" दोस्ती " ये दोस्ती क्या है यारी है क्या ? मोहब्बत से कम प्यारी है क्या ? लोग कहते हैं प्यार बड़ा है जग में, प्यार वाली दोस्ती हमारी है क्या ? दोस्त इश्क़ तू कर लेगा पर ये बता, इस के आगे कोई जानकारी है क्या ? दोस्ती में कोई समझौता होता नहीं, इस सेे बड़ी कोई जिम्मेदारी है क्या ? दोस्ती में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, भेद-भाव करना समझदारी है क्या ?
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं
Divya 'Kumar Sahab'
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"इंतिज़ार" कितनी राहें देखूँ कितना इंतिज़ार करूँँ कह दिया है उस ने दुगना इंतिज़ार करूँँ वो भी तो कभी मेरी तरह इंतिज़ार करे आख़िर मैं ही क्यूँँ तन्हा इंतिज़ार करूँँ फिर मरेगा कोई मजनूँ उस के प्यार में कह रही है फिर से लैला इंतिज़ार करूँँ इज़हार हो गया इक़रार भी कर लिया है फिर भी यही दिलासा इंतिज़ार करूँँ ज़िन्दगी है कि मरने नहीं दे रही मुझ को मौत कह रही है बस थोड़ा इंतिज़ार करूँँ
Sahil Verma
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“ख़्वाब” मैं दिन में माहताब देखता हूँ मैं रातों को आफ़ताब देखता हूँ मैं आँखों में हिजाब देखता हूँ मैं अश्कों को शराब देखता हूँ मैं सवालों में जवाब देखता हूँ मैं किताबों को शादाब देखता हूँ मैं ख़ुद को बे-नक़ाब देखता हूँ मैं तुझ को बे-हिसाब देखता हूँ मैं हर सपना नायाब देखता हूँ यूँँ ही नहीं इतने ख़्वाब देखता हूँ
Sahil Verma
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" नींद " ये नींद भी एक आफ़त है कभी आते-आते रह जाती है, तो कभी सारी रात जगाती है इस की भी क्या शराफ़त है कभी ग़मों की सैर कराती है, तो कभी दर्द चुपके सह जाती है कमाल की इस की शरारत है कभी दिन में आ कर सुलाती है, तो कभी रात में बड़ा रुलाती है बहुत ख़ूब इस की नज़ाकत है कभी मन को ख़ूब लुभाती है, कभी ख़्वाब-ए-महबूब दिखाती है बड़ी प्यारी इस की हिमाक़त है कभी तो बातें-वातें कर जाती है, कभी कुछ भी नहीं बतलाती है शायद इसे मुझ सेे मोहब्बत है कभी तन्हाइयों में आ जाती है, कभी अंगड़ाइयों में सताती है
Sahil Verma
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" तुम मुझे गले नहीं लगातीं " मेरी बाहें राह देख थक जातीं तुम्हारे सितम पर मुझ को हैरानियाँ तक नहीं आतीं और मैं तुम्हारे ख़्वाबों को नैनों से बहती धारों को इन होंठों की मुस्कानों को झुमके वाले कानों को तुम्हारे उन सभी राज़ों को अपने अनकहे वादों को कुछ मज़बूत इरादों को तुम्हारी चश्मदीद निगाहों को तुम्हारी कड़वी-मीठी बातों को तुम्हारे बँधे हुए बालों को साँवले ख़ूब-सूरत हाथों को खिलखिलाते तुम्हारे दाँतों को तुम्हारे संग बिताई यादों को कब से बाहों में भर चुका हूँ दिल-लगी से तुम्हारी तर चुका हूँ तुम इक यही रस्म क्यूँँ नहीं निभातीं आख़िर तुम मुझे गले क्यूँँ नहीं लगातीं
Sahil Verma
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" मेरा दुश्मन " तू इतना जो मुझे प्यार कर रहा है, कौन है जो तेरे कान भर रहा है तू चाहता है दोस्ती कर लूँ तुझ सेे, जानता है न तू दुश्मन बेहतर रहा है दोस्ती से अच्छी तो दुश्मनी है तेरी, पर तेरा तो दुश्मनी से जी भर रहा है तेरी ही ज़िद से दुश्मनी शुरू हुई, अब तू ही दुश्मनी से मुकर रहा है मैं तो चाहता था मिसाल दुश्मनी की, दोस्ती की बात से तो दिल डर रहा है
Sahil Verma
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