एक आहट तन्हाई को बाहों में लिए सो रहा था मैं किसी ने यादों का दिया जला मुझ को जगा दिया वो तुम ही थीं क्या सोचा कि उस दिए को देख के ही रात गुज़ार लूँ किसी ने चूम कर माथे को फिर से मुझे सुला दिया वो तुम ही थीं क्या सूरज की किरणों को जब तरस न आया मेरी उजड़ी नींदों पे किसी ने अपनी ज़ुल्फ़ों का चादर मुझ पे बिछा दिया वो तुम ही थीं क्या खुली जब आँखें मेरी तलाश थी उन्हें एक चेहरे की किसी ने अपने रुख़ को मुझ सेे दूर कहीं छुपा दिया वो तुम ही थीं क्या ढूँढा तो बहुत मैं ने कोई निशाँ अपने मकान में किसी ने अपने आने के हर निशान को ही मिटा दिया वो तुम ही थीं क्या
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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“आख़िरी सवाल” बीते दिनों को जाने किस तरह से याद कर तो कभी उन को भूल कर बैठी होगी तुम कहीं पे पलकें झुकाये हुए तो कभी उठाए हुए लिपट कर तुम्हारे दामन से देखो पूछता होगा एक उदास दिल कि अब क्या क्या याद करती हो कि अब क्या क्या भुला देती हो
Prakash Pandey
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चाँद की चाँदनी लगा कर चाँदनी को सीने से सर्द उजली रात की आग़ोश में लिपटा सुकून से सो रहा था चाँद और खिल रहे थे उस के होंठों पे जमाल-ए-चाँदनी के कई फूल मगर वक़्त वक़्त रात की आँचल की आड़ में ये मंज़र देख रहा था हँस रहा था फिर जाने क्यूँँ न भाया उस को चाँद के होंठों का तबस्सुम वो रात की तरन्नुम सो छीन ली उस ने चाँद से चाँदनी और चला गया दूर कहीं वक़्त के हाँथों की कठपुतली ये रात भी बेबस थी सो चुप-चाप देखती रही फिर गया चाँद वक़्त के पास माँगने अपनी चाँदनी मगर वो वक़्त अब बीत चुका था वो बदल चुका था अब वो कोई और था और पास उस के नहीं थी चाँद की चाँदनी अब ढूँढ़ता है कहकशाँ की राहों में चाँद न सिर्फ़ एक रौशनी बल्कि अपनी चाँदनी और उस की इक नज़र
Prakash Pandey
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एक सपना एक सपना है मेरा कि कभी ऐसे मिलूँ तुम सेे जहाँ वक़्त की कोई सीमा न हो जहाँ जाने की कोई ज़िद न हो बेहद ख़ूब-सूरत रात किसी समुंदर के किनारे जब मैं कभी तारों को देखूँ तो कभी तुम्हें कि जब फ़िज़ा की ख़ूबसूरती भी तुम्हारी उस काली बिंदी और सफ़ेद झुमके के आगे मुझे फीकी लगने लगे तुम कहो मुझ सेे कि सुनो कोई गीत मुझे सुनाओ ना फिर कर के कोई इशारा तुम मुझे पास अपने बुलाओ ना तब मैं वो गीत सुनाऊँ जो तुम्हें बेहद पसंद है हाँ हाँ वही हमारा गीत गाते-गाते मैं कहूँ तुम सेे कि सुनो साथ मेरे तुम भी गुनगुनाओ ना देख कर एक ऐसी मुहब्बत बन जाएँ समुंदर की लहरें जैसे कोई साज़ था में रखूँ मैं तुम्हारा हाथ और तुम मुझे मुस्कुराके देखती रहो गुनगुनाती रहो और फिर बिन कहे लिपट जाओ तुम मुझ सेे इस क़दर कि वो नज़दीकी कोई मिटा न सके तुम ख़ुद भी नहीं
Prakash Pandey
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“ख़्वाबों के बुलबुले” एक बुलबुले सा था मेरा ख़्वाब कोशिश की दिल ने छूने की फूट गया अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते कि जब मेरे मुक़द्दर में ख़्वाब मुकम्मल होना न था और दिल को शब-ए-बेकशी में सोना न था आरज़ू थी कि कोई बुलबुलों को फूटने से बचाए और वो प्यार से देखे उन को फिर गले लगाए पर हवाओं को भला दिल के अरमानों की क्या फ़िक्र जाने कहाँ ले गईं वो ख़्वाबों को मुझ सेे दूर कितनी मर्तबा समझाया मैं ने मगर दिल अब भी बे-क़रार है वो आएँगे नहीं शायद फिर भी उन का इंतिज़ार है इस हिज्र में ये दिल अब टूट के बिखर न जाए बिना कश्ती कहीं यादों के समुंदर में उतर न जाए अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते
Prakash Pandey
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एक ख़त ऐ दिल आओ पढ़ लें कि एक ख़त आया है अंजाम-ए-शौक़ के नाम एक ख़त आया है जिस राह पे चले थे उस रहगुज़ार का ख़त कि रूप बना दे मिटा दे उस रूप-कार का ख़त माज़ी की स्याही से निकला उल्फ़त का ख़त आस-ए-जवाब में भेजा ये चाहत का ख़त अर्ज़-ए-वफ़ाओं पे आए ए’तिबार का ख़त ये इंतिख़ाब-ए-फ़ुर्क़त पे सोगवार का ख़त मिला है बाद-ए-सबा में घुली अज़ीयत का ख़त उदास करता ये बारहा तबीअ'त का ख़त हर हर्फ़ में झलकती हुई इनायत का ख़त छुपी अक़ीदत का ख़त जगी हक़ीक़त का ख़त ये कानों को छूते मद्धम पुकार का ख़त है अश्कों को बुलाता ये अश्क-बार का ख़त कि अब्र फूटे हैं जज़्बातों के जिस ख़त में ऐ दिल सुनो कि उस ख़त से अब नज़र न फेरो देखो इन बोझल आँखों से गिरें ये मोती कहीं लिखे इन हर्फ़ों को काग़ज़ पे बहा न दें यूँँ बैठे हो रोज़-ए-फ़िराक़ से जिस हरारत में अब उस की आग ख़्वाह-म-ख़्वाह तुम को जला न दे छोड़ो अब अदावत की ज़िद अपनी और आओ ऐ दिल आओ पढ़ लें कि एक ख़त आया है
Prakash Pandey
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