यौम-ए-जम्हूर तेरे आने पर नाच उठे हैं मसर्रतों के पयाम इन उजालों में ज़ुल्मतें तो नहीं सोचते हैं मिरे वतन के अवाम जगमगाता है वक़्त का चेहरा बे-बसों पर जहान हँसता है अपने रुख़ पर नहीं है मौजा-ए-नूर झोंपड़ी किस तरह हो रश्क-ए-महल जाम-ए-जम्हूरियत तो पीते हैं हसरतें दम जो तोड़ दें घुट कर लेकिन इस में नहीं है कैफ़-ओ-सुरूर ज़िंदगी क्यूँँ न हो शिकार-ए-अजल अपने हसरत-भरे मुक़द्दर का इस तरह हम मज़ाक़ उड़ाते हैं ख़ुद ही रोते हैं वक़्त का रोना और फिर ख़ुद ही मुस्कुराते हैं
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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ज़ीस्त का तर्जुमाँ है मेरा कृष्न या'नी जान-ए-जहाँ है मेरा कृष्न है वही मालिक-ए-फ़ना-ओ-बक़ा वाली-ए-दो-जहाँ है मेरा कृष्न आप जादा है आप मंज़िल है या'नी मंज़िल-निशाँ है मेरा कृष्न मेरी मंज़िल क़रीब-तर कर दी रू-कश-ए-रहबराँ है मेरा कृष्न बाग़-ए-ईमाँ को ताज़गी बख़्शी नाज़िश-ए-गुलसिताँ है मेरा कृष्न मेरी दुनिया सँवार दी उस ने मेरी रूह-ए-रवाँ है मेरा कृष्न फ़िक्र-ए-दुनिया-ओ-आक़िबत ही नहीं ज़ामिन-ए-दो-जहाँ है मेरा कृष्न
Charkh Chinioti
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जल रहे हैं दिए मुंडेरों पर हो रहा है करम अँधेरों पर तुम जो बन कर किरन किरन आओ दाग़-ए-दिल भी हँसें सवेरों पर मुस्कुराती हुई चली आओ दिल सुलगता है दाग़ जलते हैं छनछनाती हुई चली आओ आरज़ूओं के बाग़ जलते हैं हुन की देवी हो तुम मिरे घर में रोज़ दीवाली ग़म-ज़दा घर में हुन लुटाती हुई चली आओ आँसुओं के चराग़ जलते हैं जिस को कहते हैं लोग दीवाली ऊँचे आदर्श की निशानी है बाप-दादों के पाक जीवन की एक अज़्मत-भरी कहानी है
Charkh Chinioti
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बापू ने हर इंसान को इंसाँ समझा बहबूदी-ए-हर-फ़र्द को ईमाँ समझा इंजील को क़ुरआन को और गीता को सीने से लगाया उन्हें यकसाँ समझा ता'मीर-ए-वतन से थी मोहब्बत उस को सच्चाई का उपदेश दिया बापू ने तख़रीब-परस्ती से थी नफ़रत उस को प्रचार अहिंसा का किया बापू ने ये देश का था एकता-वादी लीडर क़ुर्बानी-ओ-ईसार के जज़्बे के तुफ़ैल मर्ग़ूब थी तंज़ीम-ए-जमाअत उस को छीना हुआ स्वराज लिया बापू ने नफ़रत से भरी आग बुझा दी उस ने तहरीक-ए-नवा खुली दबा दी उस ने वहशत-ज़दा माहौल-ए-सियह में ऐ चर्ख़ इक शम्अ'' उख़ुव्वत की जल्लादी उस ने
Charkh Chinioti
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ज़िंदगी इतरा रही है आज तेरे नाम पर नाज़ है पैग़म्बरों को भी तिरे पैग़ाम पर रहबर-ए-इंसानियत तेरी अक़ीदत के तुफ़ैल हम ने ग़लबा पा लिया है गर्दिश-ए-अय्याम पर मेरे दिल की वुसअ'तें अंगड़ाइयाँ लेने लगीं जल्वा देखा जब तिरा हर मोड़ पर हर गाम पर क्यूँँ न हो फिर आक़िबत की फ़िक्र से वो बे-नियाज़ ज़िंदगी क़ुर्बान कर दी जिस ने तेरे नाम पर मौजज़न है जिस में ऐ चर्ख़ इक सुरूर-ए-सरमदी मेरी दुनिया है तसद्दुक़ इस छलकते जाम पर
Charkh Chinioti
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एक मर्द-ए-बा-सफ़ा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन नेक-दिल फ़रमाँ-रवा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन सादा-दिल सादा-मिज़ाज-ओ-बा-अमल इंसान था ख़ूबियों का आइना था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन पासदार-ए-हुर्रियत था आबरू-ए-हिन्द था एक सच्चा रहनुमा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन उस के हाथों में अमानत थी वतन की ज़िंदगी इक अमीन-ए-बा-वफ़ा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन उस के हाथों में सलामत था सफ़ीना देश का या'नी अपना नाख़ुदा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन आसमान-ए-इल्म का था इक दरख़्शाँ आफ़्ताब चश्मा-ए-नूर-ओ-ज़िया था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन मेहरबानी हर सवाली पर किया करता था वो बे-बसों का हम-नवा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन रहनुमा-ए-क़ौम हो कर भी गदा-ए-क़ौम था बेकसों का आसरा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन शरअ' का पाबंद था लेकिन तअ'स्सुब से बरी सच तो ये है देवता था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन इक दरख़्शंदा सितारा था हमारे देश का क्या बताए चर्ख़ क्या था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
Charkh Chinioti
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