nazmKuch Alfaaz

एक ख़त ऐ दिल आओ पढ़ लें कि एक ख़त आया है अंजाम-ए-शौक़ के नाम एक ख़त आया है जिस राह पे चले थे उस रहगुज़ार का ख़त कि रूप बना दे मिटा दे उस रूप-कार का ख़त माज़ी की स्याही से निकला उल्फ़त का ख़त आस-ए-जवाब में भेजा ये चाहत का ख़त अर्ज़-ए-वफ़ाओं पे आए ए’तिबार का ख़त ये इंतिख़ाब-ए-फ़ुर्क़त पे सोगवार का ख़त मिला है बाद-ए-सबा में घुली अज़ीयत का ख़त उदास करता ये बारहा तबीअ'त का ख़त हर हर्फ़ में झलकती हुई इनायत का ख़त छुपी अक़ीदत का ख़त जगी हक़ीक़त का ख़त ये कानों को छूते मद्धम पुकार का ख़त है अश्कों को बुलाता ये अश्क-बार का ख़त कि अब्र फूटे हैं जज़्बातों के जिस ख़त में ऐ दिल सुनो कि उस ख़त से अब नज़र न फेरो देखो इन बोझल आँखों से गिरें ये मोती कहीं लिखे इन हर्फ़ों को काग़ज़ पे बहा न दें यूँँ बैठे हो रोज़-ए-फ़िराक़ से जिस हरारत में अब उस की आग ख़्वाह-म-ख़्वाह तुम को जला न दे छोड़ो अब अदावत की ज़िद अपनी और आओ ऐ दिल आओ पढ़ लें कि एक ख़त आया है

Related Nazm

तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

81 likes

"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

111 likes

मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

78 likes

"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

46 likes

बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

54 likes

More from Prakash Pandey

“आख़िरी सवाल” बीते दिनों को जाने किस तरह से याद कर तो कभी उन को भूल कर बैठी होगी तुम कहीं पे पलकें झुकाये हुए तो कभी उठाए हुए लिपट कर तुम्हारे दामन से देखो पूछता होगा एक उदास दिल कि अब क्या क्या याद करती हो कि अब क्या क्या भुला देती हो

Prakash Pandey

2 likes

चाँद की चाँदनी लगा कर चाँदनी को सीने से सर्द उजली रात की आग़ोश में लिपटा सुकून से सो रहा था चाँद और खिल रहे थे उस के होंठों पे जमाल-ए-चाँदनी के कई फूल मगर वक़्त वक़्त रात की आँचल की आड़ में ये मंज़र देख रहा था हँस रहा था फिर जाने क्यूँँ न भाया उस को चाँद के होंठों का तबस्सुम वो रात की तरन्नुम सो छीन ली उस ने चाँद से चाँदनी और चला गया दूर कहीं वक़्त के हाँथों की कठपुतली ये रात भी बेबस थी सो चुप-चाप देखती रही फिर गया चाँद वक़्त के पास माँगने अपनी चाँदनी मगर वो वक़्त अब बीत चुका था वो बदल चुका था अब वो कोई और था और पास उस के नहीं थी चाँद की चाँदनी अब ढूँढ़ता है कहकशाँ की राहों में चाँद न सिर्फ़ एक रौशनी बल्कि अपनी चाँदनी और उस की इक नज़र

Prakash Pandey

2 likes

एक आहट तन्हाई को बाहों में लिए सो रहा था मैं किसी ने यादों का दिया जला मुझ को जगा दिया वो तुम ही थीं क्या सोचा कि उस दिए को देख के ही रात गुज़ार लूँ किसी ने चूम कर माथे को फिर से मुझे सुला दिया वो तुम ही थीं क्या सूरज की किरणों को जब तरस न आया मेरी उजड़ी नींदों पे किसी ने अपनी ज़ुल्फ़ों का चादर मुझ पे बिछा दिया वो तुम ही थीं क्या खुली जब आँखें मेरी तलाश थी उन्हें एक चेहरे की किसी ने अपने रुख़ को मुझ सेे दूर कहीं छुपा दिया वो तुम ही थीं क्या ढूँढा तो बहुत मैं ने कोई निशाँ अपने मकान में किसी ने अपने आने के हर निशान को ही मिटा दिया वो तुम ही थीं क्या

Prakash Pandey

1 likes

एक सपना एक सपना है मेरा कि कभी ऐसे मिलूँ तुम सेे जहाँ वक़्त की कोई सीमा न हो जहाँ जाने की कोई ज़िद न हो बेहद ख़ूब-सूरत रात किसी समुंदर के किनारे जब मैं कभी तारों को देखूँ तो कभी तुम्हें कि जब फ़िज़ा की ख़ूबसूरती भी तुम्हारी उस काली बिंदी और सफ़ेद झुमके के आगे मुझे फीकी लगने लगे तुम कहो मुझ सेे कि सुनो कोई गीत मुझे सुनाओ ना फिर कर के कोई इशारा तुम मुझे पास अपने बुलाओ ना तब मैं वो गीत सुनाऊँ जो तुम्हें बेहद पसंद है हाँ हाँ वही हमारा गीत गाते-गाते मैं कहूँ तुम सेे कि सुनो साथ मेरे तुम भी गुनगुनाओ ना देख कर एक ऐसी मुहब्बत बन जाएँ समुंदर की लहरें जैसे कोई साज़ था में रखूँ मैं तुम्हारा हाथ और तुम मुझे मुस्कुराके देखती रहो गुनगुनाती रहो और फिर बिन कहे लिपट जाओ तुम मुझ सेे इस क़दर कि वो नज़दीकी कोई मिटा न सके तुम ख़ुद भी नहीं

Prakash Pandey

3 likes

“वो” वो परी थी मेरे जीवन की वो रौशनी थी मेरे चेहरे की वो ख़्वाब थी मेरी रातों की वो सुकून थी मेरी सुब्हों की वो इंतिज़ार थी मेरी आँखों की वो बहार थी मेरे आँगन की वो आवाज़ थी कई गीतों की वो पुकार थी मेरे होंठों की वो मंज़िल थी मेरी राहों की वो आरज़ू थी मेरी बाँहों की वो रोज़ का विसाल थी वो ता-उम्र का ख़याल थी मगर कहीं अब खो गई वो दूर मुझ सेे अब हो गई वो कितना मनाया कितना बुलाया ग़ैर मगर फिर हो गई वो दिन-रात अब यही सोचता हूँ बहुत सी बातें कहनी थी बहुत सी बातें सुननी थी ख़ैर मिल जाए वो कहीं तुम्हें तो बस कह देना “जन्मदिन मुबारक”

Prakash Pandey

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Prakash Pandey.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Prakash Pandey's nazm.