ज़बानों के रस में ये कैसी महक है ये बोसा कि जिस से मोहब्बत की सहबा की उड़ती है ख़ुश्बू ये बद-मस्त ख़ुश्बू जो गहरा ग़ुनूदा नशा ला रही है ये कैसा नशा है मेरे ज़ेहन के रेज़े रेज़े में एक आँख सी खुल गई है तुम अपनी ज़बाँ मेरे मुँह में रखे जैसे पाताल से मेरी जाँ खींचते हो ये भीगा हुआ गर्म ओ तारीक बोसा अमावस की काली बरसती हुई रात जैसे उमड़ती चली आ रही है कहीं कोई साअत अज़ल से रमीदा मिरी रूह के दश्त में उड़ रही थी वो साअत क़रीं-तर चली आ रही है मुझे ऐसा लगता है तारीकियों के लरज़ते हुए पुल को मैं पार करती चली जा रही हूँ ये पुल ख़त्म होने को है और अब उस के आगे कहीं रौशनी है
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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लाओ हाथ अपना लाओ ज़रा छू के मेरा बदन अपने बच्चे के दिल का धड़कना सुनो नाफ़ के उस तरफ़ उस की जुम्बिश को महसूस करते हो तुम बस यहीं छोड़ दो थोड़ी देर और उस हाथ को मेरे ठंडे बदन पर यहीं छोड़ दो मेरे बे-कल नफ़स को क़रार आ गया मेरे ईसा मिरे दर्द के चारा-गर मेरा हर मू-ए-तन उस हथेली से तस्कीन पाने लगा उस हथेली के नीचे मिरा लाल करवट सी लेने लगा उँगलियों से बदन उस का पहचान लो तुम उसे जान लो चूमने दो मुझे अपनी ये उँगलियाँ उन की हर पोर को चूमने दो मुझे नाख़ुनों को लबों से लगा लूँ ज़रा फूल लाती हुई ये हरी उँगलियाँ मेरी आँखों से आँसू उबलते हुए उन से सींचूँगी में फूल लाती हुई उँगलियों की जड़ें चूमने दो मुझे अपने बाल अपने माथे का चाँद अपने लब ये चमकती हुई काली आँखें मिरे काँपते होंट मेरी छलकती हुई आँख को देख कर कितनी हैरान हैं तुम को मा'लूम क्या तुम को मा'लूम क्या तुम ने जाने मुझे क्या से क्या कर दिया मेरे अंदर अँधेरे का आसेब था या कराँ ता कराँ एक अनमिट ख़ला यूँँही फिरती थी मैं ज़ीस्त के ज़ाइक़े को तरसती हुई दिल में आँसू भरे सब पे हँसती हुई तुम ने अंदर मिरा इस तरह भर दिया फूटती है मिरे जिस्म से रौशनी सब मुक़द्दस किताबें जो नाज़िल हुईं सब पयम्बर जो अब तक उतारे गए सब फ़रिश्ते कि हैं बादलों से परे रंग संगीत सर फूल कलियाँ शजर सुब्ह-दम पेड़ की झूमती डालियाँ उन के मफ़्हूम जो भी बताए गए ख़ाक पर बसने वाले बशर को मसर्रत के जितने भी नग़्में सुनाए गए सब ऋषी सब मुनी अंबिया औलिया ख़ैर के देवता हुस्न नेकी ख़ुदा आज सब पर मुझे ए'तिबार आ गया ए'तिबार आ गया
Fahmida Riaz
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रणभूमी में लड़ते लड़ते मैं ने कितने साल इक दिन जल में छाया देखी चट्टे हो गए बाल पापड़ जैसी हुईं हड्डियाँ जलने लगे हैं दाँत जगह जगह झुर्रियों से भर गई सारे तन की खाल देख के अपना हाल हुआ फिर उस को बहुत मलाल अरे मैं बुढ़िया हो जाऊँगी आया न था ख़याल उस ने सोचा गर फिर से मिल जाए जवानी जिस को लिखते हैं दीवानी और मस्तानी जिस में उस ने इंक़लाब लाने की ठानी वही जवानी अब की बार नहीं दूँगी कोई क़ुर्बानी बस ला-हौल पढ़ूँगी और नहीं दूँगी कोई क़ुर्बानी दिल ने कहा किस सोच में है ऐ पागल बढ़िया कहाँ जवानी या'नी उस को गुज़रे अब तक काफ़ी अर्सा बीत चुका है ये ख़याल भी देर से आया बस अब घर जा बुढ़िया ने कब उस की मानी हालाँकि अब वो है नानी ज़ाहिर है अब और वो कर भी क्या सकती थी आसमान पर लेकिन तारे आँख-मिचोली खेल रहे थे रात के पंछी बोल रहे थे और कहते थे ये शायद उस की आदत है या शायद उस की फ़ितरत है
Fahmida Riaz
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क़तरा-क़तरा दिल में आँसू गिरते हैं इक आँसू उस शख़्स का जो बेगाना है इक आँसू उस नाम का जो हम ले न सके इक आँसू उस दुआ का जो पूरी न हुई एक फ़ुज़ूल सी बात कि जो बे-सूद कही आँसू मेरा ख़्वाब मैं जिस से घबराऊँ आँसू मेरी मुराद जिसे मैं भुलाऊँ इक आँसू उस चेहरे का जो याद रहे आँखों के रस्ते जो दिल में उतर जाए इक आँसू उस ठहरे-ठहरे लहजे का इक आँसू उस वह्म का ज़ह्न में जो आया इक आँसू उस झूट का जो औरों से कहा फीकी हँसी से कैसे क़िस्सा ख़त्म किया लम्हा-लम्हा रात गुज़रती जाती है क़तरा-क़तरा दिल में आँसू गिरते हैं
Fahmida Riaz
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एक है ऐसी लड़की जिस से तुम ने हँस कर बात न की कभी न देखा उस की आँखों में चमके कैसे मोती कभी न सोचा तुम से ऐसी बातें वो क्यूँँ कहती है कभी न समझा मिलते हो तो घबराई क्यूँँ रहती है कैसे उस रुख़्सार की रंगत सरसों जैसी ज़र्द हुई जब तक मिली नहीं थी तुम से वो ऐसी तन्हा तो न थी मिल कर आँख बहाने से वो कब तक आँसू रोकेगी उस के होंटों की लर्ज़िश भी तुम ने कभी नहीं देखी क्यूँँ ऐसी सुनसान सड़क पर उसे अकेला छोड़ दिया उस का दिल तो अच्छा दिल था जिस को तुम ने यूँँ तोड़ दिया वो कुछ नादिम वो कुछ हैराँ रस्ता ढूँडा करती थी ढलती धूप में अपना बे कल साया देख के हँसती थी आख़िर सूरज डूब गया और राह में उस को शाम हुई
Fahmida Riaz
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ऐ दिल-ए-काफ़िर इज्ज़ से मुनकिर आज तिरा सर ख़म क्यूँँ है तेरी हटेली शिरयानों में ये बेबस मातम क्यूँँ है आँख तो रोना भूल गई थी फिर हर मंज़र नम क्यूँँ है मत रोको बहने दो आँसू किसी को करते हैं प्रणाम आप झुका है झुकने दो सर छुपा था उस में कोई सलाम शायद उस के हुज़ूर में हो तुम जिस को कहते हैं अंजाम वो हस्ती की सरहद-ए-आख़िर हुआ जहाँ हर सफ़र तमाम बेबस है इंसाँ बेबस है तकती रह गई रोती शाम उठ गया कोई भरी दुनिया से बाक़ी रहे ख़ुदा का नाम या फिर काग़ज़ पर परछाईं मिलेगा जिस को सब्त-ए-दवाम ये टुकड़े इंसानी दिल के शाएर और शाएर का कलाम नाज़ करूँँगी ख़ुश-बख़्ती में मैं ने 'फ़िराक़' को देखा था उजड़े घर में वो तहज़ीबों के संगम पर बैठा था गर्म हम-आग़ोशी सदियों की होगी कितनी प्यार भरी जिस की बाँहों में खेली थी उस की सोच की सुंदरता शे'र का दिल शफ़्फ़ाफ़ था इतना जैसे आईना-ए-तारीख़ क्या भर पूर विसाल था जिस ने उस शाएर को जन्म दिया गर तारीख़ ने पागल हो कर ख़ुद अपना सर फोड़ा है ख़ून उछाला है गलियों में अपना हंडोला तोड़ा है छींट न थी दामन पर उस के कौन घाट धो बैठा था जिसे समझते हो ना-मुम्किन वो उस इंसाँ जैसा था इंसाँ भी इतना मामूली जैसे अपना हम-साया अपने शे'र सुनाना उस का और ख़ुद हैराँ हो जाना बातों में मासूम महक थी आँखों में बेचैन लपक ख़ामोशी के वक़्फ़े यूँँ जैसे उस ने कुछ देखा था पीड़ बहुत झेली थी उस ने इतनी बात तो ज़ाहिर थी लहजा में शोख़ी थी जैसे राख में चमके अँगारा संगम के पानी पर मैं ने देखी थी कैसी तस्वीर उड़ा लहक कर इक जल-पंछी खींच गया पानी पे लकीर जमुना की नीली गहराई भेद भरी चुप से बोझल गँगा के धारे की जुम्बिश उजली ताक़त और बे-कल इस पानी में अक्स डालता आसमान का इक टुकड़ा मिट्टी के बुत हरे नारियल चंदन लगा कोई मुखड़ा वो धारों पर नाव खेता सूखा पंजर माँझी का दान के पैसे गिनता पंडित ताँबा सूरज सांझी का जमुना पर मीनार क़िला के गुम्बद का तिरछा साया पाकिस्तान से आए मुहाजिर गेंदे की टूटी माला पानी में चप्पू की शप शप बातों के टूटे टुकड़े यहीं कहीं पर हम से ओझल सरस्वती भी बहती है जो समझी जो आगे समझूँ छलक रहा है दिल का जाम वो मंज़र जो ख़ुद से बड़ा था उस का घेरा तुम्हारे नाम ये कमरे का माँद उजाला बाहर हूक पपिहे की खिड़की पर बूँदों की दस्तक साँसें भरती ख़ामोशी पूरी बात नहीं बतलाता गूँगे आँसू रो देना तेरी धरती सह न सकेगी इतने हुस्न को खो देना तन्हा और अपाहिज बूढ़े तुझे न मरने देंगे लोग अभी तो जीवन बाँझ नहीं है फिर तुझ को जन्मेंगे लोग
Fahmida Riaz
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