nazmKuch Alfaaz

“वो” वो परी थी मेरे जीवन की वो रौशनी थी मेरे चेहरे की वो ख़्वाब थी मेरी रातों की वो सुकून थी मेरी सुब्हों की वो इंतिज़ार थी मेरी आँखों की वो बहार थी मेरे आँगन की वो आवाज़ थी कई गीतों की वो पुकार थी मेरे होंठों की वो मंज़िल थी मेरी राहों की वो आरज़ू थी मेरी बाँहों की वो रोज़ का विसाल थी वो ता-उम्र का ख़याल थी मगर कहीं अब खो गई वो दूर मुझ सेे अब हो गई वो कितना मनाया कितना बुलाया ग़ैर मगर फिर हो गई वो दिन-रात अब यही सोचता हूँ बहुत सी बातें कहनी थी बहुत सी बातें सुननी थी ख़ैर मिल जाए वो कहीं तुम्हें तो बस कह देना “जन्मदिन मुबारक”

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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है

ZafarAli Memon

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना

Rishabh Sharma

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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ

Faiz Ahmad Faiz

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“आख़िरी सवाल” बीते दिनों को जाने किस तरह से याद कर तो कभी उन को भूल कर बैठी होगी तुम कहीं पे पलकें झुकाये हुए तो कभी उठाए हुए लिपट कर तुम्हारे दामन से देखो पूछता होगा एक उदास दिल कि अब क्या क्या याद करती हो कि अब क्या क्या भुला देती हो

Prakash Pandey

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एक सपना एक सपना है मेरा कि कभी ऐसे मिलूँ तुम सेे जहाँ वक़्त की कोई सीमा न हो जहाँ जाने की कोई ज़िद न हो बेहद ख़ूब-सूरत रात किसी समुंदर के किनारे जब मैं कभी तारों को देखूँ तो कभी तुम्हें कि जब फ़िज़ा की ख़ूबसूरती भी तुम्हारी उस काली बिंदी और सफ़ेद झुमके के आगे मुझे फीकी लगने लगे तुम कहो मुझ सेे कि सुनो कोई गीत मुझे सुनाओ ना फिर कर के कोई इशारा तुम मुझे पास अपने बुलाओ ना तब मैं वो गीत सुनाऊँ जो तुम्हें बेहद पसंद है हाँ हाँ वही हमारा गीत गाते-गाते मैं कहूँ तुम सेे कि सुनो साथ मेरे तुम भी गुनगुनाओ ना देख कर एक ऐसी मुहब्बत बन जाएँ समुंदर की लहरें जैसे कोई साज़ था में रखूँ मैं तुम्हारा हाथ और तुम मुझे मुस्कुराके देखती रहो गुनगुनाती रहो और फिर बिन कहे लिपट जाओ तुम मुझ सेे इस क़दर कि वो नज़दीकी कोई मिटा न सके तुम ख़ुद भी नहीं

Prakash Pandey

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चाँद की चाँदनी लगा कर चाँदनी को सीने से सर्द उजली रात की आग़ोश में लिपटा सुकून से सो रहा था चाँद और खिल रहे थे उस के होंठों पे जमाल-ए-चाँदनी के कई फूल मगर वक़्त वक़्त रात की आँचल की आड़ में ये मंज़र देख रहा था हँस रहा था फिर जाने क्यूँँ न भाया उस को चाँद के होंठों का तबस्सुम वो रात की तरन्नुम सो छीन ली उस ने चाँद से चाँदनी और चला गया दूर कहीं वक़्त के हाँथों की कठपुतली ये रात भी बेबस थी सो चुप-चाप देखती रही फिर गया चाँद वक़्त के पास माँगने अपनी चाँदनी मगर वो वक़्त अब बीत चुका था वो बदल चुका था अब वो कोई और था और पास उस के नहीं थी चाँद की चाँदनी अब ढूँढ़ता है कहकशाँ की राहों में चाँद न सिर्फ़ एक रौशनी बल्कि अपनी चाँदनी और उस की इक नज़र

Prakash Pandey

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“ख़्वाबों के बुलबुले” एक बुलबुले सा था मेरा ख़्वाब कोशिश की दिल ने छूने की फूट गया अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते कि जब मेरे मुक़द्दर में ख़्वाब मुकम्मल होना न था और दिल को शब-ए-बेकशी में सोना न था आरज़ू थी कि कोई बुलबुलों को फूटने से बचाए और वो प्यार से देखे उन को फिर गले लगाए पर हवाओं को भला दिल के अरमानों की क्या फ़िक्र जाने कहाँ ले गईं वो ख़्वाबों को मुझ सेे दूर कितनी मर्तबा समझाया मैं ने मगर दिल अब भी बे-क़रार है वो आएँगे नहीं शायद फिर भी उन का इंतिज़ार है इस हिज्र में ये दिल अब टूट के बिखर न जाए बिना कश्ती कहीं यादों के समुंदर में उतर न जाए अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते

Prakash Pandey

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एक आहट तन्हाई को बाहों में लिए सो रहा था मैं किसी ने यादों का दिया जला मुझ को जगा दिया वो तुम ही थीं क्या सोचा कि उस दिए को देख के ही रात गुज़ार लूँ किसी ने चूम कर माथे को फिर से मुझे सुला दिया वो तुम ही थीं क्या सूरज की किरणों को जब तरस न आया मेरी उजड़ी नींदों पे किसी ने अपनी ज़ुल्फ़ों का चादर मुझ पे बिछा दिया वो तुम ही थीं क्या खुली जब आँखें मेरी तलाश थी उन्हें एक चेहरे की किसी ने अपने रुख़ को मुझ सेे दूर कहीं छुपा दिया वो तुम ही थीं क्या ढूँढा तो बहुत मैं ने कोई निशाँ अपने मकान में किसी ने अपने आने के हर निशान को ही मिटा दिया वो तुम ही थीं क्या

Prakash Pandey

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