“एक रात“ एक पंखा है एक रस्सी है और तन्हाई काफ़ी अच्छी है तेरा ग़म सोने पे सुहागा है जैसे दस्तूर और मौका है ऐसे मौसम में यही अच्छा है या तो तू आए तसल्ली देने या तेरा कॉल भी बहुत होगा वरना ये ज़िंदगी खोने के लिए ऐसा माहौल भी बहुत होगा
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"तुम से बे-पनाह मोहब्बत" मेरे नूर-ए-नज़र आ भी जा तू नज़र कब सुनाएगा मुझ को तू अच्छी ख़बर तेरा आशिक़ बेचारा परेशान है तुझ से नाराज़ है और हैरान है क़ासिद-ए-मोतबर ले जा मेरी ख़बर तेरी नज़रों से मिलती हैं ख़ामोशियाँ दिल में क्यूँ रखता है इतनी सरगोशियाँ खोल दे अब ज़बाँ ऐ मेरे हम सफ़र मेरे दिल की तमन्ना यहीं हैं सनम मैं रहूँ साथिया बन के सातों जनम बात हो जाए सच तू जो कह दे अगर टूट कर मेरा दिल ये बिखर जाएगा तू न होगा तो ''दानिश'' ये मर जाएगा सूख जाएगा ये ज़िंदगी का शजर
Danish Balliavi
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मुश्किल और आसानी में से एक अगर चुनना हो तो हम आसानी ही चुनते हैं मुश्किल बात गले के एवज़ पेट के पास से आती है उस को बाहर आते आते एक ज़माना लगता है मुश्किल है ये कह पाना के "यार, मुझे ग़म खाता है जैसे जैसे रात उतरती है तो रोना आता है" हो सालों का रिश्ता चाहे ये भी कहना मुश्किल है "जब तक ज़ख़्म नहीं भरता ये तू तो हाल सुनेगा ना ? तू तो बहुत क़रीब है मेरे तू तो मदद करेगा ना ?" बस इतनी सी बात बताने में सदियां लग जाती हैं आख़िर में हम बहुत सोच कर फिर आसानी चुनते है कह देते हैं, "हाँ मैं बढ़िया, मुझ को क्या ही होना है" वो भी 'बढ़िया' कह देता है बात ख़तम हो जाती है
Siddharth Saaz
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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जी तो करता है मगर जी तो करता है तुझे दिल के हक़ीक़त कह दूँ दिल तो कहता है मुझे तुझ सेे है उल्फ़त कह दूँ तेरे चेहरे पे तबस्सुम का वो आना अक्सर मेरे सीने में चुभन और सुकूँ देता है तेरे आरिज़ पे वो लाली का चमकना इक दम मेरे भड़के हुए जज़्बों को तुलू देता है चाहता हूँ कि तेरा हाथ पकड़ कर कह दूँ मुझ को ये हाथ हमेशा के लिए पकड़ा दे सोचता हूँ कि तेरी आँखों में आँखें डालूँ और कह दूँ मेरे जज़्बात को तू अपना ले मेरे दिल के ये जो जज़्बे हैं अयाँ तो कर दूँ फिर ये जज़्बात बिखर जाने का डर लगता है तुझ को बतला दूँ मुझे तुझ सेे बहुत उल्फ़त है फिर मगर तेरे मुकर जाने का डर लगता है सोचता हूँ कि मैं जल्दी में करूँँ क्यूँँ कुछ भी तेरे दिल में भी हैं जज़्बात तसल्ली कर लूँ मेरे एहसास को पानी में बहाएगी न तू सब सेे पहले तो मेरे दिल की तशफ्फ़ी कर लूँ कहीं ऐसा तो नहीं मैं ही समझता हूँ फ़क़त तेरे दिल में तो कहीं कोई मुहब्बत ही न हो मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ वो तबस्सुम वो अदाएँ तेरी आदत ही न हो कहीं ऐसा न हो पाँव मेरे बहकें लेकिन तेरी इन मरमरीं बाहों का सहारा न मिले मेरी कश्ती कहीं दरियाओं में डोले डूबे और तेरे प्यार के सागर का किनारा न मिले ख़ैर सब सोच के सोचा तुझे बतला दूँगा मेरी धड़कन को तेरी धड़कनों से रक़बत है तेरे दिल का तू मुझे हाल बता क्या है ज़रा मेरे दिल का तो वही हाल इसे उल्फ़त है मैं ने बतला के तुझे देख ज़रा क्या पाया अपने ख़्वाबों का मज़ा खोए हुए बैठा हूँ तेरे आने से भी पहले मैं अकेला था मगर तेरे जाने पे मैं सहरा की तरह तन्हा हूँ
Praveen Sharma SHAJAR
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“हालत ए हाल” तुम ने मुझ सेे पूछा है मेरा हाल कैसा है क्या बताऊँ मैं तुम को जब से उस ने छोड़ा है मेरी बात को सुनना और उस पे कुछ कहना तब से हाल ऐसा है रोज़ ख़ुद से कहता हूँ उस को भूल जाऊँगा मैं भी एक दिन फिर से खुल के मुस्कुराऊँगा इस सेे पहले भी मैं ने कितने लोग खोए हैं इस सेे पहले भी मेरा हाल ऐसे बिगड़ा था इस सेे पहले भी मेरा दिल कि ऐसे उजड़ा था देखो उन की यादों में अब कहाँ मैं रोता हूँ बात कुछ दिनों की है वो भी कल नहीं होगी ग़म भी कल नहीं होगा सब सही सही होगा एक दरिया यूँँ भी तो इक तरफ़ नहीं बहता एक वक़्त यूँँ भी तो देर तक नहीं रहता दिल तो मेरा करता है उस सेे पूछ लूँ जा कर या वो बोल दे आ कर दोस्ती सलामत है ख़ैर ये नहीं होगा ये भी जानता हूँ मैं और दुख इसी का है एक बात बतलाऊँ वो जो लोग कहते हैं लड़कियाँ वफ़ाओं से वास्ता नहीं रखतीं लड़कियाँ मोहब्बत से राब्ता नहीं रखतीं वो जो लोग कहते हैं बेवफाएं होती हैं वो जो तंज करते हैं लड़कियों की उल्फत पे और उन की फ़ितरत पे उन की बात मत सुनना वो न झूठ कहते हैं मेरे साथ हो ना हो लेकिन अब भी कहता हूँ वो वफ़ा की मूरत है वो हया की शिद्दत है उस ने जो किया होगा सोच कर किया होगा हाँ यही तो होता है लड़कियाँ जो करती हैं सोच कर ही करती हैं उस ने जो भी चाहा था उस ने जो भी माँगा था मैं उसे न दे पाया उस ने क्या ही माँगा था बस उसे समझ लूँ मैं उस को मान लूँ अपना मुझ सेे ये न हो पाया मुझ सेे हाथ फैला कर उस ने मुझ को माँगा था मैं उसे न दे पाया तुम तो जानते ही हो मैं तो ज़िन्दगी भर के रब्त कब बनाता हूँ तुम तो जानते ही हो मैं किसी के होने का अहद कब निभाता हूँ मेरी सोच जो भी हो इस सेे उस को क्या लेना उस का हाल जो भी हो मुझ को इस सेे क्या मतलब कल तो जाने क्या होगा आज लेकिन ऐसा है आज दर्द होता है तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने अपने सारे ज़ख़्मों को लो दिखा दिया मैं ने लेकिन उस के ज़ख़्मों कौन देखता होगा मुझ सेे दूर हो कर के उस का हाल कैसा है कौन पूछता होगा मेरे दोस्त हो न तुम एक काम कर दोगे वो अगर मिले तुम को लौटती जो दफ़्तर से उस को रोक लेना तुम उस सेे पूछ लेना तुम उस का हाल कैसा है
Praveen Sharma SHAJAR
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"नामालूम" तुझ को लगता है जो पेड़ सूखे हुए हैं उन्हें सूखने का सबब है ख़िज़ाँ तुझ को लगता है सागर जो ठहरा हुआ है वो ठहरा हुआ है यूँँ ही बे-वजह तुझ को लगता है सहरा में जो धूल है उड़ रही है वो बस आँधियों के सबब तुझ को लगता है जो कुछ हुआ है वो बस हो गया है यूँँ ही जो हुआ वो बजा तू नहीं जानती पँछियों ने ही ख़ुद तोड़ डाले हैं अपने घरौंदे मगर अब वो बे-घर हैं और ढूँढ़ते हैं किसी और के घोंसले क्यूँँकि उन की सजाई हुई शाख़ पर किसी अंजान परिंदे ने अपने घरौंदे बनाए हुए हैं कि फिर जो पा सकें नेह जो उन को पहले मिला था कभी आस ले कर के ऐसी तेरे दर पे आए हुए हैं तू समझती है ये पेड़ यूँँ ही गिरा है नहीं इस की शाख़ों पे पंछी नहीं थे इसी के सबब ख़ुद-कुशी कर चुका है तू समझती है ये जो इमारत है बस वक़्त की मार से ढह गई है नहीं इस को तन्हाइयों ने सताया बहुत बरग़लाया बहुत बस इसी के सबब अपनी बुनियाद को छोड़ कर जा रही है तुझ को लगता है इन राहगीरों को अब तक मिला ही नहीं है कोई कारवाँ पर ये वो हैं जो भीड़ों में छुप न सके और अकेले किसी को दिखे ही नहीं इनको तन्हाइयों ने रुलाया बहुत फिर इन्होंने मगर उन ही तन्हाइयों को ग़ज़ल कर दिया तू नहीं जानती इन दरख़्तों को इन की जड़ों ने कभी इन के पत्तों तलक झील के पानी से भी सींचा नहीं तू नहीं जानती ये नदी जो समुंदर की बाहों में भरने को अपने ख़यालात की मस्तियों में बँधी बह रही थी इसे उन पहाड़ों ने रोका हुआ है जिन्हें एक दिन अपने बादल के पानी में भीगे हुए सर्दियों में सिसकने का अभिशाप था तू नहीं जानती आइनों का वो दुख जो कि दीवार पर लटके रहते हैं और ढूँढ़ते हैं वो चेहरा जो दिखने में ख़ुद्दार हो और ज़माने की नज़रों में बेकार हो फिर मगर झुर्रियों से भरे अक्स देखें तो ये सोचते हैं क्या इनको किसी ने इसी के लिए रेत की धड़कनों से निचोड़ा था तू नहीं जानती कि वो मज़दूर ईनाम लेने गए थे मगर शाह ने उन के फ़न को ही उन सेे अलग कर के ऐसा शहर गढ़ दिया कि जहाँ अठारह हज़ार बे-हाथ लोगों की बाशिंदगी थी जहाँ अब तलक इक हसीं ताज के चौदह दफ़ा हामिला होने की चीख़ें गढ़ी हैं मगर उस इमारत को फिर भी मुहब्बत की झूठी निशानी बनाया गया तू नहीं जानती मैं वही रेत हूँ जिस को जितना दबाया गया मुट्ठियों में वो उतनी ही ज़्यादा फिसलती गई और फिर जा गिरी दामनों में किसी के मगर फिर वहाँ भी ये रह न सकी जिस का दामन था उस की ही आँखों में ये रेत चुभने लगी उस ने दामन को अपने सफ़ा कर दिया रेत को दामनों से जुदा कर दिया
Praveen Sharma SHAJAR
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“चाय” सड़क के किनारे पे उगते हुए और कहीं आसमानों को छूते हुए परबतों और पहाड़ों पे ढलती हुई बारिशों की बदौलत पले चंद पेड़ों के बागान से कितने मीलों के तन्हा सफ़र तय किए कितनी झीलों के सागर के दरिया के पानी को पीते हुए कहीं आँधियों से उलझते हुए कहीं शांत नदियों के वातास पीते हुए कितने गाँवों से शहरों से लहरों से होते हुए कहीं टूट कर के कहीं फूट कर के कहीं पे मशीनों कहीं पे वो फ़नकार मानिंद मज़दूर हाथों की सतहों पे रगड़े हुए गलियारों में कैफ़े में सड़कों पर घर की रसोई में दफ़्तर में होटलों में, मिट्टी के लोहे के बादल नुमा चायदानों में उबलती मचलती हुई सजी धजी कीमती काँच की प्यालियों से कहीं झाँकती मुस्कुराती हुई और कहीं काग़ज़ी कप में बेजान सोई हुई हम को उस अपने पीले कहीं लाल रंग की कहीं पर सफ़ेदी के रंगों से पैदा हुई एक मद्धम सी आवाज़ देकर बुलाती हुई एक चाय जो मिल जाए तो फिर शराबी भला कोई क्यूँँ हो
Praveen Sharma SHAJAR
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“ख़याल” मैं ये रोज़ सोचता हूँ तुम को फ़ोन करूँँ लेकिन एक ख़याल सताता है तुम से बात जो कर लूँगा मन हलका हो जाएगा फिर तुम सादा दिल भी हो मुझ को माफ़ भी कर दोगी फिर हम बात करेंगे रोज़ मैं उम्मीद लगा लूँगा फिर इक दिन ऐसा होगा तुम उस दोस्त के पास में होगी मैं तन्हा रह जाऊँगा फिर मुझ को रोना होगा आख़िर में जब रोना है तो मैं ने ये सोचा है तुम को फ़ोन भी क्यूँँ करना मैं यूँँ ही रो लेता हूँ
Praveen Sharma SHAJAR
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