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यूँँ कहने को राहें मुल्क-ए-वफ़ा की उजाल गया इक धुँद मिली जिस राह में पैक-ए-ख़याल गया फिर चाँद हमें किसी रात की गोद में डाल गया हम शहर में ठहरें, ऐसा तो जी का रोग नहीं और बन भी हैं सूने उन में भी हम से लोग नहीं और कूचे को तेरे लौटने का तो सवाल गया तिरे लुत्फ़-ओ-अता की धूम सही महफ़िल महफ़िल इक शख़्स था इंशा नाम-ए-मोहब्बत में कामिल ये शख़्स यहाँ पामाल रहा, पामाल गया तिरी चाह में देखा हम ने ब-हाल-ए-ख़राब इसे पर इश्क़ ओ वफ़ा के याद रहे आदाब इसे तिरा नाम ओ मक़ाम जो पूछा, हँस कर टाल गया इक साल गया, इक साल नया है आने को पर वक़्त की भी अब होश नहीं दीवाने को दिल हाथ से इस के वहशी हिरन की मिसाल गया हम अहल-ए-वफ़ा रंजूर सही, मजबूर नहीं और शहर-ए-वफ़ा से दश्त-ए-जुनूँ कुछ दूर नहीं हम ख़ुश न सही, पर तेरे सर का वबाल गया अब हुस्न के गढ़ और शहर-पनाहें सूनी हैं वो जो आश्ना थे उन सब की निगाहें सूनी हैं पर तू जो गया हर बात का जी से मलाल गया

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??

Shadab Javed

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"पहला इश्क़" तअर्रुफ़ हुआ था अभी ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा गुज़रा है बातें होती थी बहुत ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा सुधरा है अंकों में दिलचस्पी मुझे उर्दू का थोड़ा-सा ज्ञान था वो अंग्रेज़ी से वाक़िफ़ बहुत लेकिन शून्य सा अभिमान था पसंद उन की आँखों में काजल और उन पर वो चश्मा था उन्हें पसंद मेरी घनी दाढ़ी और आँखों में सुरमा था कभी ये ला दो तो कभी वो ला दो मैं ने की हर ख़्वाहिश पूरी लेकिन महरम बनाने की मेरी ख़्वाहिश रह गई अधूरी कहा था उन्होंने पहले ही मुझ से रख दो अपने माँ-बाप को अर्ज़ी पर ज़फ़र डरता खोने से उन को और कहा जैसी रब की मर्ज़ी न जाने कौन सा लज़ीज़ वक़्त था की इश्क़ की रसोई को हम ने पकाया अगर अलाहिदा करना ही था मक़्सद तो फिर क्यूँँ हम दोनों को मिलाया

ZafarAli Memon

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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ऐ मतवालो नाक़ों वालो देते हो कुछ उस का पता नज्द के अंदर मजनूँ नामी एक हमारा भाई था आख़िर उस पर क्या कुछ बीती जानो तो अहवाल कहो मौत मिली या लैला पाई? दीवाने का मआल कहो अक़्ल की बातें कहने वाले दोस्तों ने उसे समझाया उस को तो लेकिन चुप सी लगी थी ना बोला ना बाज़ आया ख़ैर अब उस की बात को छोड़ो दीवाना फिर दीवाना जाते जाते हम लोगों का एक संदेसा ले जाना आवारा आवारा फिरना छोड़ के मंडली यारों की देख रहे हैं देखने वाले 'इंशा' का अब हाल वही क्या अच्छा ख़ुश-बाश जवाँ था जाने क्यूँँ बीमार हुआ उठते बैठते मीर की बैतें पढ़ना उस का शिआर हुआ तौर-तरीक़ा उखड़ा-उखड़ा चेहरा पीला सख़्त मलूल राह में जैसे ख़ाक पे कोई मसला मसला बाग़ का फूल शाम सवेरे बाल बिखेरे बैठा बैठा रोता है नाक़ों वालो! इन लोगों का आलम कैसा होता है अपना भी वो दोस्त था हम भी पास उस के बैठ आते हैं इधर उधर के क़िस्से कह के जी उस का बहलाते हैं उखड़ी-उखड़ी बात करे है भूल के अगला याराना कौन हो तुम किस काम से आए? हम ने न तुम को पहचाना जाने ये किस ने चोट लगाई जाने ये किस को प्यार करे तुम्हीं कहो हम किस को ढूँडें आहें खींचे नाम न ले पीत में ऐसे जान से यारो कितने लोग गुज़रते हैं पीत में नाहक़ मर नहीं जाते पीत तो सारे करते हैं ऐ मतवालो नाक़ों वालो! नगरी नगरी जाते हो कहीं जो उस की जान का बैरी मिल जाए ये बात कहो चाक-गिरेबाँ इक दीवाना फिरता है हैराँ हैराँ पत्थर से सर फोड़ मरेगा दीवाने को सब्र कहाँ तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा तुम लोगों से आते जाते पूछेंगे 'इंशा' का पता

Ibn E Insha

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इंशा'-जी ये कौन आया किस देस का बासी है होंटों पे तबस्सुम है आँखों में उदासी है ख़्वाबों के गुलिस्ताँ की ख़ुश-बू-ए-दिल-आरा है या सुब्ह-ए-तमन्ना के माथे का सितारा है तरसी हुई नज़रों को अब और न तरसा रे ऐ हुस्न के सौदागर ऐ रूप के बंजारे रमना दिल-ए-'इंशा' का अब तेरा ठिकाना हो अब कोई भी सूरत हो अब कोई बहाना हो ख़ाकिस्तर-ए-दिल को है फिर शोला-ब-जाँ होना हैरत का जहाँ होना हसरत का निशाँ होना ऐ शख़्स जो तू आ कर यूँँ दिल में समाया है तू दर्द कि दरमाँ है तो धूप कि साया है? नैनाँ तिरे जादू हैं गेसू तिरे ख़ुश्बू हैं बातें किसी जंगल में भटका हुआ आहू हैं मक़्सूद-ए-वफ़ा सुन ले क्या साफ़ है सादा है जीने की तमन्ना है मरने का इरादा है

Ibn E Insha

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1 ये बच्चा कैसा बच्चा है ये बच्चा काला काला सा ये काला सा मटियाला सा ये बच्चा भूका भूका सा ये बच्चा सूखा सूखा सा ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा कैसा बच्चा है जो रेत पे तन्हा बैठा है ना इस के पेट में रोटी है ना इस के तन पर कपड़ा है ना इस के सर पर टोपी है ना इस के पैर में जूता है ना इस के पास खिलौनों में कोई भालू है, कोई घोड़ा है ना इस का जी बहलाने को कोई लोरी है, कोई झूला है ना इस की जेब में धेला है ना इस के हाथ में पैसा है ना इस के अम्मी अब्बू हैं ना इस की आपा ख़ाला है ये सारे जग में तन्हा है ये बच्चा कैसा बच्चा है 2 ये सहरा कैसा सहरा है ना इस सहरा में बादल है ना इस सहरा में बरखा है ना इस सहरा में बाली है ना इस सहरा में ख़ोशा है ना इस सहरा में सब्ज़ा है ना इस सहरा में साया है ये सहरा भूक का सहरा है ये सहरा मौत का सहरा है 3 ये बच्चा कैसे बैठा है ये बच्चा कब से बैठा है ये बच्चा क्या कुछ पूछता है ये बच्चा क्या कुछ कहता है ये दुनिया कैसी दुनिया है ये दुनिया किस की दुनिया है 4 इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है कहीं बादल घिर घिर आते हैं कहीं चश्मा है कहीं दरिया है कहीं ऊँचे महल अटारीयाँ हैं कहीं महफ़िल है कहीं मेला है कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे ये रेशम है ये दीबा है कहीं ग़ल्ले के अम्बार लगे सब गेहूँ धान मुहय्या है कहीं दौलत के संदूक़ भरे हाँ ताँबा सोना रूपा है तुम जो माँगो सो हाज़िर है तुम जो चाहो सो मिलता है इस भूक के दुख की दुनिया में ये कैसा सुख का सपना है वो किस धरती के टुकड़े हैं ये किस दुनिया का हिस्सा है 5 हम जिस आदम के बेटे हैं ये उस आदम का बेटा है ये आदम एक ही आदम है ये गोरा है या काला है ये धरती एक ही धरती है ये दुनिया एक ही दुनिया है सब इक दाता के बंदे हैं सब बंदों का इक दाता है कुछ पूरब पच्छम फ़र्क़ नहीं इस धरती पर हक़ सब का है 6 ये तन्हा बच्चा बे-चारा ये बच्चा जो यहाँ बैठा है इस बच्चे की कहीं भूक मिटे (क्या मुश्किल है हो सकता है) इस बच्चे को कहीं दूध मिले (हाँ दूध यहाँ बहतेरा है) इस बच्चे का कोई तन ढाँके (क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा है) इस बच्चे को कोई गोद में ले (इंसान जो अब तक ज़िंदा है) फिर देखे कैसा बच्चा है ये कितना प्यारा बच्चा है 7 इस जग में सब कुछ रब का है जो रब का है वो सब का है सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं हर चीज़ में सब का साझा है जो बढ़ता है जो उगता है वो दाना है या मेवा है जो कपड़ा है जो कंबल है जो चाँदी है जो सोना है वो सारा है इस बच्चे का जो तेरा है जो मेरा है ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा सब का बच्चा है!

Ibn E Insha

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ये बच्चा काला काला सा ये काला सा, मटियाला सा ये बच्चा भूखा भूखा सा ये बच्चा सूखा सूखा सा ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा कैसा बच्चा है जो रेत पर तन्हा बैठा है ना इस के पेट में रोटी है ना इस के तन पर कपड़ा है ना इस के सर पर टोपी है ना इस के पैर में जूता है ना इस के पास खिलौना में कोई भालू है कोई घोड़ा है ना इस का जी बहलाने को कोई लोरी है कोई झूला है ना इस की जेब में धेला है ना इस के हाथ में पैसा है ना इस के अम्मी-अब्बू हैं ना इस की आपा ख़ाला है ये सारे जग में तन्हा है ये बच्चा कैसा बच्चा है ये सहरा कैसा सहरा है ना इस सहरा में बादल है ना इस सहरा में बरखा है ना इस सहरा में बाली है ना इस सहरा में ख़ोशा है ना इस सहरा में सब्ज़ा है ना इस सहरा में साया है ये सहरा भूख का सहरा है ये सहरा मौत का सहरा है ये बच्चा कैसे बैठा है ये बच्चा कब से बैठा है ये बच्चा क्या कुछ पूछता है ये बच्चा क्या कुछ कहता है ये दुनिया कैसी दुनिया है ये दुनिया किस की दुनिया है इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है कहीं बादल घिर-घिर आते हैं कहीं चश्मा है कहीं दरिया है कहीं ऊँचे महल अटरिया हैं कहीं महफ़िल है, कहीं मेला है कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे ये रेशम है, ये दीबा है कहीं ग़ल्ले के अम्बार लगे सब गेहूँ धान मुहय्या है कहीं दौलत के संदूक़ भरे हाँ ताँबा, सोना, रूपा है तुम जो माँगो सो हाज़िर है तुम जो चाहो सो मिलता है इस भूख के दुख की दुनिया में ये कैसा सुख का सपना है वो किस धरती के टुकड़े हैं ये किस दुनिया का हिस्सा है हम जिस आदम के बेटे हैं ये उस आदम का बेटा है ये आदम एक ही आदम है वो गोरा है या काला है ये धरती एक ही धरती है ये दुनिया एक ही दुनिया है सब इक दाता के बन्दे हैं सब बंदों का इक दाता है कुछ पूरब-पच्छिम फ़र्क़ नहीं इस धरती पर हक़ सबका है ये तन्हा बच्चा बेचारा ये बच्चा जो यहाँ बैठा है इस बच्चे की कहीं भूख मिटे (क्या मुश्किल है, हो सकता है इस बच्चे को कहीं दूध मिले (हाँ दूध यहाँ बहुतेरा है) इस बच्चे का कोई तन ढाँके (क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा है) इस बच्चे को कोई गोद में ले (इंसान जो अब तक ज़िन्दा है) फिर देखिए कैसा बच्चा है ये कितना प्यारा बच्चा है इस जग में सब कुछ रब का है जो रब का है, वो सबका है सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं हर चीज़ में सबका साझा है जो बढ़ता है, जो उगता है वो दाना है, या मेवा है जो कपड़ा है, जो कंबल है जो चाँदी है, जो सोना है वो सारा है इस बच्चे का जो तेरा है, जो मेरा है ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा सबका बच्चा है

Ibn E Insha

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तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए वक़्त की बे-उनवान कहानी कब तक बे-उनवान रहे ऐ मिरे सोच-नगर की रानी ऐ मिरे ख़ुल्द-ए-ख़याल की हूर इतने दिनों जो मैं घुलता रहा हूँ तेरे बिना यूँँही दूर ही दूर सोच तो क्या फल मुझ को मिला मैं मन से गया फिर तन से गया शहर-ए-वतन में अजनबी ठहरा आख़िर शहर-ए-वतन से गया रूह की प्यास बुझानी थी पर यहाँ होंटों की प्यास भी बुझ न सकी बचते सँभलते भी एक सुलगता रोग बनी मिरे जी की लगी दूर की बात न सोच अभी मिरे हात में तू ज़रा हात तो दे तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए बाग़ में है इक बेले का तख़्ता भीनी है इस बेले की सुगंध ऐ कलियो क्यूँँ इतने दिनों तुम रक्खे रहीं इसे गोद में बंद कितने ही हम से रूप के रसिया आए यहाँ और चल भी दिए तुम हो कि इतने हुस्न के होते एक न दामन थाम सके सहन-ए-चमन पर भौउँरों के बादल एक ही पल को छाएँगे फिर न वो जा कर लौट सकेंगे फिर न वो जा कर आएँगे ऐ मिरे सोच-नगर की रानी वक़्त की बातें रंग और बू हर कोई साथ किसी का ढूँडे गुल हों कि बेले मैं हूँ कि तू जो कुछ कहना है अभी कह ले जो कुछ सुनना है सुन ले तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए दिल की न पूछो क्या कुछ चाहे दिल का तो फैला है दामन गीत से गाल ग़ज़ल सी आँखें साअद-ए-सीमीं बर्ग-ए-दहन जूड़े के इन्हीं फूलों को देखो कल की सी इन में बास कहाँ एक इक तारा कर के डूबी माथे की तन्नाज़ अफ़्शाँ सहने का दुख सह न सके हम कहने की बातें कह न सके पास तिरे कभी आ न सके हम दूर भी तुझ से रह न सके किस से कहे अब रूह की बिपता किस को सुनाए मन की बात दूर की राह भटकता राही जीवन-रात घनेरी रात होंटों की प्यास बुझानी है अब तिरे जी को ये बात लगे न लगे तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे? लिए नहीं अपने लिए

Ibn E Insha

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