मिरे दिल, मिरे मुसाफ़िर हुआ फिर से हुक्म सादिर कि वतन-बदर हों हम तुम दें गली गली सदाएँ करें रुख़ नगर नगर, का कि सुराग़ कोई पाएँ किसी यार-ए-नामा-बर का हर इक अजनबी से पूछें जो पता था अपने घर का सर-ए-कू-ए-ना-शनायाँ हमें दिन से रात करना कभी इस से बात करना कभी उस से बात करना तुम्हें क्या कहूँ कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है हमें ये भी था ग़नीमत जो कोई शुमार होता हमें क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता!
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है
Sandeep Thakur
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"याद" दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तिरी साँस की आँच अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम दूर उफ़ुक़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा गिर रही है तिरी दिलदार नज़र की शबनम इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हाथ यूँँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़ ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात
Faiz Ahmad Faiz
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वो जिस की दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँ वो हुस्न जिस की तमन्ना में जन्नतें पिन्हाँ हज़ार फ़ित्ने तह-ए-पा-ए-नाज़ ख़ाक-नशीं हर इक निगाह ख़ुमार-ए-शबाब से रंगीं शबाब जिस से तख़य्युल पे बिजलियाँ बरसें वक़ार जिस की रफ़ाक़त को शोख़ियाँ तरसें अदा-ए-लग़्ज़िश-ए-पा पर क़यामतें क़ुर्बां बयाज़-रुख़ पे सहर की सबाहतें क़ुर्बां सियाह ज़ुल्फ़ों में वारफ़्ता निकहतों का हुजूम तवील रातों की ख़्वाबीदा राहतों का हुजूम वो आँख जिस के बनाव प ख़ालिक़ इतराए ज़बान-ए-शेर को ता'रीफ़ करते शर्म आए वो होंट फ़ैज़ से जिन के बहार लाला-फ़रोश बहिश्त ओ कौसर ओ तसनीम ओ सलसबील ब-दोश गुदाज़ जिस्म क़बा जिस पे सज के नाज़ करे दराज़ क़द जिसे सर्व-ए-सही नमाज़ करे ग़रज़ वो हुस्न जो मोहताज-ए-वस्फ़-ओ-नाम नहीं वो हसन जिस का तसव्वुर बशर का काम नहीं किसी ज़माने में इस रह-गुज़र से गुज़रा था ब-सद ग़ुरूर ओ तजम्मुल इधर से गुज़रा था और अब ये राह-गुज़र भी है दिल-फ़रेब ओ हसीं है इस की ख़ाक में कैफ़-ए-शराब-ओ-शेर मकीं हवा में शोख़ी-ए-रफ़्तार की अदाएँ हैं फ़ज़ा में नर्मी-ए-गुफ़्तार की सदाएँ हैं ग़रज़ वो हुस्न अब इस रह का जुज़्व-ए-मंज़र है नियाज़-ए-इश्क़ को इक सज्दा-गह मुयस्सर है
Faiz Ahmad Faiz
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दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएँगे कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएँगे ऐ ख़ाक-नशीनो उठ बैठो वो वक़्त क़रीब आ पहुँचा है जब तख़्त गिराए जाएँगे जब ताज उछाले जाएँगे अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं जो दरिया झूम के उट्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएँगे कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो, बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएँगे ऐ ज़ुल्म के मातो लब खोलो चुप रहने वालो चुप कब तक कुछ हश्र तो उन से उट्ठेगा कुछ दूर तो नाले जाएँगे
Faiz Ahmad Faiz
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मिरा दर्द नग़मा-ए-बे-सदा मिरी ज़ात ज़र्रा-ए-बे-निशाँ मेरे दर्द को जो ज़बाँ मिले मुझे अपना नाम-ओ-निशाँ मिले मेरी ज़ात का जो निशाँ मिले मुझे राज़-ए-नज़्म-ए-जहाँ मिले जो मुझे ये राज़-ए-निहाँ मिले मिरी ख़ामुशी को बयाँ मिले मुझे काएनात की सरवरी मुझे दौलत-ए-दो-जहाँ मिले
Faiz Ahmad Faiz
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इस वक़्त तो यूँँ लगता है अब कुछ भी नहीं है महताब न सूरज, न अँधेरा न सवेरा आँखों के दरीचों पे किसी हुस्न की चिलमन और दिल की पनाहों में किसी दर्द का डेरा मुमकिन है कोई वहम था, मुमकिन है सुना हो गलियों में किसी चाप का इक आख़िरी फेरा शाख़ों में ख़यालों के घने पेड़ की शायद अब आ के करेगा न कोई ख़्वाब बसेरा इक बैर न इक मेहर न इक रब्त न रिश्ता तेरा कोई अपना, न पराया कोई मेरा माना कि ये सुनसान घड़ी सख़्त कड़ी है लेकिन मिरे दिल ये तो फ़क़त इक ही घड़ी है हिम्मत करो जीने को तो इक उम्र पड़ी है
Faiz Ahmad Faiz
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