nazmKuch Alfaaz

एक है ऐसी लड़की जिस से तुम ने हँस कर बात न की कभी न देखा उस की आँखों में चमके कैसे मोती कभी न सोचा तुम से ऐसी बातें वो क्यूँँ कहती है कभी न समझा मिलते हो तो घबराई क्यूँँ रहती है कैसे उस रुख़्सार की रंगत सरसों जैसी ज़र्द हुई जब तक मिली नहीं थी तुम से वो ऐसी तन्हा तो न थी मिल कर आँख बहाने से वो कब तक आँसू रोकेगी उस के होंटों की लर्ज़िश भी तुम ने कभी नहीं देखी क्यूँँ ऐसी सुनसान सड़क पर उसे अकेला छोड़ दिया उस का दिल तो अच्छा दिल था जिस को तुम ने यूँँ तोड़ दिया वो कुछ नादिम वो कुछ हैराँ रस्ता ढूँडा करती थी ढलती धूप में अपना बे कल साया देख के हँसती थी आख़िर सूरज डूब गया और राह में उस को शाम हुई

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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ज़बानों के रस में ये कैसी महक है ये बोसा कि जिस से मोहब्बत की सहबा की उड़ती है ख़ुश्बू ये बद-मस्त ख़ुश्बू जो गहरा ग़ुनूदा नशा ला रही है ये कैसा नशा है मेरे ज़ेहन के रेज़े रेज़े में एक आँख सी खुल गई है तुम अपनी ज़बाँ मेरे मुँह में रखे जैसे पाताल से मेरी जाँ खींचते हो ये भीगा हुआ गर्म ओ तारीक बोसा अमावस की काली बरसती हुई रात जैसे उमड़ती चली आ रही है कहीं कोई साअत अज़ल से रमीदा मिरी रूह के दश्त में उड़ रही थी वो साअत क़रीं-तर चली आ रही है मुझे ऐसा लगता है तारीकियों के लरज़ते हुए पुल को मैं पार करती चली जा रही हूँ ये पुल ख़त्म होने को है और अब उस के आगे कहीं रौशनी है

Fahmida Riaz

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दिल्ली! तिरी छाँव बड़ी क़हरी मिरी पूरी काया पिघल रही मुझे गले लगा कर गली गली धीरे से कहे'' तू कौन है री?'' मैं कौन हूँ माँ तिरी जाई हूँ पर भेस नए से आई हूँ मैं रमती पहुँची अपनों तक पर प्रीत पराई लाई हूँ तारीख़ की घोर गुफाओं में शायद पाए पहचान मिरी था बीज में देस का प्यार घुला परदेस में क्या क्या बेल चढ़ी नस नस में लहू तो तेरा है पर आँसू मेरे अपने हैं होंटों पर रही तिरी बोली पर नैन में सिंध के सपने हैं मन माटी जमुना घाट की थी पर समझ ज़रा उस की धड़कन इस में कारूंझर की सिसकी इस में हो के डालता चलतन! तिरे आँगन मीठा कुआँ हँसे क्या फल पाए मिरा मन रोगी इक रीत नगर से मोह मिरा बसते हैं जहाँ प्यासे जोगी तिरा मुझ से कोख का नाता है मिरे मन की पीड़ा जान ज़रा वो रूप दिखाऊँ तुझे कैसे जिस पर सब तन मन वार दिया क्या गीत हैं वो कोह-यारों के क्या घाइल उन की बानी है क्या लाज रंगी वो फटी चादर जो थर्की तपत ने तानी है वो घाव घाव तन उन के पर नस नस में अग्नी दहकी वो बाट घिरी संगीनों से और झपट शिकारी कुत्तों की हैं जिन के हाथ पर अँगारे मैं उन बंजारों की चीरी माँ उन के आगे कोस कड़े और सर पे कड़कती दो-पहरी मैं बंदी बाँधूँ की बाँदी वो बंदी-ख़ाने तोड़ेंगे है जिन हाथों में हाथ दिया सो सारी सलाख़ें मोड़ेंगे तू सदा सुहागन हो माँ री! मुझे अपनी तोड़ निभाना है री दिल्ली छू कर चरण तिरे मुझ को वापस मुड़ जाना है

Fahmida Riaz

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लाओ हाथ अपना लाओ ज़रा छू के मेरा बदन अपने बच्चे के दिल का धड़कना सुनो नाफ़ के उस तरफ़ उस की जुम्बिश को महसूस करते हो तुम बस यहीं छोड़ दो थोड़ी देर और उस हाथ को मेरे ठंडे बदन पर यहीं छोड़ दो मेरे बे-कल नफ़स को क़रार आ गया मेरे ईसा मिरे दर्द के चारा-गर मेरा हर मू-ए-तन उस हथेली से तस्कीन पाने लगा उस हथेली के नीचे मिरा लाल करवट सी लेने लगा उँगलियों से बदन उस का पहचान लो तुम उसे जान लो चूमने दो मुझे अपनी ये उँगलियाँ उन की हर पोर को चूमने दो मुझे नाख़ुनों को लबों से लगा लूँ ज़रा फूल लाती हुई ये हरी उँगलियाँ मेरी आँखों से आँसू उबलते हुए उन से सींचूँगी में फूल लाती हुई उँगलियों की जड़ें चूमने दो मुझे अपने बाल अपने माथे का चाँद अपने लब ये चमकती हुई काली आँखें मिरे काँपते होंट मेरी छलकती हुई आँख को देख कर कितनी हैरान हैं तुम को मा'लूम क्या तुम को मा'लूम क्या तुम ने जाने मुझे क्या से क्या कर दिया मेरे अंदर अँधेरे का आसेब था या कराँ ता कराँ एक अनमिट ख़ला यूँँही फिरती थी मैं ज़ीस्त के ज़ाइक़े को तरसती हुई दिल में आँसू भरे सब पे हँसती हुई तुम ने अंदर मिरा इस तरह भर दिया फूटती है मिरे जिस्म से रौशनी सब मुक़द्दस किताबें जो नाज़िल हुईं सब पयम्बर जो अब तक उतारे गए सब फ़रिश्ते कि हैं बादलों से परे रंग संगीत सर फूल कलियाँ शजर सुब्ह-दम पेड़ की झूमती डालियाँ उन के मफ़्हूम जो भी बताए गए ख़ाक पर बसने वाले बशर को मसर्रत के जितने भी नग़्में सुनाए गए सब ऋषी सब मुनी अंबिया औलिया ख़ैर के देवता हुस्न नेकी ख़ुदा आज सब पर मुझे ए'तिबार आ गया ए'तिबार आ गया

Fahmida Riaz

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ऐ दिल-ए-काफ़िर इज्ज़ से मुनकिर आज तिरा सर ख़म क्यूँँ है तेरी हटेली शिरयानों में ये बेबस मातम क्यूँँ है आँख तो रोना भूल गई थी फिर हर मंज़र नम क्यूँँ है मत रोको बहने दो आँसू किसी को करते हैं प्रणाम आप झुका है झुकने दो सर छुपा था उस में कोई सलाम शायद उस के हुज़ूर में हो तुम जिस को कहते हैं अंजाम वो हस्ती की सरहद-ए-आख़िर हुआ जहाँ हर सफ़र तमाम बेबस है इंसाँ बेबस है तकती रह गई रोती शाम उठ गया कोई भरी दुनिया से बाक़ी रहे ख़ुदा का नाम या फिर काग़ज़ पर परछाईं मिलेगा जिस को सब्त-ए-दवाम ये टुकड़े इंसानी दिल के शाएर और शाएर का कलाम नाज़ करूँँगी ख़ुश-बख़्ती में मैं ने 'फ़िराक़' को देखा था उजड़े घर में वो तहज़ीबों के संगम पर बैठा था गर्म हम-आग़ोशी सदियों की होगी कितनी प्यार भरी जिस की बाँहों में खेली थी उस की सोच की सुंदरता शे'र का दिल शफ़्फ़ाफ़ था इतना जैसे आईना-ए-तारीख़ क्या भर पूर विसाल था जिस ने उस शाएर को जन्म दिया गर तारीख़ ने पागल हो कर ख़ुद अपना सर फोड़ा है ख़ून उछाला है गलियों में अपना हंडोला तोड़ा है छींट न थी दामन पर उस के कौन घाट धो बैठा था जिसे समझते हो ना-मुम्किन वो उस इंसाँ जैसा था इंसाँ भी इतना मामूली जैसे अपना हम-साया अपने शे'र सुनाना उस का और ख़ुद हैराँ हो जाना बातों में मासूम महक थी आँखों में बेचैन लपक ख़ामोशी के वक़्फ़े यूँँ जैसे उस ने कुछ देखा था पीड़ बहुत झेली थी उस ने इतनी बात तो ज़ाहिर थी लहजा में शोख़ी थी जैसे राख में चमके अँगारा संगम के पानी पर मैं ने देखी थी कैसी तस्वीर उड़ा लहक कर इक जल-पंछी खींच गया पानी पे लकीर जमुना की नीली गहराई भेद भरी चुप से बोझल गँगा के धारे की जुम्बिश उजली ताक़त और बे-कल इस पानी में अक्स डालता आसमान का इक टुकड़ा मिट्टी के बुत हरे नारियल चंदन लगा कोई मुखड़ा वो धारों पर नाव खेता सूखा पंजर माँझी का दान के पैसे गिनता पंडित ताँबा सूरज सांझी का जमुना पर मीनार क़िला के गुम्बद का तिरछा साया पाकिस्तान से आए मुहाजिर गेंदे की टूटी माला पानी में चप्पू की शप शप बातों के टूटे टुकड़े यहीं कहीं पर हम से ओझल सरस्वती भी बहती है जो समझी जो आगे समझूँ छलक रहा है दिल का जाम वो मंज़र जो ख़ुद से बड़ा था उस का घेरा तुम्हारे नाम ये कमरे का माँद उजाला बाहर हूक पपिहे की खिड़की पर बूँदों की दस्तक साँसें भरती ख़ामोशी पूरी बात नहीं बतलाता गूँगे आँसू रो देना तेरी धरती सह न सकेगी इतने हुस्न को खो देना तन्हा और अपाहिज बूढ़े तुझे न मरने देंगे लोग अभी तो जीवन बाँझ नहीं है फिर तुझ को जन्मेंगे लोग

Fahmida Riaz

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कितने बख़्त वाले हो ज़िंदगी में जो चाहा तुम ने पा लिया आख़िर अज़्म और हिम्मत से फ़ह्म से ज़कावत से है तुम्हारे दामन में फूल कामरानी का और तुम्हारे माथे पर फ़ख़्र का सितारा है अब तुम्हारे चेहरे पर ऐसी शादमानी है कोई कह नहीं सकता दर्द से भी वाक़िफ़ हो और तुम्हारे पाँव में देर से खटकता है आरज़ू का इक काँटा जिस से ख़ून रिसता है लाला-ज़ार राहों पर इस लहू की सुर्ख़ी की काँपती लकीरें हैं इन लहू के धब्बों में ना-तमाम मुबहम सी एक बात लिखी है

Fahmida Riaz

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