ज़िंदगी इतरा रही है आज तेरे नाम पर नाज़ है पैग़म्बरों को भी तिरे पैग़ाम पर रहबर-ए-इंसानियत तेरी अक़ीदत के तुफ़ैल हम ने ग़लबा पा लिया है गर्दिश-ए-अय्याम पर मेरे दिल की वुसअ'तें अंगड़ाइयाँ लेने लगीं जल्वा देखा जब तिरा हर मोड़ पर हर गाम पर क्यूँँ न हो फिर आक़िबत की फ़िक्र से वो बे-नियाज़ ज़िंदगी क़ुर्बान कर दी जिस ने तेरे नाम पर मौजज़न है जिस में ऐ चर्ख़ इक सुरूर-ए-सरमदी मेरी दुनिया है तसद्दुक़ इस छलकते जाम पर
Related Nazm
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
295 likes
"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
236 likes
"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
27 likes
"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
191 likes
More from Charkh Chinioti
ज़ीस्त का तर्जुमाँ है मेरा कृष्न या'नी जान-ए-जहाँ है मेरा कृष्न है वही मालिक-ए-फ़ना-ओ-बक़ा वाली-ए-दो-जहाँ है मेरा कृष्न आप जादा है आप मंज़िल है या'नी मंज़िल-निशाँ है मेरा कृष्न मेरी मंज़िल क़रीब-तर कर दी रू-कश-ए-रहबराँ है मेरा कृष्न बाग़-ए-ईमाँ को ताज़गी बख़्शी नाज़िश-ए-गुलसिताँ है मेरा कृष्न मेरी दुनिया सँवार दी उस ने मेरी रूह-ए-रवाँ है मेरा कृष्न फ़िक्र-ए-दुनिया-ओ-आक़िबत ही नहीं ज़ामिन-ए-दो-जहाँ है मेरा कृष्न
Charkh Chinioti
0 likes
बापू ने हर इंसान को इंसाँ समझा बहबूदी-ए-हर-फ़र्द को ईमाँ समझा इंजील को क़ुरआन को और गीता को सीने से लगाया उन्हें यकसाँ समझा ता'मीर-ए-वतन से थी मोहब्बत उस को सच्चाई का उपदेश दिया बापू ने तख़रीब-परस्ती से थी नफ़रत उस को प्रचार अहिंसा का किया बापू ने ये देश का था एकता-वादी लीडर क़ुर्बानी-ओ-ईसार के जज़्बे के तुफ़ैल मर्ग़ूब थी तंज़ीम-ए-जमाअत उस को छीना हुआ स्वराज लिया बापू ने नफ़रत से भरी आग बुझा दी उस ने तहरीक-ए-नवा खुली दबा दी उस ने वहशत-ज़दा माहौल-ए-सियह में ऐ चर्ख़ इक शम्अ'' उख़ुव्वत की जल्लादी उस ने
Charkh Chinioti
0 likes
जल रहे हैं दिए मुंडेरों पर हो रहा है करम अँधेरों पर तुम जो बन कर किरन किरन आओ दाग़-ए-दिल भी हँसें सवेरों पर मुस्कुराती हुई चली आओ दिल सुलगता है दाग़ जलते हैं छनछनाती हुई चली आओ आरज़ूओं के बाग़ जलते हैं हुन की देवी हो तुम मिरे घर में रोज़ दीवाली ग़म-ज़दा घर में हुन लुटाती हुई चली आओ आँसुओं के चराग़ जलते हैं जिस को कहते हैं लोग दीवाली ऊँचे आदर्श की निशानी है बाप-दादों के पाक जीवन की एक अज़्मत-भरी कहानी है
Charkh Chinioti
0 likes
एक मर्द-ए-बा-सफ़ा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन नेक-दिल फ़रमाँ-रवा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन सादा-दिल सादा-मिज़ाज-ओ-बा-अमल इंसान था ख़ूबियों का आइना था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन पासदार-ए-हुर्रियत था आबरू-ए-हिन्द था एक सच्चा रहनुमा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन उस के हाथों में अमानत थी वतन की ज़िंदगी इक अमीन-ए-बा-वफ़ा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन उस के हाथों में सलामत था सफ़ीना देश का या'नी अपना नाख़ुदा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन आसमान-ए-इल्म का था इक दरख़्शाँ आफ़्ताब चश्मा-ए-नूर-ओ-ज़िया था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन मेहरबानी हर सवाली पर किया करता था वो बे-बसों का हम-नवा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन रहनुमा-ए-क़ौम हो कर भी गदा-ए-क़ौम था बेकसों का आसरा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन शरअ' का पाबंद था लेकिन तअ'स्सुब से बरी सच तो ये है देवता था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन इक दरख़्शंदा सितारा था हमारे देश का क्या बताए चर्ख़ क्या था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
Charkh Chinioti
0 likes
यौम-ए-जम्हूर तेरे आने पर नाच उठे हैं मसर्रतों के पयाम इन उजालों में ज़ुल्मतें तो नहीं सोचते हैं मिरे वतन के अवाम जगमगाता है वक़्त का चेहरा बे-बसों पर जहान हँसता है अपने रुख़ पर नहीं है मौजा-ए-नूर झोंपड़ी किस तरह हो रश्क-ए-महल जाम-ए-जम्हूरियत तो पीते हैं हसरतें दम जो तोड़ दें घुट कर लेकिन इस में नहीं है कैफ़-ओ-सुरूर ज़िंदगी क्यूँँ न हो शिकार-ए-अजल अपने हसरत-भरे मुक़द्दर का इस तरह हम मज़ाक़ उड़ाते हैं ख़ुद ही रोते हैं वक़्त का रोना और फिर ख़ुद ही मुस्कुराते हैं
Charkh Chinioti
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Charkh Chinioti.
Similar Moods
More moods that pair well with Charkh Chinioti's nazm.







