nazmKuch Alfaaz

" नींद " ये नींद भी एक आफ़त है कभी आते-आते रह जाती है, तो कभी सारी रात जगाती है इस की भी क्या शराफ़त है कभी ग़मों की सैर कराती है, तो कभी दर्द चुपके सह जाती है कमाल की इस की शरारत है कभी दिन में आ कर सुलाती है, तो कभी रात में बड़ा रुलाती है बहुत ख़ूब इस की नज़ाकत है कभी मन‌ को ख़ूब लुभाती है, कभी ख़्वाब-ए-महबूब दिखाती है बड़ी प्यारी इस की हिमाक़त है कभी तो बातें-वातें कर जाती है, कभी कुछ भी नहीं बतलाती है शायद इसे मुझ सेे मोहब्बत है कभी तन्हाइयों में आ जाती है, कभी अंगड़ाइयों में सताती है

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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

Kumar Vishwas

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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पानी कौन पकड़ सकता है जब वो इस दुनिया के शोर और ख़मोशी से क़त'अ-तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरे की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिसे सिर्फ़ दहकने से मतलब है, वो इक ऐसा फूल है जिस पर अपनी ख़ुशबू बोझ बनी है, वो इक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है, उस को छूने की ख़्वाइश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाकिफ़ है बल्कि हर इक रंग के शजरे तक से वाकिफ़ है, उस को इल्म है किन ख़्वाबों से आँखें नीली पढ़ सकती हैं, हम ने जिन को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी-कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खींचती है सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है, सिर्फ़ उसी के हाथों से सारी दुनिया तरतीब में आ सकती है, हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाइश में ज़िंदा है लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ है, हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की किस्मत में वो जिस्म कहाँ है मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है, उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कॉलेज आ जाती है

Tehzeeb Hafi

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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा

Rakesh Mahadiuree

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"इंतिज़ार" कितनी राहें देखूँ कितना इंतिज़ार करूँँ कह दिया है उस ने दुगना इंतिज़ार करूँँ वो भी तो कभी मेरी तरह इंतिज़ार करे आख़िर मैं ही क्यूँँ तन्हा इंतिज़ार करूँँ फिर मरेगा कोई मजनूँ उस के प्यार में कह रही है फिर से लैला इंतिज़ार करूँँ इज़हार हो गया इक़रार भी कर लिया है फिर भी यही दिलासा इंतिज़ार करूँँ ज़िन्दगी है कि मरने नहीं दे रही मुझ को मौत कह रही है बस थोड़ा इंतिज़ार करूँँ

Sahil Verma

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" तुम मुझे गले नहीं लगातीं " मेरी बाहें राह देख थक जातीं तुम्हारे सितम पर मुझ को हैरानियाँ तक नहीं आतीं और मैं तुम्हारे ख़्वाबों को नैनों से बहती धारों को इन होंठों की मुस्कानों को झुमके वाले कानों को तुम्हारे उन सभी राज़ों को अपने अनकहे वादों को कुछ मज़बूत इरादों को तुम्हारी चश्मदीद निगाहों को तुम्हारी कड़वी-मीठी बातों को तुम्हारे बँधे हुए बालों को साँवले ख़ूब-सूरत हाथों को खिलखिलाते तुम्हारे दाँतों को तुम्हारे संग बिताई यादों को कब से बाहों में भर चुका हूँ दिल-लगी से तुम्हारी तर चुका हूँ तुम इक यही रस्म क्यूँँ नहीं निभातीं आख़िर तुम मुझे गले क्यूँँ नहीं लगातीं

Sahil Verma

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“सुन री सखी” यूँँ ख़याल रख सखी जैसे तेरा ऐनक हूँ मैं यूँँ खिंचा जाऊँ तेरी ओर जैसे चुम्बक हूँ मैं बरसात होने के बा'द निकलते हैं कीट-पतंगे पर तुझे जो पसंद आएगा वही मेंढ़क हूँ मैं यार तू तो समझती ही नहीं है मेरी ख़ामोशी कब से इशारों में कह रहा तेरा सेवक हूँ मैं ऐ सखी क्यूँँ डरती है इक़रार-ए-मोहब्बत से यूँँ माँग रब से जैसे तेरा पूरा-पूरा हक़ हूँ मैं सावन की बरसातें बड़ी प्यारी होती हैं सखी तेरी गीली ज़ुल्फ़ें भीगी-भीगी पलक हूँ मैं देख सखी यूँँ नादानी में मुझे खो मत देना तेरा यार और इक पागल-सा बालक हूँ मैं

Sahil Verma

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“ख़्वाब” मैं दिन में माहताब देखता हूँ मैं रातों को आफ़ताब देखता हूँ मैं आँखों में हिजाब देखता हूँ मैं अश्कों को शराब देखता हूँ मैं सवालों में जवाब देखता हूँ मैं किताबों को शादाब देखता हूँ मैं ख़ुद को बे-नक़ाब देखता हूँ मैं तुझ को बे-हिसाब देखता हूँ मैं हर सपना नायाब देखता हूँ यूँँ ही नहीं इतने ख़्वाब देखता हूँ

Sahil Verma

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" बचपन की बारिश " बारिश का बहाना है, लाइट का आना-जाना है लाइट गई लाइट गई, बच्चों का चिल्लाना है दादा के कुछ क़िस्से हैं, दादी का कोई फ़साना है सब लोग भूखे हैं अभी, माँ को खाना बनाना है गली में पानी भर चुका है, काग़ज़ की नाव चलाना है माँ मैं देर से नहाऊँगा, मुझे बारिश में नहाना है ये तो बचपन की बारिश है, अब मोबाइल का ज़माना है

Sahil Verma

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