इक हर्फ़-ए-मुद्दआ' था लबों पे खटकता था फाँस सा इक नाम था ज़बान का छाला बना हुआ लो मैं ज़बाँ तराश के ख़ामोश हो गई लो अब तो मेरी आँख में आँसू नहीं कोई बस एक मेरा गुंग मिरा हर्फ़-ए-मुद्दआ'
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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"दुख" मुझे जो लगा, वो नहीं हूँ मैं अब उस जगह तो नहीं हूँ तू इक कॉल मैसेज नहीं कर रही है कि ऐसी वो क्या ही शिकायत है? जो मुझ सेे तू कर नहीं पा रही है बताती नहीं है सताती रही है मुझे तू बता क्यूँ ख़फ़ा है मुझे तू बता क्या हुआ है तू कुछ बोल ये ख़ामोशी काटती है मुझे जान ले बस ये आँखें किसे रोती है बस? मुझे किस का दुख है? मुझे पूछ तू फिर बताऊँ तेरा नाम मैं और तुझे मैं सुनाऊँ दिखाऊँ मेरा ग़म मेरे ज़ख़्म जो भर नहीं पा रहे हैं मुझे तेरे ऐसे सताने का दुख है तेरे लौट के फिर न आने का दुख है मेरे पास आ मेरा दुख जान लड़की सखी कोई इतना ख़फ़ा भी नहीं होता है जैसे कि तू है कि ग़ुस्सा ज़ियादा दिनो तक नहीं करना होता है समझी ए लड़की कि ग़लती भुलाने के ख़ातिर बनी है मोहब्बत निभाने के ख़ातिर बनी है कि जब दोस्ती कर ली जाए उसे फिर निभाना भी होता है लड़की मुझे याद है तू मगर मैं भुलाया गया हूँ तू बेशक मुझे छोड़ दे पर ज़रा सुन कहीं भी कभी भी किसी भी हाँ दरिया ने प्यासे को प्यासा नहीं मारा है फिर तो अब तू चली आ घड़ी हाथ की बंद हो जाए इस सेे के पहले चली आ मेरे हाथ को थाम ले दोस्त ये ज़िंदगी बाय बोले मुझे इस सेे पहले तू आ और मुझे तू गले से लगा ले
BR SUDHAKAR
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“शब्द ” उदास हूँ ,परेशान हूँ ,बेजार हूँ किसी आबाद शहर में ,वीरान वन में एक शब्द की तलाश में हूँ वो शब्द , जो मुझे बयाँ कर सके जो मुझे अपना कह सके जो उजाड़ में भी , मुझे आबाद कर सके कमजोर वक़्त में , मुझे शांत कर सके जो मेरी कविता का अंग बन सके और मेरी तरह ख़ुद भी बदनाम हो सके
Pritam sihag
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ज़बानों के रस में ये कैसी महक है ये बोसा कि जिस से मोहब्बत की सहबा की उड़ती है ख़ुश्बू ये बद-मस्त ख़ुश्बू जो गहरा ग़ुनूदा नशा ला रही है ये कैसा नशा है मेरे ज़ेहन के रेज़े रेज़े में एक आँख सी खुल गई है तुम अपनी ज़बाँ मेरे मुँह में रखे जैसे पाताल से मेरी जाँ खींचते हो ये भीगा हुआ गर्म ओ तारीक बोसा अमावस की काली बरसती हुई रात जैसे उमड़ती चली आ रही है कहीं कोई साअत अज़ल से रमीदा मिरी रूह के दश्त में उड़ रही थी वो साअत क़रीं-तर चली आ रही है मुझे ऐसा लगता है तारीकियों के लरज़ते हुए पुल को मैं पार करती चली जा रही हूँ ये पुल ख़त्म होने को है और अब उस के आगे कहीं रौशनी है
Fahmida Riaz
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कितने बख़्त वाले हो ज़िंदगी में जो चाहा तुम ने पा लिया आख़िर अज़्म और हिम्मत से फ़ह्म से ज़कावत से है तुम्हारे दामन में फूल कामरानी का और तुम्हारे माथे पर फ़ख़्र का सितारा है अब तुम्हारे चेहरे पर ऐसी शादमानी है कोई कह नहीं सकता दर्द से भी वाक़िफ़ हो और तुम्हारे पाँव में देर से खटकता है आरज़ू का इक काँटा जिस से ख़ून रिसता है लाला-ज़ार राहों पर इस लहू की सुर्ख़ी की काँपती लकीरें हैं इन लहू के धब्बों में ना-तमाम मुबहम सी एक बात लिखी है
Fahmida Riaz
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लाओ हाथ अपना लाओ ज़रा छू के मेरा बदन अपने बच्चे के दिल का धड़कना सुनो नाफ़ के उस तरफ़ उस की जुम्बिश को महसूस करते हो तुम बस यहीं छोड़ दो थोड़ी देर और उस हाथ को मेरे ठंडे बदन पर यहीं छोड़ दो मेरे बे-कल नफ़स को क़रार आ गया मेरे ईसा मिरे दर्द के चारा-गर मेरा हर मू-ए-तन उस हथेली से तस्कीन पाने लगा उस हथेली के नीचे मिरा लाल करवट सी लेने लगा उँगलियों से बदन उस का पहचान लो तुम उसे जान लो चूमने दो मुझे अपनी ये उँगलियाँ उन की हर पोर को चूमने दो मुझे नाख़ुनों को लबों से लगा लूँ ज़रा फूल लाती हुई ये हरी उँगलियाँ मेरी आँखों से आँसू उबलते हुए उन से सींचूँगी में फूल लाती हुई उँगलियों की जड़ें चूमने दो मुझे अपने बाल अपने माथे का चाँद अपने लब ये चमकती हुई काली आँखें मिरे काँपते होंट मेरी छलकती हुई आँख को देख कर कितनी हैरान हैं तुम को मा'लूम क्या तुम को मा'लूम क्या तुम ने जाने मुझे क्या से क्या कर दिया मेरे अंदर अँधेरे का आसेब था या कराँ ता कराँ एक अनमिट ख़ला यूँँही फिरती थी मैं ज़ीस्त के ज़ाइक़े को तरसती हुई दिल में आँसू भरे सब पे हँसती हुई तुम ने अंदर मिरा इस तरह भर दिया फूटती है मिरे जिस्म से रौशनी सब मुक़द्दस किताबें जो नाज़िल हुईं सब पयम्बर जो अब तक उतारे गए सब फ़रिश्ते कि हैं बादलों से परे रंग संगीत सर फूल कलियाँ शजर सुब्ह-दम पेड़ की झूमती डालियाँ उन के मफ़्हूम जो भी बताए गए ख़ाक पर बसने वाले बशर को मसर्रत के जितने भी नग़्में सुनाए गए सब ऋषी सब मुनी अंबिया औलिया ख़ैर के देवता हुस्न नेकी ख़ुदा आज सब पर मुझे ए'तिबार आ गया ए'तिबार आ गया
Fahmida Riaz
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दिल्ली! तिरी छाँव बड़ी क़हरी मिरी पूरी काया पिघल रही मुझे गले लगा कर गली गली धीरे से कहे'' तू कौन है री?'' मैं कौन हूँ माँ तिरी जाई हूँ पर भेस नए से आई हूँ मैं रमती पहुँची अपनों तक पर प्रीत पराई लाई हूँ तारीख़ की घोर गुफाओं में शायद पाए पहचान मिरी था बीज में देस का प्यार घुला परदेस में क्या क्या बेल चढ़ी नस नस में लहू तो तेरा है पर आँसू मेरे अपने हैं होंटों पर रही तिरी बोली पर नैन में सिंध के सपने हैं मन माटी जमुना घाट की थी पर समझ ज़रा उस की धड़कन इस में कारूंझर की सिसकी इस में हो के डालता चलतन! तिरे आँगन मीठा कुआँ हँसे क्या फल पाए मिरा मन रोगी इक रीत नगर से मोह मिरा बसते हैं जहाँ प्यासे जोगी तिरा मुझ से कोख का नाता है मिरे मन की पीड़ा जान ज़रा वो रूप दिखाऊँ तुझे कैसे जिस पर सब तन मन वार दिया क्या गीत हैं वो कोह-यारों के क्या घाइल उन की बानी है क्या लाज रंगी वो फटी चादर जो थर्की तपत ने तानी है वो घाव घाव तन उन के पर नस नस में अग्नी दहकी वो बाट घिरी संगीनों से और झपट शिकारी कुत्तों की हैं जिन के हाथ पर अँगारे मैं उन बंजारों की चीरी माँ उन के आगे कोस कड़े और सर पे कड़कती दो-पहरी मैं बंदी बाँधूँ की बाँदी वो बंदी-ख़ाने तोड़ेंगे है जिन हाथों में हाथ दिया सो सारी सलाख़ें मोड़ेंगे तू सदा सुहागन हो माँ री! मुझे अपनी तोड़ निभाना है री दिल्ली छू कर चरण तिरे मुझ को वापस मुड़ जाना है
Fahmida Riaz
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पथरीले कोहसार के गाते चश्मों में गूँज रही है एक औरत की नर्म हँसी दौलत ताक़त और शोहरत सब कुछ भी नहीं उस के बदन में छुपी है उस की आज़ादी दुनिया के मा'बद के नए बुत कुछ कर लें सुन नहीं सकते उस की लज़्ज़त की सिसकी इस बाज़ार में गो हर माल बिकाऊ है कोई ख़रीद के लाए ज़रा तस्कीन उस की इक सरशारी जिस से वो ही वाक़िफ़ है चाहे भी तो उस को बेच नहीं सकती वादी की आवारा हवाओ आ जाओ आओ और उस के चेहरे पर बोसे दो अपने लम्बे लम्बे बाल उड़ाती जाए हवा की बेटी साथ हवा के गाती जाए
Fahmida Riaz
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