nazmKuch Alfaaz

“ख़्वाबों के बुलबुले” एक बुलबुले सा था मेरा ख़्वाब कोशिश की दिल ने छूने की फूट गया अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते कि जब मेरे मुक़द्दर में ख़्वाब मुकम्मल होना न था और दिल को शब-ए-बेकशी में सोना न था आरज़ू थी कि कोई बुलबुलों को फूटने से बचाए और वो प्यार से देखे उन को फिर गले लगाए पर हवाओं को भला दिल के अरमानों की क्या फ़िक्र जाने कहाँ ले गईं वो ख़्वाबों को मुझ सेे दूर कितनी मर्तबा समझाया मैं ने मगर दिल अब भी बे-क़रार है वो आएँगे नहीं शायद फिर भी उन का इंतिज़ार है इस हिज्र में ये दिल अब टूट के बिखर न जाए बिना कश्ती कहीं यादों के समुंदर में उतर न जाए अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते

Related Nazm

तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

117 likes

"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

70 likes

मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

52 likes

मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

68 likes

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

42 likes

More from Prakash Pandey

“आख़िरी सवाल” बीते दिनों को जाने किस तरह से याद कर तो कभी उन को भूल कर बैठी होगी तुम कहीं पे पलकें झुकाये हुए तो कभी उठाए हुए लिपट कर तुम्हारे दामन से देखो पूछता होगा एक उदास दिल कि अब क्या क्या याद करती हो कि अब क्या क्या भुला देती हो

Prakash Pandey

2 likes

एक ख़त ऐ दिल आओ पढ़ लें कि एक ख़त आया है अंजाम-ए-शौक़ के नाम एक ख़त आया है जिस राह पे चले थे उस रहगुज़ार का ख़त कि रूप बना दे मिटा दे उस रूप-कार का ख़त माज़ी की स्याही से निकला उल्फ़त का ख़त आस-ए-जवाब में भेजा ये चाहत का ख़त अर्ज़-ए-वफ़ाओं पे आए ए’तिबार का ख़त ये इंतिख़ाब-ए-फ़ुर्क़त पे सोगवार का ख़त मिला है बाद-ए-सबा में घुली अज़ीयत का ख़त उदास करता ये बारहा तबीअ'त का ख़त हर हर्फ़ में झलकती हुई इनायत का ख़त छुपी अक़ीदत का ख़त जगी हक़ीक़त का ख़त ये कानों को छूते मद्धम पुकार का ख़त है अश्कों को बुलाता ये अश्क-बार का ख़त कि अब्र फूटे हैं जज़्बातों के जिस ख़त में ऐ दिल सुनो कि उस ख़त से अब नज़र न फेरो देखो इन बोझल आँखों से गिरें ये मोती कहीं लिखे इन हर्फ़ों को काग़ज़ पे बहा न दें यूँँ बैठे हो रोज़-ए-फ़िराक़ से जिस हरारत में अब उस की आग ख़्वाह-म-ख़्वाह तुम को जला न दे छोड़ो अब अदावत की ज़िद अपनी और आओ ऐ दिल आओ पढ़ लें कि एक ख़त आया है

Prakash Pandey

2 likes

चाँद की चाँदनी लगा कर चाँदनी को सीने से सर्द उजली रात की आग़ोश में लिपटा सुकून से सो रहा था चाँद और खिल रहे थे उस के होंठों पे जमाल-ए-चाँदनी के कई फूल मगर वक़्त वक़्त रात की आँचल की आड़ में ये मंज़र देख रहा था हँस रहा था फिर जाने क्यूँँ न भाया उस को चाँद के होंठों का तबस्सुम वो रात की तरन्नुम सो छीन ली उस ने चाँद से चाँदनी और चला गया दूर कहीं वक़्त के हाँथों की कठपुतली ये रात भी बेबस थी सो चुप-चाप देखती रही फिर गया चाँद वक़्त के पास माँगने अपनी चाँदनी मगर वो वक़्त अब बीत चुका था वो बदल चुका था अब वो कोई और था और पास उस के नहीं थी चाँद की चाँदनी अब ढूँढ़ता है कहकशाँ की राहों में चाँद न सिर्फ़ एक रौशनी बल्कि अपनी चाँदनी और उस की इक नज़र

Prakash Pandey

2 likes

एक सपना एक सपना है मेरा कि कभी ऐसे मिलूँ तुम सेे जहाँ वक़्त की कोई सीमा न हो जहाँ जाने की कोई ज़िद न हो बेहद ख़ूब-सूरत रात किसी समुंदर के किनारे जब मैं कभी तारों को देखूँ तो कभी तुम्हें कि जब फ़िज़ा की ख़ूबसूरती भी तुम्हारी उस काली बिंदी और सफ़ेद झुमके के आगे मुझे फीकी लगने लगे तुम कहो मुझ सेे कि सुनो कोई गीत मुझे सुनाओ ना फिर कर के कोई इशारा तुम मुझे पास अपने बुलाओ ना तब मैं वो गीत सुनाऊँ जो तुम्हें बेहद पसंद है हाँ हाँ वही हमारा गीत गाते-गाते मैं कहूँ तुम सेे कि सुनो साथ मेरे तुम भी गुनगुनाओ ना देख कर एक ऐसी मुहब्बत बन जाएँ समुंदर की लहरें जैसे कोई साज़ था में रखूँ मैं तुम्हारा हाथ और तुम मुझे मुस्कुराके देखती रहो गुनगुनाती रहो और फिर बिन कहे लिपट जाओ तुम मुझ सेे इस क़दर कि वो नज़दीकी कोई मिटा न सके तुम ख़ुद भी नहीं

Prakash Pandey

3 likes

“वो” वो परी थी मेरे जीवन की वो रौशनी थी मेरे चेहरे की वो ख़्वाब थी मेरी रातों की वो सुकून थी मेरी सुब्हों की वो इंतिज़ार थी मेरी आँखों की वो बहार थी मेरे आँगन की वो आवाज़ थी कई गीतों की वो पुकार थी मेरे होंठों की वो मंज़िल थी मेरी राहों की वो आरज़ू थी मेरी बाँहों की वो रोज़ का विसाल थी वो ता-उम्र का ख़याल थी मगर कहीं अब खो गई वो दूर मुझ सेे अब हो गई वो कितना मनाया कितना बुलाया ग़ैर मगर फिर हो गई वो दिन-रात अब यही सोचता हूँ बहुत सी बातें कहनी थी बहुत सी बातें सुननी थी ख़ैर मिल जाए वो कहीं तुम्हें तो बस कह देना “जन्मदिन मुबारक”

Prakash Pandey

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Prakash Pandey.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Prakash Pandey's nazm.