वो मौज इक मक़ाम से उफ़ुक़ की सम्त फैलती चली गई वो एक दाएरे से सैकड़ों हसीन दाएरों में देखते ही देखते बदल गई हर एक दाएरे में आफ़्ताब था हर एक दाएरे में सुर्ख़ ज़हर था हर एक दायरा हयात-ए-जावेदाँ हर एक दाएरे में मर्ग-ए-शादमाँ वो एक थी हज़ार सूरतों में मेरे सामने तुलूअ''' जब हुई तो मेरा आसमान बन गई नई अज़ीम लज़्ज़तों के दरमियाँ मैं अपने मुश्तइ'ल मक़ाम से उफ़ुक़ की सम्त फैलता चला गया हिसार-ए-मर्ग ज़िंदगी को रौंदता चला गया
Related Nazm
"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
180 likes
"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
191 likes
"दुख" मुझे जो लगा, वो नहीं हूँ मैं अब उस जगह तो नहीं हूँ तू इक कॉल मैसेज नहीं कर रही है कि ऐसी वो क्या ही शिकायत है? जो मुझ सेे तू कर नहीं पा रही है बताती नहीं है सताती रही है मुझे तू बता क्यूँ ख़फ़ा है मुझे तू बता क्या हुआ है तू कुछ बोल ये ख़ामोशी काटती है मुझे जान ले बस ये आँखें किसे रोती है बस? मुझे किस का दुख है? मुझे पूछ तू फिर बताऊँ तेरा नाम मैं और तुझे मैं सुनाऊँ दिखाऊँ मेरा ग़म मेरे ज़ख़्म जो भर नहीं पा रहे हैं मुझे तेरे ऐसे सताने का दुख है तेरे लौट के फिर न आने का दुख है मेरे पास आ मेरा दुख जान लड़की सखी कोई इतना ख़फ़ा भी नहीं होता है जैसे कि तू है कि ग़ुस्सा ज़ियादा दिनो तक नहीं करना होता है समझी ए लड़की कि ग़लती भुलाने के ख़ातिर बनी है मोहब्बत निभाने के ख़ातिर बनी है कि जब दोस्ती कर ली जाए उसे फिर निभाना भी होता है लड़की मुझे याद है तू मगर मैं भुलाया गया हूँ तू बेशक मुझे छोड़ दे पर ज़रा सुन कहीं भी कभी भी किसी भी हाँ दरिया ने प्यासे को प्यासा नहीं मारा है फिर तो अब तू चली आ घड़ी हाथ की बंद हो जाए इस सेे के पहले चली आ मेरे हाथ को थाम ले दोस्त ये ज़िंदगी बाय बोले मुझे इस सेे पहले तू आ और मुझे तू गले से लगा ले
BR SUDHAKAR
10 likes
"मैं ने उस सेे सीखा है" एक ज़माना ऐसा था मैं रूठा रूठा रहता था अब तो लहजा मीठा है मैं ग़ुस्सा ग़ुस्सा रहता था एक घुटन सी रहती थी जज़्बात नहीं बहते थे जिन आँखों में अब नूर है इन में दरिया बहता था यक़ीं न होता था मुझ को और किसी की बातों पर लोगों से तो अब मिलता हूँ तन्हा तन्हा रहता था दिल के सारे दरवाज़े मैं ने अंदर से बंद किए थे एक दरीचा मगर खुला रह गया था मुझ से और उसी से वो अंदर आया और उस ने ला-इल्मी ही सब के सब दरवाज़े खोल दिए तुम हॅंसते मुस्कुराते रहना दिल की बातें खुल के कहना मैं जो कोई रोज़ चली भी जाऊॅं अपने आप से मिलते रहना और उस ने ये जाते वक़्त कहा था कि नाज़ ज़िंदगी खुल के जीना तुम में और मुझ में बस फ़र्क इतना है तुम को शायद आता था मैं ने उस सेे सीखा है
Naaz ishq
5 likes
ये दौर-ए-नौ-मुबारक फ़र्ख़न्दा-अख़तरी का जम्हूरियत का आग़ाज़ अंजाम क़ैसरी का क्या जाँ-फ़ज़ा है जल्वा ख़ुर्शीद-ए-ख़ावरी का हर इक शुआ-ए-रक़्साँ मिस्रा है अनवरी का रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का भारत की बरतरी में किस को कलाम है अब था जो रहीन-ए-पस्ती गर्दूं-मक़ाम है अब जम्हूरियत पे क़ाएम सारा निज़ाम है अब आला है या है अदना बा-एहतिराम है अब रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का सदियों के बंद टूटे आज़ाद होगए हम क़ैद-ए-गिराँ से छूटे दिल-ए-शाद हो गए हम बे-ख़ौफ़ बे-नियाज़-ए-सय्याद हो गए हम फिर बस गया नशेमन आबाद होगए हम रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का जो मुज़्तरिब थी दिल में वो आरज़ू बर आई तकमील-ए-आरज़ू ने दिल की ख़लिश मिटाई जिस मुल्क पर ग़ुलामी बन बन के शाम छाई सुब्ह-ए-मसर्रत उस को अल्लाह ने दिखाई रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-'गाँधी' तफ़्सीर-ए-हाल-ए-'नेहरू' 'आज़ाद' की रियाज़त 'सरदार' की तगापू रख़्शाँ है हुर्रियत का ज़ेबा-निगार दिल-जू तस्कीन-ए-क़ल्ब मुस्लिम आराम-ए-जान-ए-हिन्दू रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का क़ुर्बां हुए जो इस पर रूहें हैं शाद उन की हम जिस से बहरा-वर हैं वो है मुराद उन की है बस-कि सरफ़रोशी शायान-ए-दाद उन की भारत की इस ख़ुशी में शामिल है याद उन की रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का आज़ाद हो गया जब हिन्दोस्ताँ हमारा है सूद के बराबर हर इक ज़ियाँ हमारा मंज़िल पे आन पहुँचा जब कारवाँ हमारा क्यूँँ हो गुबार-ए-मंज़िल ख़ातिर-निशाँ हमारा रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का ऐवान-ए-फ़र्रुख़ी की तामीर-ए-नौ मुबारक आईन-ए-ज़िंदगी की तदबीर-ए-नौ मुबारक हर ज़र्रा-ए-वतन को तनवीर-ए-नौ मुबारक भारत के हर बशर को तौक़ीर-ए-नौ मुबारक रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का भारत का अज़्म है ये तौफ़ीक़ ऐ ख़ुदा दे दुनिया से ईन-ओ-आँ की तफ़रीक़ को मिटा दे अम्न-ओ-अमाँ से रहना हर मुल्क को सिखा दे हर क़ौम शुक्रिये में हर साल ये सदा दे रोज़-ए-सईद आया छब्बीस जनवरी का दौर-ए-जदीद लाया भारत की बरतरी का
Tilok Chand Mahroom
5 likes
More from Balraj Komal
हमारे मुन्ने को चाह थी रेडियो ख़रीदें कि अब हमारे यहाँ फ़राग़त की रौशनी थी मैं अपनी देरीना तंग-दस्ती की दास्ताँ उस को क्या सुनाता उठा के ले आया तंग-ओ-तारीक कोठरी से क़लील तनख़्वाह के चिचोड़े हुए निवाले और उन में मेरी नहीफ़ बीवी ने अपनी दो-चार बाक़ी-माँदा शिकस्त-आमेज़ आरज़ूओं का ख़ून डाला न जाने कब से था प्यारे मुन्ने ने रेडियो का ये ख़्वाब पाला ये एक हफ़्ते की बात है और कल से मुन्ना ये कह रहा है ये जानवर सुब्ह-ओ-शाम बे-कार बोलता है मुहीब ख़बरों का ज़हर गीतों में घोलता है गली में कोई फ़क़ीर आए तो उस को दे दो मुझे इकन्नी का मोर ले दो
Balraj Komal
0 likes
मुश्तहर मौत की आरज़ू ने उसे मुज़्तरिब कर दिया इस क़दर एक दिन वो सलीबों के आदाद पर रोज़-ओ-शब ग़ौर करने लगा इम्तिहाँ के लिए दश्त को चल दिया अपने हिस्से की जब मुंतख़ब कर चुका उस ने तारीख़ के ज़र्द और एक पर नाम अपना ख़ुशी से रक़म कर दिया एक पर उस का सर दूसरी पर जिगर तेरी पर लटकता हुआ उस का जज़्बों से मा'मूर दिल उस की आँतें यहाँ उस की फाँकें यहाँ उस की अपनी सलीब आज कोई नहीं ज़र्द औराक़ से मिट गए सब निशाँ दश्त में दूर तक चीख़ती आँधियाँ ख़त्म उस की हुई मुश्तहर दास्ताँ
Balraj Komal
0 likes
कुछ लोग ये कहते हैं कि अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं है तक़रीब-ए-विलादत हो या हंगाम-ए-दम-ए-मर्ग इक लम्हे को तस्वीर में ढलना है वो ढल जाता है आख़िर वो नग़्मा हो या गिर्या या अंदाज़-ए-तकल्लुम सब अक्स हैं असरार-ए-फ़ुसूँ-कार के शायद यकसाँ हैं मुकाफ़ात की यूरिश में सभी रंग सरगोशियाँ करते हैं गुज़र जाते हैं आँखों के जहाँ से पैमाना-ए-जाँ से क्या झूट है क्या सच है किसे कौन बताए सब शोर-ए-सलासिल में उतर आए हैं कुछ सोच रहे हैं तस्वीर के दो रुख़ थे कभी सुनते हैं अब लाख हुए हैं इंसान या हैवान या बे-जान कोई नाम नहीं है इक रक़्स-ए-तमव्वुज है शबीहों का हय्यूलों का सदाओं का फ़रामोश दिलों का इस राह से गुज़रे थे तुम्हें रोक लिया अपना समझ कर बातें भी हुईं तुम को ज़रा देर को सीने से लगाया आँखों में दिल ओ जाँ में बसाया जाओगे तुम्हें जाना है मालूम था मुझ को सच ये है कि तनवीर-ए-मुलाक़ात से रौशन था ये लम्हा सच ये है कि सर-ए-राह चराग़ उस ने जलाया सच ये है कि बे-साख़्ता जज़्बात से रौशन था ये लम्हा इमरोज़ ये मेरा था, मगर मेरी दुआ है ये लम्हा हम दोनों के इम्कान का मेहवर कल भी ये करे दोनों को हम दोनों को सरशार मुनव्वर
Balraj Komal
0 likes
मैं रात और दिन की मसाफ़त में रंगों की तफ़्सीर में अपने सारे अज़ीज़ों के अपने ही हाथों से क़त्ल-ए-मुसलसल में मसरूफ़ हूँ फिर मैं क्यूँँ सोचता हूँ सर-ए-जाम, हर शब कि दीदा-वरी की मता-ए-फ़िरोज़ाँ से सरशार होता तो हर ख़ुफ़्ता सर-बस्ता तहरीर से मैं गले मिल के रोता सदाओं की सरगोशियों में उतरता अजब हादसा है कि कुछ देर पहले मिरे सामने एक घाइल परिंदा गिरा है मिरे पाँव में सामने के फ़सुर्दा ओ बे-बर्ग बे-रंग से पेड़ से मेरे जाम-ए-शिकस्ता में बाक़ी थे क़तरे मय-ए-ख़ाम के कुछ इन्हें चश्म-ए-मिन्क़ार से ये मुसाफ़िर बड़े ग़ौर से देखता है इन्हें गिन रहा है ये शायद मैं सैलाब-ए-तहलील में हूँ यहाँ से कहाँ जाऊँगा दूर गर जा सकता तो वहाँ से यहाँ लौट कर किस तरह आऊँगा मैं
Balraj Komal
0 likes
इस क़दर तीरा ओ सर्द हरगिज़ न था दिल का मौसम कभी एक पल में ख़ुदा जाने क्या हो गया चाँद की वादियों में उतर आई शब! मैं वो तन्हा सुबुक-पा मुसाफ़िर था तकमील की जुस्तुजू खींच लाई थी इक रोज़ जिस को यहाँ आरज़ू थी मुझे मैं ज़मीं के लिए मेरी तर्रार पुरकार चश्म-ए-निहाँ फ़ासलों सरहदों वक़्त के सब हिसारों के उस पार की शहर-ए-इमरोज़ में अन-गिनत ख़ूब-सूरत तसावीर आवेज़ां कर देगी जब दूर की हर पुर-असरार सरशार आवाज़ मेरे लहू में उतर जाएगी मेरे दामन को फूलों से भर जाएगी सर्द से सर्द-तर हर घड़ी हो रही है रग-ओ-पै में बहते अनासिर की रौ शब गुज़र जाएगी चाँद की मुंजमिद वादियों में सुलगती हुई रौशनी सुब्ह-दम एक पल में उमँड आएगी मुझ को डर है मगर साअत-ए-नौ के हंगाम से पेशतर तीरा सर्द शब का भयानक अमल दिल के आफ़ाक़ पर हो न जाए कहीं मौत तक हुक्मराँ ख़त्म हो जाए तकमील की दास्ताँ!!
Balraj Komal
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Balraj Komal.
Similar Moods
More moods that pair well with Balraj Komal's nazm.







