत हुई जब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' ऐन ज़ईफ़ी में मर गया

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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