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एक मर्द‌‌‌‌-ए-बा-सफ़ा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन नेक-दिल फ़रमाँ-रवा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन सादा-दिल सादा-मिज़ाज-ओ-बा-अमल इंसान था ख़ूबियों का आइना था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन पासदार-ए-हुर्रियत था आबरू-ए-हिन्द था एक सच्चा रहनुमा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन उस के हाथों में अमानत थी वतन की ज़िंदगी इक अमीन-ए-बा-वफ़ा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन उस के हाथों में सलामत था सफ़ीना देश का या'नी अपना नाख़ुदा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन आसमान-ए-इल्म का था इक दरख़्शाँ आफ़्ताब चश्मा-ए-नूर-ओ-ज़िया था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन मेहरबानी हर सवाली पर किया करता था वो बे-बसों का हम-नवा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन रहनुमा-ए-क़ौम हो कर भी गदा-ए-क़ौम था बेकसों का आसरा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन शरअ' का पाबंद था लेकिन तअ'स्सुब से बरी सच तो ये है देवता था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन इक दरख़्शंदा सितारा था हमारे देश का क्या बताए चर्ख़ क्या था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन

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"मैं देखता हूँ" ख़ुद को खोने का उस की आँखों में डर देखता हूँ उस के दिल में ख़ुद के लिए मैं एक घर देखता हूँ कैसे कह दूँ मैं कि लोग यहाँ यादों में मार देते हैं पर उस की यादों में ख़ुद को मैं अमर देखता हूँ डूब जाता हूँ अक्सर उस की झील सी आँखों में निगाहों को जब मैं फ़क़त नज़र भर देखता हूँ यादों का क़ाफ़िला करता है जब भी मुझे परेशाँ फ़लक में अपलक नीमशब मैं क़मर देखता हूँ देता हूँ तवज्जोह सदा सूरत के ऊपर सीरत को हर चीज़ में सीरत मैं शाम-ओ-सहर देखता हूँ होते अक्सर ख़िज़ाँ में बेरूखे शजर-ए-निस्बत ख़िज़ाँ में भी वो लहलहाता है शजर देखता हूँ सोच नज़रिया बर्ताव दुनिया से ख़ास है उस का ख़ुद पर उस की सादगी का मैं असर देखता हूँ सादगी उस की क़ल्ब में कुछ ऐसा घर कर गई कि ख़्वाबों ख़्यालों में पहर-दर-पहर देखता हूँ उस की नेकदिली की अब क्या मिसाल दूँ आप को बाग़ में न उस सेे हसीन मैं गुल-ए-तर देखता हूँ

Sandeep dabral 'sendy'

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बापू ने हर इंसान को इंसाँ समझा बहबूदी-ए-हर-फ़र्द को ईमाँ समझा इंजील को क़ुरआन को और गीता को सीने से लगाया उन्हें यकसाँ समझा ता'मीर-ए-वतन से थी मोहब्बत उस को सच्चाई का उपदेश दिया बापू ने तख़रीब-परस्ती से थी नफ़रत उस को प्रचार अहिंसा का किया बापू ने ये देश का था एकता-वादी लीडर क़ुर्बानी-ओ-ईसार के जज़्बे के तुफ़ैल मर्ग़ूब थी तंज़ीम-ए-जमाअत उस को छीना हुआ स्वराज लिया बापू ने नफ़रत से भरी आग बुझा दी उस ने तहरीक-ए-नवा खुली दबा दी उस ने वहशत-ज़दा माहौल-ए-सियह में ऐ चर्ख़ इक शम्अ'' उख़ुव्वत की जल्लादी उस ने

Charkh Chinioti

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ज़ीस्त का तर्जुमाँ है मेरा कृष्न या'नी जान-ए-जहाँ है मेरा कृष्न है वही मालिक-ए-फ़ना-ओ-बक़ा वाली-ए-दो-जहाँ है मेरा कृष्न आप जादा है आप मंज़िल है या'नी मंज़िल-निशाँ है मेरा कृष्न मेरी मंज़िल क़रीब-तर कर दी रू-कश-ए-रहबराँ है मेरा कृष्न बाग़-ए-ईमाँ को ताज़गी बख़्शी नाज़िश-ए-गुलसिताँ है मेरा कृष्न मेरी दुनिया सँवार दी उस ने मेरी रूह-ए-रवाँ है मेरा कृष्न फ़िक्र-ए-दुनिया-ओ-आक़िबत ही नहीं ज़ामिन-ए-दो-जहाँ है मेरा कृष्न

Charkh Chinioti

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जल रहे हैं दिए मुंडेरों पर हो रहा है करम अँधेरों पर तुम जो बन कर किरन किरन आओ दाग़-ए-दिल भी हँसें सवेरों पर मुस्कुराती हुई चली आओ दिल सुलगता है दाग़ जलते हैं छनछनाती हुई चली आओ आरज़ूओं के बाग़ जलते हैं हुन की देवी हो तुम मिरे घर में रोज़ दीवाली ग़म-ज़दा घर में हुन लुटाती हुई चली आओ आँसुओं के चराग़ जलते हैं जिस को कहते हैं लोग दीवाली ऊँचे आदर्श की निशानी है बाप-दादों के पाक जीवन की एक अज़्मत-भरी कहानी है

Charkh Chinioti

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ज़िंदगी इतरा रही है आज तेरे नाम पर नाज़ है पैग़म्बरों को भी तिरे पैग़ाम पर रहबर-ए-इंसानियत तेरी अक़ीदत के तुफ़ैल हम ने ग़लबा पा लिया है गर्दिश-ए-अय्याम पर मेरे दिल की वुसअ'तें अंगड़ाइयाँ लेने लगीं जल्वा देखा जब तिरा हर मोड़ पर हर गाम पर क्यूँँ न हो फिर आक़िबत की फ़िक्र से वो बे-नियाज़ ज़िंदगी क़ुर्बान कर दी जिस ने तेरे नाम पर मौजज़न है जिस में ऐ चर्ख़ इक सुरूर-ए-सरमदी मेरी दुनिया है तसद्दुक़ इस छलकते जाम पर

Charkh Chinioti

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ओम का झंडा फ़ज़ाओं में उड़ाता आया उसे तहज़ीब का सरताज बनाता आया जिस से हर क़ौम की तक़दीर बना करती है हमें अख़्लाक़ का वो दर्स सिखाता आया आत्मा साफ़ हुआ करती है जिन जज़्बों से मशअ'ल-ए-राह उन्हीं जज़्बों को बनाता आया हम दयानंद को कहते हैं पयम्बर लेकिन ख़ुद को वो क़ौम का सेवक ही बताता आया आर्य-वर्त का रौशन-तरीं मीनार था वो रौशनी सारे ज़माने को दिखाता आया क़ौम को शुद्धि की ता'लीम का उनवाँ दे कर क़ौम को ग़ैर के पंजे से छुड़ाता आया भाई-चारे से मोहब्बत से रवादारी से क़ौम को जीने का अंदाज़ सिखाता आया अपनी तहज़ीब जिसे लोग भुला बैठे थे वेद-मंतर से वही याद दिलाता आया शास्त्र और वेद के मंतर का उचारन कर के अहद-ए-माज़ी का इक आईना दिखाता आया घोर अंधकार था अज्ञान का जारी हर-सू ज्ञान अज्ञान के अंतर को मिटाता आया कुफ्र-ओ-बातिल के उड़े हाथों के तोते ऐ 'चर्ख़' हक़-परस्ती का वो यूँँ डंका बजाता आया

Charkh Chinioti

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