nazmKuch Alfaaz

जब वो कम-उम्र ही था उस ने ये जान लिया था कि अगर जीना है बड़ी चालाकी से जीना होगा आँख की आख़िरी हद तक है बिसात-ए-हस्ती और वो मामूली सा इक मोहरा है एक इक ख़ाना बहुत सोच के चलना होगा बाज़ी आसान नहीं थी उस की दूर तक चारों तरफ़ फैले थे मोहरे जल्लाद निहायत ही सफ़्फ़ाक सख़्त बे-रहम बहुत ही चालाक अपने क़ब्ज़े में लिए पूरी बिसात उस के हिस्से में फ़क़त मात लिए वो जिधर जाता उसे मिलता था हर नया ख़ाना नई घात लिए वो मगर बचता रहा चलता रहा एक घर दूसरा घर तीसरा घर पास आया कभी औरों के कभी दूर हुआ वो मगर बचता रहा चलता रहा गो कि मामूली सा मुहरा था मगर जीत गया यूँँ वो इक रोज़ बड़ा मुहरा बना अब वो महफ़ूज़ है इक ख़ाने में इतना महफ़ूज़ है इक ख़ाने में इतना महफ़ूज़ कि दुश्मन तो अलग दोस्त भी पास नहीं आ सकते उस के इक हाथ में है जीत उस की दूसरे हाथ में तन्हाई है

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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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दिल वो सहरा था कि जिस सहरा में हसरतें रेत के टीलों की तरह रहती थीं जब हवादिस की हवा उन को मिटाने के लिए चलती थी यहाँ मिटती थीं कहीं और उभर आती थीं शक्ल खोते ही नई शक्ल में ढल जाती थीं दिल के सहरा पे मगर अब की बार सानेहा गुज़रा कुछ ऐसा कि सुनाए न बने आँधी वो आई कि सारे टीले ऐसे बिखरे कि कहीं और उभर ही न सके यूँँ मिटे हैं कि कहीं और बनाए न बने अब कहीं टीले नहीं रेत नहीं रेत का ज़र्रा नहीं दिल में अब कुछ नहीं दिल को सहरा भी अगर कहिए तो कैसे कहिए

Javed Akhtar

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मेरे रस्ते में इक मोड़ था और उस मोड़ पर पेड़ था एक बरगद का ऊँचा घना जिस के साए में मेरा बहुत वक़्त बीता है लेकिन हमेशा यही मैं ने सोचा कि रस्ते में ये मोड़ ही इस लिए है कि ये पेड़ है उम्र की आँधियों में वो पेड़ एक दिन गिर गया है मोड़ लेकिन है अब तक वहीं का वहीं देखता हूँ तो आगे भी रस्ते में बस मोड़ ही मोड़ हैं पेड़ कोई नहीं रास्तों में मुझे यूँँ तो मिल जाते हैं मेहरबाँ फिर भी हर मोड़ पर पूछता है ये दिल वो जो इक छाँव थी खो गई है कहाँ

Javed Akhtar

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मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ ये काएनात और इस की वुसअत तमाम हैरत तमाम हैरत ये क्या तमाशा ये क्या समाँ है ये क्या अयाँ है ये क्या निहाँ है अथाह साग़र है इक ख़ला का न जाने कब से न जाने कब तक कहाँ तलक है हमारी नज़रों की इंतिहा है जिसे समझते हैं हम फ़लक है ये रात का छलनी छलनी सा काला आसमाँ है कि जिस में जुगनू की शक्ल में बे-शुमार सूरज पिघल रहे हैं शहाब-ए-साक़िब है या हमेशा की ठंडी काली फ़ज़ाओं में जैसे आग के तीर चल रहे हैं करोड़-हा नूरी बरसों के फ़ासलों में फैली ये कहकशाएँ ख़ला घेरे हैं या ख़लाओं की क़ैद में है ये कौन किस को लिए चला है हर एक लम्हा करोड़ों मीलों की जो मसाफ़त है इन को आख़िर कहाँ है जाना अगर है इन का कहीं कोई आख़िरी ठिकाना तो वो कहाँ है जहाँ कहीं है सवाल ये है वहाँ से आगे कोई ज़मीं है कोई फ़लक है अगर नहीं है तो ये नहीं कितनी दूर तक है मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ ये काएनात और इस की वुसअत तमाम हैरत तमाम हैरत सितारे जिन की सफ़ीर किरनें करोड़ों बरसों से राह में है ज़मीं से मिलने की चाह में है कभी तो आ के करेंगी ये मेरी आँखें रौशन कभी तो आएगी मेरे हाथों में रौशनी का एक ऐसा दामन कि जिस को था में मैं जा के देखूँगा इन ख़लाओं के फैले आँगन कभी तो मुझ को ये काएनात अपने राज़ खुल के सुना ही देगी ये अपना आग़ाज़ अपना अंजाम मुझ को इक दिन बता ही देगी अगर कोई वाइज़ अपने मिम्बर से नख़वत-आमेज़ लहज़े में ये कहे कि तुम तो कभी समझ ही नहीं सकोगे कि इस क़दर है ये बात गहरी तो कोई पूछे जो मैं न समझा तो कौन समझाएगा और जिस को कभी न कोई समझ सके ऐसी बात तो फिर फ़ुज़ूल ठहरी

Javed Akhtar

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वो जो कहलाता था दीवाना तिरा वो जिसे हिफ़्ज़ था अफ़्साना तिरा जिस की दीवारों पे आवेज़ां थीं तस्वीरें तिरी वो जो दोहराता था तक़रीरें तिरी वो जो ख़ुश था तिरी ख़ुशियों से तिरे ग़म से उदास दूर रह के जो समझता था वो है तेरे पास वो जिसे सज्दा तुझे करने से इनकार न था उस को दर-अस्ल कभी तुझ से कोई प्यार न था उस की मुश्किल थी कि दुश्वार थे उस के रस्ते जिन पे बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर घूमते रहज़न थे सदा उस की अना के दर पे उस ने घबरा के सब अपनी अना की दौलत तेरी तहवील में रखवा दी थी अपनी ज़िल्लत को वो दुनिया की नज़र और अपनी भी निगाहों से छुपाने के लिए कामयाबी को तिरी तिरी फ़ुतूहात तिरी इज़्ज़त को वो तिरे नाम तिरी शोहरत को अपने होने का सबब जानता था है वजूद उस का जुदा तुझ से ये कब मानता था वो मगर पुर-ख़तर रास्तों से आज निकल आया है वक़्त ने तेरे बराबर न सही कुछ न कुछ अपना करम उस पे भी फ़रमाया है अब उसे तेरी ज़रूरत ही नहीं जिस का दावा था कभी अब वो अक़ीदत ही नहीं तेरी तहवील में जो रक्खी थी कल उस ने अना आज वो माँग रहा है वापस बात इतनी सी है ऐ साहिब-ए-नाम-ओ-शोहरत जिस को कल तेरे ख़ुदा होने से इनकार न था वो कभी तेरा परस्तार न था

Javed Akhtar

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अजीब क़िस्सा है जब ये दुनिया समझ रही थी तुम अपनी दुनिया में जी रही हो मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ तो हम ने सारी निगाहों से दूर एक दुनिया बसाई थी जो कि मेरी भी थी तुम्हारी भी थी जहाँ फ़ज़ाओं में दोनों के ख़्वाब जागते थे जहाँ हवाओं में दोनों की सरगोशियाँ घुली थीं जहाँ के फूलों में दोनों की आरज़ू के सब रंग खिल रहे थे जहाँ पे दोनों की जुरअतों के हज़ार चश्में उबल रहे थे न वसवसे थे न रंज-ओ-ग़म थे सुकून का गहरा इक समुंदर था और हम थे अजीब क़िस्सा है सारी दुनिया ने जब ये जाना कि हम ने सारी निगाहों से दूर एक दुनिया बसाई है तो हर एक अबरू ने जैसे हम पर कमान तानी तमाम पेशानियों पे उभरीं ग़म और ग़ुस्से की गहरी शिकनें किसी के लहजे से तल्ख़ी छलकी किसी की बातों में तुरशी आई किसी ने चाहा कि कोई दीवार ही उठा दे किसी ने चाहा हमारी दुनिया ही वो मिटा दे मगर ज़माने को हारना था ज़माना हारा ये सारी दुनिया को मानना ही पड़ा हमारे ख़याल की एक सी ज़मीं है हमारे ख़्वाबों का एक जैसा ही आसमाँ है मगर पुरानी ये दास्ताँ है कि हम पे दुनिया अब एक अर्से से मेहरबाँ है अजीब क़िस्सा है जब कि दुनिया ने कब का तस्लीम कर लिया है हम एक दुनिया के रहने वाले हैं सच तो ये है तुम अपनी दुनिया में जी रही हो मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ!

Javed Akhtar

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