कहते हैं सब लोग होते हैं दीवारों के कान कमरों की तन्हाई में सरगोशी में क्या क्या बातें करते हैं छुप छुप कर जब लोग दीवारें सब सुन लेती हैं सुन लेते हैं लोग दीवारों की आँख भी होती है कितना अच्छा होता आँख है कान से बेहतर शायद कमरे का हो या फिर चलती राह-गुज़र का नज़्ज़ारा तो नज़्ज़ारा है मंज़र आख़िर मंज़र है क्या क्या करते लोग देखा करते लोग दीवारों के बाहरस तारीकी में दीवारों की जानिब जब भी क़दम उठाते लम्हा-भर को मुमकिन है सोचा करते लोग
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वे डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ? वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और ग़रीब लोग उन सेे डरना बंद कर देंगे
Gorakh Pandey
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है
Tehzeeb Hafi
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नज़्म - बेबसी तेरे साथ गुज़रे दिनों की कोई एक धुँदली सी तस्वीर जब भी कभी सामने आएगी तो हमें एक दुआ थामने आएगी, बुढ़ापे की गहराइयों में उतरते हुए तेरी बे-लौस बाँहों के घेरे नहीं भूल पाएँगे हम हम को तेरे तवस्सुत से हँसते हुए जो मिले थे वो चेहरे नहीं भूल पाएँगे हम तेरे पहलू में लेटे हुओं का अजब क़र्ब है जो रात भर अपनी वीरान आँखों से तुझे तकते थे और तेरे शादाब शानों पे सिर रख के मरने की ख़्वाहिश में जीते रहे पर तेरे लम्स का कोई इशारा मुयस्सर नहीं था मगर इस जहाँ का कोई एक हिस्सा उन्हें तेरे बिस्तर से बेहतर नहीं था पर मोहब्बत को इस सब से कोई इलाका नहीं था एक दुख तो हम बहरहाल हम अपने सीनों में ले के मरेंगे कि हम ने मोहब्बत के दावे किए तेरे माथे पर सिंदूर टाँका नहीं इस सेे क्या फ़र्क पड़ता है दूर हैं तुझ सेे या पास हैं हम को कोई आदमी तो नहीं, हम तो एहसास हैं जो रहे तो हमेशा रहेंगे और गए तो मुड़ कर वापिस नहीं आएँगे
Tehzeeb Hafi
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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हमारे मुन्ने को चाह थी रेडियो ख़रीदें कि अब हमारे यहाँ फ़राग़त की रौशनी थी मैं अपनी देरीना तंग-दस्ती की दास्ताँ उस को क्या सुनाता उठा के ले आया तंग-ओ-तारीक कोठरी से क़लील तनख़्वाह के चिचोड़े हुए निवाले और उन में मेरी नहीफ़ बीवी ने अपनी दो-चार बाक़ी-माँदा शिकस्त-आमेज़ आरज़ूओं का ख़ून डाला न जाने कब से था प्यारे मुन्ने ने रेडियो का ये ख़्वाब पाला ये एक हफ़्ते की बात है और कल से मुन्ना ये कह रहा है ये जानवर सुब्ह-ओ-शाम बे-कार बोलता है मुहीब ख़बरों का ज़हर गीतों में घोलता है गली में कोई फ़क़ीर आए तो उस को दे दो मुझे इकन्नी का मोर ले दो
Balraj Komal
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तमाम लोग इब्तिदा में एक दूसरे के सामने हुजूम में दिखाई देने वाले कुछ निशाँ महज़ अजनबी फिर यका-यक मोजज़ा तुलूअ' का और एक रू-ए-आफ़्ताब बादलों के पार से निकल के रू-ब-रू ख़िराम-ए-नूर कू-ब-कू पुराना शहर वक़्त-ए-शाम फैलता उमडता अजनबी हुजूम हाव-हू के दरमियान मोजज़ा हुआ और एक मुज़्तरिब हसीन रू-ए-दिल-गुदाज़ मेरे जिस्म ओ जाँ में देखते ही देखते समा गया वो रौशनी था मौज-ए-आफ़्ताब था बस इक नज़र में जैसे मैं ने उस को पा लिया मैं दम-ब-ख़ुद सा रह गया ये हादसा था वाक़िआ' था कैसा इत्तिफ़ाक़ था तुलू-ए-नूर के जिलौ में इक तवील पुर-ख़तर सियाह रात शहर में उतर गई
Balraj Komal
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सर-सब्ज़ी मस्ती शादाबी झोंकों का मद्धम संगीत हरे-भरे खेतों में नन्हे मने पौदों की सरसर मिट्टी के ज़रख़ेज़ बदन की सोंधी सोंधी सी ख़ुश्बू रू-पहली चमकीली धूप की प्यारी प्यारी सी लज़्ज़त पेड़ों के ठंडे सायों में शफ़क़त की हल्की सी आँच पगडंडी के मोड़ पे लहराते आँचल की रंगीनी जिस्मों में क़ुव्वत की मौजें आँखों में भरपूर चमक हँसते खेलते नन्हे बच्चे अंग अंग में तर्रारी ज़रख़ेज़-ओ-शादाब ज़मीं पर हस्ती यूँँ लहराती है जैसे इक मा'सूम सी बच्ची गुड़िया ले कर नाच उठे सीने बाहें ज़ुल्फ़ें होंट जवाँ जिस्मों की लहराहट रक़्स-ओ-नग़्मा जाम-ओ-मीना साक़ी की आँखों की थकन महल-ओ-ऐवाँ गर्मी-ए-लज़्ज़त ख़्वाबों का मसरूर जहाँ मस्जिद के ऊँचे मीनारे मंदिर का सोने का कलस शोर-ओ-ग़ौग़ा हंगा में अफ़्साने जैसे मरने के महकूमी कुल्फ़त शोरिश ज़ख़्मों की बौछारें हर-सू जंग क़हत बीमारी हसरत जीने वालों की दौलत रंग रंग के परचम ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद के सारे सामाँ जीने वालों की दुनिया हर लम्हा रंग बदलती है ख़स्ता इम्कानात की कड़ियाँ टूट के गिरती हैं आबादी और वीराना मफ़्हूम बदलते रहते हैं दुखती रोती धरती पर हस्ती शोर मचाती है जैसे इक नन्ही बच्ची शफ़क़त की भूकी चीख़ उठे आज मगर सीने में ये एहसास धड़कता है पैहम मैं उस दौर का इंसाँ हूँ जिस में सारे इंसानों ने अपने जीते-जागते अज़्म अम्न-ओ-सुकूँ की क़ुव्वत से एक नए इम्कान की शम्अ'' रौशन की है धरती पर एक नई मंज़िल की जानिब अपने क़दम बढ़ाए हैं क़ुव्वत मेहनत और मसर्रत के रस्ते अपनाए हैं एहसासात की तस्वीरें ये साए दौड़ते लम्हों के धरती की तख़्लीक़ हैं इस की गोद में फलते-फूलते हैं
Balraj Komal
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पेड़ों के पत्ते जलती दोपहरों को आने जाने वालों को साया देते हैं अपने होने का एलान नहीं करते साए का एलान नहीं करते मैं घर से बिछड़ा था जब तो अक्सर बरसों जलती धूप में उन की शफ़क़त के साए में सोया था कुछ दिन से दूर दूर तक आसमान में आग दूर दूर तक प्यासे जलते-बुझते लोग बादल बारिश सब्ज़ा पत्ते पौदे पेड़ भूले-बिसरे ख़्वाब दूर दूर तक शो'लों के तूफ़ान का मौसम आया सब के सिर पर आने वाले मौसम के एलान का घटता-बढ़ता साया ये कैसा मौसम आया
Balraj Komal
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ग़ुबारे सितारे गुलाबी शराबी खुले परचमों के शरारे उड़ाते हज़ारों की तादाद में वो घरों से स्कूलों से आए दहकते हुए गाल उड़ते हुए बाल जिस्मों के मोती वो शबनम थे लेकिन बदलते गए गर्म लावे में पैहम वो बहते गए मौज-दर-मौज हर रह गुज़र पर फ़लक-बोस नारों से अपने वतन के नए या पुराने चले वो बढ़े वो सभी मुश्तहर दुश्मनों को मिटाने मगर शोख़ चेहरों के इस कारवाँ में तसव्वुर में बनते सँवरते हुए सूरमाओं से हट कर ख़ुदा जाने कैसे कहाँ से वो आया वो नन्हा सा मा'सूम बालक जो ख़ामोश हैराँ परेशाँ ग़ुबारों शरारों फ़लक-बोस नारों के बे-रहम दरिया में बहता लुढ़कता चला जा रहा था उसे कौन पहचानता जब तमाशाइयों की सफ़ों में उसे देखने वाला कोई नहीं था
Balraj Komal
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