"ख़्वाबों की तन्हाई" क्या तुम्हें नींद आती है? क्या तुम्हें ख़्वाब आते है? क्या तुम रातों को सो जाती हो? मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मेरी तो नींद तुम्हारी है ना मेरे तो ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई? हम्म्म, अच्छा तन्हाई क्या है? तुम नहीं जानती? हाँ, तुम तो ख़्वाब देखने वाली हो ना तुम ने मेरे कमरा भी तो नहीं देखा ये बिस्तर ये दीवारें किताबें अधूरी जली सिगरेट चाय के छींटों से भरे कप ये बेवजह शोर करता हुआ फेन ये टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक, टिक टिक टिक टिक ! ये टिक टिक करती घड़ी जो मौत के आने की ख़बर देती है ये बिस्तर के चारों तरफ़ फैला सन्नाटा ये खिंडकियों से झाँकता धूप का ख़ाली-पन ये मोबाइल जो आधे वक़्त अब बंद ही रहता है तेरे बा'द किसी से बात नहीं की मैं ने अब कोई मुझे भी कॉल नहीं करता ये मोबाइल लाश के जैसे बिस्तर पर पड़ा है किसी रोज़ इस का भी जनाज़ा उठायेंगे ख़ैर छोड़ो ये सब ये क्यूँ किसी की आँखों में ख़्वाब नहीं है क्यूँ किसी के ख़्वाबों में बस आँखें है अरे तुम भी ना! छोड़ो ये सब मैं तुम्हें क्या बता रहा था वैसे? हाँ तन्हाई! तन्हाई सुकून से बनी वो बेतरतीब शह है जो कुन की यकताई का मौजज़ा है ख़्वाबों का सन्नाटा सुना है? उस सन्नाटे को समेट कर एक पेकर में डालो तब जा कर तन्हाई बनती है, चाय से भरे ठंडे कप देखे है? हाँ, वो ठंड तन्हाई है, तुम ने सुना है परिंदों की चह-चहाहट? उन के परों का फड़-फड़ाना? क्या तुम ने बादल आते देखें हैं? क्या तुम ने देखा है केसे कोई बूँद अपने जिस्म की रूह को छोड़ कर ज़मीं की तरफ़ दौड़ी चली आती है? क्या तुम ने देखा है केसे वो बूँद ज़मीं पर गिर कर उसी की हो कर रह जाती है, तुम ख़्वाब देखती हो ना? चलो तो फिर बताओ क्या क्या देखती हों? क्या देखा है तुम ने किसी रूह से उस के दिल का निकल जाना? क्या देखा है तुम ने रक़्स करता हुआ हिज्र? क्या देखा है तुम ने क़ैस को समुंदर पर चलते? क्या देखा है तुम ने कुन के बा'द किसी का न बनना? क्या देखा है तुम ने उन हक़ीक़तों को जो हक़ीक़त से दूर है? क्या देखा है तुम ने टूटी पत्तियों का फिर से शाखों पर चले जाना? क्या देखा है तुम ने आँसुओं से आँखों का बहना? क्या देखा है तुम ने उन गुलदस्तों को जो माज़ी को समेट कर बनाए गए? क्या देखा है तुम ने तारों को आसमाँ से ख़ाली होते? क्या देखा है तुम ने केसे हँसते हँसते कोई दर्द छुपाता है? क्या देखा है तुम ने फूलों को किताबों में लाल होते? क्या देखा है तुम ने लाल लहू का सफ़ेद होना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर दुपट्टा लेते हुए डर को चलते? क्या देखा है तुम ने एक जिस्म का दूसरे जिस्म का शिकार होते? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे उस तीन फीट की ज़िंदा मूर्ति को जिस की आँखें बंद कर दी गई हैं? क्या देखा है तुम ने उन के हाथ काट दिए गए हैं और पैर न जाने किस नाले में बह रहे हैं? क्या देखा है तुम ने एक पत्थर का ख़ुदा हो जाना? क्या देखा है तुम ने एक ख़ुदा का पत्थर हो जाना? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे झपकते लाइट के नीचे देश का मुकद्दर पलते? क्या देखा है तुम ने पाँच सितारा होटल में भारी प्लेट छोड़ आना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर एक रोटी पर दो ख़ून का बहना? क्या देखा है तुम ने सियासत को मज़हब से हटा कर? क्या देखा है तुम ने मोहब्बत को सियासत से हटा कर? क्या देखा है तुम ने लगे हुए पोधो का सुख जाना? क्या देखा है तुम ने मौत ज़िंदगी से ज़्यादा ख़ूब-सूरत है? क्या क्या क्या? ये सब नहीं देखा! मतलब तुम ख़्वाब नहीं देखती तुम्हें नहीं पता ख़्वाबों का दर्द कैसा है ये तपती रेत पर नंगे पाँव चलने का दर्द ये बारिशों में एक जगह खड़े रहने का दर्द ये धूप में जलते शजर, ये शजर से लिपटी परिंदों की लाश ये समुंदर किनारे प्यास से मर जाने का दुख ये समुंदर की हिफाज़त करते किनारे, ये किनारों पर तैनात दरख़्त ओर फिर उन के सर चढ़ कर नाचती धूप अगर ये सब नहीं देखती तो पिक्चर देखती हो तुम सच मानो ख़्वाब नहीं देखती हो तुम अरे रुको रुको हाँ यहीं, बस यहीं! रुको रुको रुको बस यहीं रुको और देखो वो दूर से आता ज़िंदगी का ग़म वो ग़म अब तुम्हें भी सोने नहीं देगा ख़ैर! मैं तुम सेे कुछ पूछ रहा था? हाँ, मैं ये पूछ रहा था के क्या तुम्हें नींद आती है क्या तुम्हें ख़्वाब आते है क्या तुम रातों को सो जाती हो मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मैं ने बताया ना! मेरी तो नींद तुम्हारी है मेरे ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई, तन्हाई, तन्हाई तन्हाई? हम्म ख़ैर छोड़ो ये सब और बताओ कैसी हो तुम?
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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"तलाश" हम तो दीवार-ओ-दर से थे उलझे हुए हम ने चाहा था साँसों की सरगम बने हम ने चाहा था दीदार-ए-महबूब हो हम सदाएँ तेरे दर पे देते रहे रक़्स करते रहे गीत गाते रहे खोए खोए ख़लाओं से घिरते रहे वक़्त रखता है दामन में यादें तेरी इन हवाओं से आती है ख़ुशबू तेरी देखते देखते तेरी तस्वीर को चाँद तारों भरी तेरी ता'बीर से उलझे उलझे हैं तेरे ही मंज़र सभी हम ने आँखों से देखी है दुनिया तेरी हम निसाबों से घिर के अजाबों में हैं ये जहाँ तो है हम पे अजाब-ए-सफ़र तेरे कहने पे लेकिन निकल आए है तेरे कहने पे हम ने क्या कुछ किया तेरे कहने पे इक रोज़ मर जाएँगे पर जहाँ को है तेरी ज़रूरत बड़ी तू कहाँ है कहाँ है कहाँ है कहाँ
Aves Sayyad
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"इज़हार" ज़िंदगी तेरे सिवा सोचूँ क़यामत है मुझे हासिल-ए-कुन की क़सम तेरी ही चाहत है मुझे साथ इक उम्र गुज़ारी है मगर तू ही बता जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे तेरे साए में मेरी जान रहा करते हैं तब कहीं जा के यहाँ फूल खिला करते हैं तू जो अँगड़ाई भी ले ले तो फ़ज़ा बहके है तेरी पलकों पे ये महताब हुआ करते हैं गर नज़र भर के तुझे देख ले दुनिया वाले जान-ए-मन तेरी ही यादों में जिया करते हैं तेरा ही नाम लिए जाने की आदत है मुझे जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे तेरे ज़ुल्फ़ों की हँसी छाँव तले बैठा हूँ तेरी ख़ुशबू से मैं तस्वीर बना लेता हूँ तेरी पायल की खनक क़िस्मतों की चाबी है मेरी क़िस्मत तेरे साए में जिया करता हूँ तू अगर साथ रहे दामन-ए-गुलशन के लिए होंठ शबनम से लगा कर मैं पिला सकता हूँ तू गुमाँ कर ले जो वो बात हक़ीक़त है मुझे जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे वक़्त फूलों का निगहबान बना बैठा था मैं भी गुलशन से हवाओं की तरह गुज़रा था तेरी मुस्कान के सदक़े ही मेरी दुनिया थी तेरे होंटों पे दुआ बन के रहा करता था तेरे गेसू तेरे रुख़्सार का क़ैदी था मैं उम्र भर हाथ तेरा थाम के मैं ज़िंदा था क्या तुझे दिल से लगाने की सहूलत है मुझे जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे ज़िंदगी तेरे तआक़ुब की कहानी है मेरी तेरी धड़कन से ही ग़ज़लों में रवानी है मेरी तेरा काजल तेरी पायल तेरी चूड़ी तेरा नथ उम्र-ए-आख़िर में सजी ऐन-जवानी है मेरी ये किताबों सा बदन आँख की स्याही से लिखूँ या कहूँ तुझ को मोहब्बत ही बढ़ानी है मेरी कुछ भी तुझ सेे न तेरे हुस्न से वहशत है मुझे जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे
Aves Sayyad
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"दीवानी बातें" मेरे कमरे में अक्सर ही ये यादें रक़्स करती है कभी दोस्ताँ बुलाए गर तो मैं घर से निकल आऊँ मचाऊँ शोर बाहर आ सुनाऊँ तुझ को हाल-ए-दिल जो कहता मूँद ले आँखें दिखाऊँ ख़्वाब फिर तुम को कहीं सन्नाटे में बैठा है तमाशा हँस के देखें हैं न करना ज़ेहन की बातें न समझे कुछ न जाने हैं मेरे ख़यालों के ये बच्चे सभी पागल दिवाने हैं झपक ली पलकें उस पर गर जी को कैसे सँभालेंगे मेरे गालों पे लाली है तेरे होंटो की ख़्वाहिश में जो ये मेरा मुकद्दर है गुमाँ है या हक़ीक़त है मोहल्ला दिल का है वीराँ तेरी पर याद महके हैं इसी महकी सी स्याही से लिखी दीवानी क़िस्मत है मेरी आँखें बोझल हैं कुछ बड़ी नाशाद पलकें हैं मेरे माथे कि सिलवट में तू क्या तक़दीर ढूँढ़े हैं है इस का ख़्वाब इतना सा तू सीने से आ लग जाए मेरे काँधे से लग कर रो मेरी आँखों में देखे फिर जो ये ख़्वाबों के मंज़र हैं समेटे दर्द आहों में सँभाले ज़ख़्म माज़ी के तेरी यादों के पैकर में हैं तस्वीरें पुरानी कुछ मेरा पागल सा दिल है इक धड़क कर शोर करता है घरों की खिड़की मानो जूँ हवा से नाचें गाए हैं किसी जंगल का कोई पेड़ जूँ बिजली चूम कर आए मुसाफ़िर जो भटक जाए नई इक राह को पाए तू आँसू देख आँखों के मचाए शोर पीड़ा में ये बहते आँसू के दरिया किसी साहिल पे बैठें हैं तेरी महताब सूरत को सँवारे अपने शाने पर मैं भी पत्थर की मूरत बन किनारे पर आ बैठा हूँ तुझे देखूँ मैं छत पर से तेरा ही अक्स दरिया में इसी उम्मीद को बाँधे मैं अपने घर की चौखट पर जमाए आँख बैठा हूँ दिवाना हूँ, दिवाना मैं दिवाने जैसी बातें हैं न जाने ज़ेहन में क्या क्या दिवाने ख़्वाब बुनता हूँ न सुन लेना मेरी नज़् में सभी बचकानी बातें हैं बहुत उलझा सा लड़का हूँ बहुत उलझी सी बातें हैं ख़मोशी ज़ेहन की ओढ़े मैं कुछ भी बकता रहता हूँ ये बस अपना फ़साना है ये बस अपनी हक़ीक़त है न है तुझ से गिला कोई अब न अब तुझ से शिकायत है मैं पागल जैसा लड़का हूँ यूँँ ही मस्ती में रहता हूँ जो भी मैं कहता हूँ तुम सेे न इस पर ध्यान देना तुम हाँ तो कुछ बात ऐसी है मुझे तुम से मोहब्बत है
Aves Sayyad
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नज़्म:- रील जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ, कुछ मंज़र हैं जो मैं ने खो दिए हैं, वो लोग जो मेरी ज़ात से मंसूब थे, मेरी ज़ात से आगे निकल गए हैं, वो लोग जिन को मैं ने लिखना सिखाया, वो अपनी कहानी से मुझ को मिटा चुके हैं, जिन के कासे भरे मैं ने दु'आओं से, वो नवाज़े गए तो मुझ ही को ख़ैरात करने लगे, हर वो शख़्स जिस को पलकों पर बैठाया मैं ने, मिज़्गाँ पे आते ही मेरी आँखें बंद कर दी, जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ, वो एक शख़्स, जिस सेे मैं ने बेइंतिहा मोहब्बत की, उसे लोग किसी और के तवस्सुत से जानते हैं, वो एक शाम जो मैं किसी पर उधार छोड़ आया था, उस का सूद अब कोई और खा रहा है, वो एक परीज़ाद जिस के होने पर नाज़ था मुझ को, वो दो आँखें जिन में ये ज़ीस्त बसर करनी थी, वो दोनों मेरे तमाम सानेहा की नाज़रीन थी, वो जिस के माथे को चूम कर मैं लौट आया था, जिस की ज़ुल्फ़ों के पेचो-ख़म में अपने यादें छोड़ आया हूँ, अपने कपड़ों में जिस की महक, जिस के होंटों की निशानी ले आया हूँ, वो एक शख़्स, जिसे सिर्फ़ मेरा होना था, मैं उसे न जाने किन उलझनों में छोड़ आया, जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ, कुछ साल पहले तक, कुछ दोस्त थे मेरे, मेहकशों की टोली थी, अकड़ कर चलते थे, एक दूसरों के ग़म के साथी थे, वो गुलदस्ता अब बिखर चुका है, हर एक फूल मुरझा गए हैं, वो हँसते गाते चेहरे गूँगे पड़े हैं, वो तार जिन में कभी सरगम थी, तार तार हो कर बिखर चुके हैं, वो आँखें जिन में आने वाले मंज़र थे, माज़ी के पन्नों तले दफ़न पड़े हैं, जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ कि हर जगह बस मैं ही मैं था, इन महफ़िलों में था, वीरानियों का साथी मैं था, मैं ने ही सहराओं में गीत गाए हैं, मैं ही नहाएा पत्थरों की बारिश में, चाँद की तन्हाई का साथी, सितारों को महफ़िल में रौशन, सूरज की आग को हवा देता, बर्फीले पहाड़ों को था में हुए, इन समंदरों को अपनी जगह रोके हुए, इन नदी दरियाओं को मिलता हुआ, सब को मंज़िल पर पहुँचता हुआ, तन्हाइयाँ सबकी मिटाता हुआ, मैं ही तो था, हर जगह बस मैं ही तो था, मैं ने ही चीरा नील को भी, मैं ही ज़िंदा था मछली में, आब-ए-जमजम मेरा मुक़द्दर, मैं ही लटका सूली पर, कर्बला में मैं ही कटा, मैं ने ही चाँद को काटा, मैं ही था सब सेे पहले, जन्नत थी मेरी जागीर, कुछ नहीं बचा, कुछ नहीं रहा, ये फ़िल्म भी अब ख़त्म हो रही है, रील भी पूरी हो चुकी है, साँस भी अब रुक गई है, मगर मैं फिर भी पलट पलट कर देख रहा हूँ अपनी ज़िंदगी की रील को, और मैं पाता हूँ कि मैं ने बहुत कुछ खो दिया है, मैं ने सब कुछ खो दिया है।
Aves Sayyad
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