nazmKuch Alfaaz

सर-सब्ज़ी मस्ती शादाबी झोंकों का मद्धम संगीत हरे-भरे खेतों में नन्हे मने पौदों की सरसर मिट्टी के ज़रख़ेज़ बदन की सोंधी सोंधी सी ख़ुश्बू रू-पहली चमकीली धूप की प्यारी प्यारी सी लज़्ज़त पेड़ों के ठंडे सायों में शफ़क़त की हल्की सी आँच पगडंडी के मोड़ पे लहराते आँचल की रंगीनी जिस्मों में क़ुव्वत की मौजें आँखों में भरपूर चमक हँसते खेलते नन्हे बच्चे अंग अंग में तर्रारी ज़रख़ेज़-ओ-शादाब ज़मीं पर हस्ती यूँँ लहराती है जैसे इक मा'सूम सी बच्ची गुड़िया ले कर नाच उठे सीने बाहें ज़ुल्फ़ें होंट जवाँ जिस्मों की लहराहट रक़्स-ओ-नग़्मा जाम-ओ-मीना साक़ी की आँखों की थकन महल-ओ-ऐवाँ गर्मी-ए-लज़्ज़त ख़्वाबों का मसरूर जहाँ मस्जिद के ऊँचे मीनारे मंदिर का सोने का कलस शोर-ओ-ग़ौग़ा हंगा में अफ़्साने जैसे मरने के महकूमी कुल्फ़त शोरिश ज़ख़्मों की बौछारें हर-सू जंग क़हत बीमारी हसरत जीने वालों की दौलत रंग रंग के परचम ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद के सारे सामाँ जीने वालों की दुनिया हर लम्हा रंग बदलती है ख़स्ता इम्कानात की कड़ियाँ टूट के गिरती हैं आबादी और वीराना मफ़्हूम बदलते रहते हैं दुखती रोती धरती पर हस्ती शोर मचाती है जैसे इक नन्ही बच्ची शफ़क़त की भूकी चीख़ उठे आज मगर सीने में ये एहसास धड़कता है पैहम मैं उस दौर का इंसाँ हूँ जिस में सारे इंसानों ने अपने जीते-जागते अज़्म अम्न-ओ-सुकूँ की क़ुव्वत से एक नए इम्कान की शम्अ'' रौशन की है धरती पर एक नई मंज़िल की जानिब अपने क़दम बढ़ाए हैं क़ुव्वत मेहनत और मसर्रत के रस्ते अपनाए हैं एहसासात की तस्वीरें ये साए दौड़ते लम्हों के धरती की तख़्लीक़ हैं इस की गोद में फलते-फूलते हैं

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"पंद्रह अगस्त" ख़ुशियों के गीत गाओ कि पंद्रह अगस्त है सब मिल के मुस्कुराओ कि पंद्रह अगस्त है हर सम्त क़हक़हे हैं चराग़ाँ है हर तरफ़ तुम ख़ुद भी जगमगाओ कि पंद्रह अगस्त है हर गोशा-ए-वतन को निखारो सँवार दो महकाओ लहलहाओ कि पंद्रह अगस्त है आज़ादी-ए-वतन पे हुए हैं कई निसार ख़ातिर में इन को लाओ कि पंद्रह अगस्त है रक्खो न सिर्फ़ ख़ंदा-ए-गुल हैं निगाह में काँटों को भी हँसाओ कि पंद्रह अगस्त है रूहें अमान-ओ-अम्न की प्यासी हैं आज भी प्यास इन की अब बुझाओ कि पंद्रह अगस्त है शम्अ''' ख़ुलूस-ओ-उन्स की मद्धम है रौशनी लौ और कुछ बढ़ाओ कि पंद्रह अगस्त है ये अहद तुम करो कि फ़सादात फिर न हों हाँ आग ये बुझाओ कि पंद्रह अगस्त है खाओ क़सम कि ख़ून पिलाएँगे मुल्क को दिल से क़सम ये खाओ कि पंद्रह अगस्त है हर हादसे में अहल-ए-वतन मुस्तइद रहें वो वलवला जगाओ कि पंद्रह अगस्त है ऊँचा रहे शराफ़त-ओ-अख़्लाक़ का अलम परचम बुलंद उठाओ कि पंद्रह अगस्त है हो दर्द-ए-दिल में जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन फ़ुज़ूँ 'मफ़्तूँ' क़लम उठाओ कि पंद्रह अगस्त है

Maftun Kotvi

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“पुरुष की कल्पनाएँ" दफ़्तर से लौट कर थका हुआ पलँग पर बेहोश सा लेटा हुआ एक पुरुष अपने मन में कैसी कल्पना करता है वो कल्पना करता है उस दिन की जब वो सभी सामाजिक बंधनों से मुक्त किसी नदी या झील के किनारे बैठा होगा जब वो सुन सकेगा सुब्ह के पंछियों की आवाज़ें जब वो देख सकेगा ढलता हुआ सूर्य जब वो भी गिन सकेगा आसमान के तारे जब वो महसूस कर सकेगा अपने आस-पास के वातावरण में मौजूद शांति सभी प्रकार की चिंताओं से परे जब वो सुन सकेगा हृदय की बातें जब वो बातें कर सकेगा ख़ुद से जब नहीं खलेगी उसे ये बेपरवाही और भाने लगेगा अकेलापन इस अकेलेपन में वो सुन रहा होगा कोई मधुर संगीत जिस की धुन में उस के पैर थिरकने के लिए उत्साहित हो रहे होंगे किंतु इसी बीच अरनिमा अपने कोमल हाथों से उस के पलकों को स्पर्श करती है और उसे खींच लाती है काल्पनिक लोक से बाहर वो उठता है और अपनी काल्पनिकता को अपने थैले में भरकर फिर से दफ़्तर के रास्ते चल पड़ता है उस की आत्मा से महज़ एक आवाज़ आती है आदमी की कल्पनाएँ क्षणभंगुर होती हैं।

AYUSH SONI

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"तुम्हें याद तो है ना" "कुछ ऐसे ही पल थे, जब हम और तुम मिले थे, ऐसी ही चाँदनी रात, ऐसी ही मद्धम बरसात, हाथों में ले कर हाथ, हम तुम कुछ दूर तक चले थे याद है मुझे तुम ने मेरा हाथ अपने सिर पर रख के क़सम दिलायी थी कि तुम मुझे छोड़कर कभी नहीं जाओगे देखो,मैं ने आज तक तुम्हारे वादे को सँभाल रखा है। उसी रात चाँद के छाव में खुले आसमान के तले तुम ने अपने नरम उँगलियों से मेरे गालों पे अपना नाम लिखकर मेरा अपना होने का एहसास भी दिलाया था। सुनो, तुम्हें याद तो है ना

Rajnish Vishwakarma

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"याद" दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तिरी साँस की आँच अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम दूर उफ़ुक़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा गिर रही है तिरी दिलदार नज़र की शबनम इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हाथ यूँँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़ ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात

Faiz Ahmad Faiz

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मैं नान-ए-सोख़्ता का ज़ाइक़ा उतारता हूँ रोज़-ओ-शब ज़बान पर कि उस की हमदमी में दोस्ती में उम्र के नशेब में अगर मैं ढल सकूँ तो फ़स्ल आफ़्ताब का वो बर्ग-ए-ज़र्द बन सकूँ जो दाएरे की इंतिहा पे सिर्फ़ मौसमों के ख़्वाब देखता हूँ सुब्ह-ओ-शाम सोचता हूँ आरज़ू फ़रेब-कार शाहिदा कहाँ मिली थी और कौन से हसीन मोड़ तक चलेगी मेरे साथ मेरे साथ जू-ए-आब जू-ए-मय रिदा-ए-ख़ाक दूर के सफ़र के लोग बद-गुमाँ साअ'तों के शहर मैं चलूँगा मैं दश्त-ओ-कोहसार की उदास हिजरतों को नन्ही-मुन्नी लोरियाँ सुनाऊँगा मैं जंगलों की सनसनाहटों के पार जाऊँगा

Balraj Komal

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शहसवार नन्हा-मुन्ना शहसवार ईस्तादा है ख़मीदा पुश्त पर मेरी जूँ-ही झुकता हूँ वो तर्ग़ीब देता है मुझे चलने की आवाज़ों की सरगम से मैं चलता हूँ मैं वामाँदा क़दम चलता हूँ वो महमेज़ की जुम्बिश से कहता है कि दौड़ो और दौड़ो, तेज़-तर, सरपट चलो बाद-ए-नग़्मा-कार से बातें करो उस का मैं रख़्श-ए-रज़ा तेज़-तर करता हूँ रफ़्तार-ए-ख़िराम मुझ को पहुँचाना है आज उस को रंगों तितलियों के देस में जादू-नगर में मेरे साए का भी अब शायद जहाँ मुंतज़िर कोई नहीं मुंतज़िर हैं उस के लेकिन, मेरे नन्हे दोस्त के देव-क़ामत सब्ज़ वारफ़्ता-वक़ार दूर तक सरगोशियाँ करते हुए अश्जार रक़्स-ए-बर्ग-ओ-बार जा रहा है ख़्वाब की रफ़्तार से दीवाना-वार मेरा नन्हा शहसवार

Balraj Komal

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हमारे मुन्ने को चाह थी रेडियो ख़रीदें कि अब हमारे यहाँ फ़राग़त की रौशनी थी मैं अपनी देरीना तंग-दस्ती की दास्ताँ उस को क्या सुनाता उठा के ले आया तंग-ओ-तारीक कोठरी से क़लील तनख़्वाह के चिचोड़े हुए निवाले और उन में मेरी नहीफ़ बीवी ने अपनी दो-चार बाक़ी-माँदा शिकस्त-आमेज़ आरज़ूओं का ख़ून डाला न जाने कब से था प्यारे मुन्ने ने रेडियो का ये ख़्वाब पाला ये एक हफ़्ते की बात है और कल से मुन्ना ये कह रहा है ये जानवर सुब्ह-ओ-शाम बे-कार बोलता है मुहीब ख़बरों का ज़हर गीतों में घोलता है गली में कोई फ़क़ीर आए तो उस को दे दो मुझे इकन्नी का मोर ले दो

Balraj Komal

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तमाम लोग इब्तिदा में एक दूसरे के सामने हुजूम में दिखाई देने वाले कुछ निशाँ महज़ अजनबी फिर यका-यक मोजज़ा तुलूअ' का और एक रू-ए-आफ़्ताब बादलों के पार से निकल के रू-ब-रू ख़िराम-ए-नूर कू-ब-कू पुराना शहर वक़्त-ए-शाम फैलता उमडता अजनबी हुजूम हाव-हू के दरमियान मोजज़ा हुआ और एक मुज़्तरिब हसीन रू-ए-दिल-गुदाज़ मेरे जिस्म ओ जाँ में देखते ही देखते समा गया वो रौशनी था मौज-ए-आफ़्ताब था बस इक नज़र में जैसे मैं ने उस को पा लिया मैं दम-ब-ख़ुद सा रह गया ये हादसा था वाक़िआ' था कैसा इत्तिफ़ाक़ था तुलू-ए-नूर के जिलौ में इक तवील पुर-ख़तर सियाह रात शहर में उतर गई

Balraj Komal

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क़फ़स का दर खुला इक नीम-जाँ कम-सिन परिंदा चंद ख़स्ता ज़ाइचों पर रक़्स के अंदाज़ में आगे बढ़ा, फिर चोंच से अपना पसंदीदा मुसव्वर ज़ाइचा उस ने उठाया और अपने ही हिदायत-कार के आगे अदब से रख दिया झुक कर हिदायत-कार गरचे नूर से था बद-गुमाँ महरूम ना-ख़्वांदा सर-ए-सैल-ए-रवाँ इक बर्ग-ए-बे-माया नविश्त-ए-बख़्त के असरार से वाक़िफ़ था वो शायद नज़र के रू-ब-रू उस ने मता-ए-बे-निहायत के फ़साने से मुझे ख़ुश-हाल कर डाला मुझे पामाल कर डाला सभी मौज-ए-ज़िया में थे सभी के चश्म ओ दिल में एक शो'ला था सभी ख़ामोश गुम-सुम हैं यहाँ से कौन जाएगा यहाँ पर कौन आएगा परिंदा नीम-जाँ कम-सिन क़फ़स में जा चुका कब का हिदायत-कार की आँखों में लौट आई है वीरानी जो कल ख़ाली था वो दस्त-ए-तलब है आज भी ख़ाली लबों पर लुत्फ़-ए-अंदाम-ए-निहाँ की अन-सुनी गाली

Balraj Komal

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