nazmKuch Alfaaz

“ख़याल” मैं ये रोज़ सोचता हूँ तुम को फ़ोन करूँँ लेकिन एक ख़याल सताता है तुम से बात जो कर लूँगा मन हलका हो जाएगा फिर तुम सादा दिल भी हो मुझ को माफ़ भी कर दोगी फिर हम बात करेंगे रोज़ मैं उम्मीद लगा लूँगा फिर इक दिन ऐसा होगा तुम उस दोस्त के पास में होगी मैं तन्हा रह जाऊँगा फिर मुझ को रोना होगा आख़िर में जब रोना है तो मैं ने ये सोचा है तुम को फ़ोन भी क्यूँँ करना मैं यूँँ ही रो लेता हूँ

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

Kumar Vishwas

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पानी कौन पकड़ सकता है जब वो इस दुनिया के शोर और ख़मोशी से क़त'अ-तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरे की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिसे सिर्फ़ दहकने से मतलब है, वो इक ऐसा फूल है जिस पर अपनी ख़ुशबू बोझ बनी है, वो इक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है, उस को छूने की ख़्वाइश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाकिफ़ है बल्कि हर इक रंग के शजरे तक से वाकिफ़ है, उस को इल्म है किन ख़्वाबों से आँखें नीली पढ़ सकती हैं, हम ने जिन को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी-कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खींचती है सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है, सिर्फ़ उसी के हाथों से सारी दुनिया तरतीब में आ सकती है, हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाइश में ज़िंदा है लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ है, हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की किस्मत में वो जिस्म कहाँ है मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है, उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कॉलेज आ जाती है

Tehzeeb Hafi

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जी तो करता है मगर जी तो करता है तुझे दिल के हक़ीक़त कह दूँ दिल तो कहता है मुझे तुझ सेे है उल्फ़त कह दूँ तेरे चेहरे पे तबस्सुम का वो आना अक्सर मेरे सीने में चुभन और सुकूँ देता है तेरे आरिज़ पे वो लाली का चमकना इक दम मेरे भड़के हुए जज़्बों को तुलू देता है चाहता हूँ कि तेरा हाथ पकड़ कर कह दूँ मुझ को ये हाथ हमेशा के लिए पकड़ा दे सोचता हूँ कि तेरी आँखों में आँखें डालूँ और कह दूँ मेरे जज़्बात को तू अपना ले मेरे दिल के ये जो जज़्बे हैं अयाँ तो कर दूँ फिर ये जज़्बात बिखर जाने का डर लगता है तुझ को बतला दूँ मुझे तुझ सेे बहुत उल्फ़त है फिर मगर तेरे मुकर जाने का डर लगता है सोचता हूँ कि मैं जल्दी में करूँँ क्यूँँ कुछ भी तेरे दिल में भी हैं जज़्बात तसल्ली कर लूँ मेरे एहसास को पानी में बहाएगी न तू सब सेे पहले तो मेरे दिल की तशफ्फ़ी कर लूँ कहीं ऐसा तो नहीं मैं ही समझता हूँ फ़क़त तेरे दिल में तो कहीं कोई मुहब्बत ही न हो मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ वो तबस्सुम वो अदाएँ तेरी आदत ही न हो कहीं ऐसा न हो पाँव मेरे बहकें लेकिन तेरी इन मरमरीं बाहों का सहारा न मिले मेरी कश्ती कहीं दरियाओं में डोले डूबे और तेरे प्यार के सागर का किनारा न मिले ख़ैर सब सोच के सोचा तुझे बतला दूँगा मेरी धड़कन को तेरी धड़कनों से रक़बत है तेरे दिल का तू मुझे हाल बता क्या है ज़रा मेरे दिल का तो वही हाल इसे उल्फ़त है मैं ने बतला के तुझे देख ज़रा क्या पाया अपने ख़्वाबों का मज़ा खोए हुए बैठा हूँ तेरे आने से भी पहले मैं अकेला था मगर तेरे जाने पे मैं सहरा की तरह तन्हा हूँ

Praveen Sharma SHAJAR

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"नामालूम" तुझ को लगता है जो पेड़ सूखे हुए हैं उन्हें सूखने का सबब है ख़िज़ाँ तुझ को लगता है सागर जो ठहरा हुआ है वो ठहरा हुआ है यूँँ ही बे-वजह तुझ को लगता है सहरा में जो धूल है उड़ रही है वो बस आँधियों के सबब तुझ को लगता है जो कुछ हुआ है वो बस हो गया है यूँँ ही जो हुआ वो बजा तू नहीं जानती पँछियों ने ही ख़ुद तोड़ डाले हैं अपने घरौंदे मगर अब वो बे-घर हैं और ढूँढ़ते हैं किसी और के घोंसले क्यूँँकि उन की सजाई हुई शाख़ पर किसी अंजान परिंदे ने अपने घरौंदे बनाए हुए हैं कि फिर जो पा सकें नेह जो उन को पहले मिला था कभी आस ले कर के ऐसी तेरे दर पे आए हुए हैं तू समझती है ये पेड़ यूँँ ही गिरा है नहीं इस की शाख़ों पे पंछी नहीं थे इसी के सबब ख़ुद-कुशी कर चुका है तू समझती है ये जो इमारत है बस वक़्त की मार से ढह गई है नहीं इस को तन्हाइयों ने सताया बहुत बरग़लाया बहुत बस इसी के सबब अपनी बुनियाद को छोड़ कर जा रही है तुझ को लगता है इन राहगीरों को अब तक मिला ही नहीं है कोई कारवाँ पर ये वो हैं जो भीड़ों में छुप न सके और अकेले किसी को दिखे ही नहीं इनको तन्हाइयों ने रुलाया बहुत फिर इन्होंने मगर उन ही तन्हाइयों को ग़ज़ल कर दिया तू नहीं जानती इन दरख़्तों को इन की जड़ों ने कभी इन के पत्तों तलक झील के पानी से भी सींचा नहीं तू नहीं जानती ये नदी जो समुंदर की बाहों में भरने को अपने ख़यालात की मस्तियों में बँधी बह रही थी इसे उन पहाड़ों ने रोका हुआ है जिन्हें एक दिन अपने बादल के पानी में भीगे हुए सर्दियों में सिसकने का अभिशाप था तू नहीं जानती आइनों का वो दुख जो कि दीवार पर लटके रहते हैं और ढूँढ़ते हैं वो चेहरा जो दिखने में ख़ुद्दार हो और ज़माने की नज़रों में बेकार हो फिर मगर झुर्रियों से भरे अक्स देखें तो ये सोचते हैं क्या इनको किसी ने इसी के लिए रेत की धड़कनों से निचोड़ा था तू नहीं जानती कि वो मज़दूर ईनाम लेने गए थे मगर शाह ने उन के फ़न को ही उन सेे अलग कर के ऐसा शहर गढ़ दिया कि जहाँ अठारह हज़ार बे-हाथ लोगों की बाशिंदगी थी जहाँ अब तलक इक हसीं ताज के चौदह दफ़ा हामिला होने की चीख़ें गढ़ी हैं मगर उस इमारत को फिर भी मुहब्बत की झूठी निशानी बनाया गया तू नहीं जानती मैं वही रेत हूँ जिस को जितना दबाया गया मुट्ठियों में वो उतनी ही ज़्यादा फिसलती गई और फिर जा गिरी दामनों में किसी के मगर फिर वहाँ भी ये रह न सकी जिस का दामन था उस की ही आँखों में ये रेत चुभने लगी उस ने दामन को अपने सफ़ा कर दिया रेत को दामनों से जुदा कर दिया

Praveen Sharma SHAJAR

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“हालत ए हाल” तुम ने मुझ सेे पूछा है मेरा हाल कैसा है क्या बताऊँ मैं तुम को जब से उस ने छोड़ा है मेरी बात को सुनना और उस पे कुछ कहना तब से हाल ऐसा है रोज़ ख़ुद से कहता हूँ उस को भूल जाऊँगा मैं भी एक दिन फिर से खुल के मुस्कुराऊँगा इस सेे पहले भी मैं ने कितने लोग खोए हैं इस सेे पहले भी मेरा हाल ऐसे बिगड़ा था इस सेे पहले भी मेरा दिल कि ऐसे उजड़ा था देखो उन की यादों में अब कहाँ मैं रोता हूँ बात कुछ दिनों की है वो भी कल नहीं होगी ग़म भी कल नहीं होगा सब सही सही होगा एक दरिया यूँँ भी तो इक तरफ़ नहीं बहता एक वक़्त यूँँ भी तो देर तक नहीं रहता दिल तो मेरा करता है उस सेे पूछ लूँ जा कर या वो बोल दे आ कर दोस्ती सलामत है ख़ैर ये नहीं होगा ये भी जानता हूँ मैं और दुख इसी का है एक बात बतलाऊँ वो जो लोग कहते हैं लड़कियाँ वफ़ाओं से वास्ता नहीं रखतीं लड़कियाँ मोहब्बत से राब्ता नहीं रखतीं वो जो लोग कहते हैं बेवफाएं होती हैं वो जो तंज करते हैं लड़कियों की उल्फत पे और उन की फ़ितरत पे उन की बात मत सुनना वो न झूठ कहते हैं मेरे साथ हो ना हो लेकिन अब भी कहता हूँ वो वफ़ा की मूरत है वो हया की शिद्दत है उस ने जो किया होगा सोच कर किया होगा हाँ यही तो होता है लड़कियाँ जो करती हैं सोच कर ही करती हैं उस ने जो भी चाहा था उस ने जो भी माँगा था मैं उसे न दे पाया उस ने क्या ही माँगा था बस उसे समझ लूँ मैं उस को मान लूँ अपना मुझ सेे ये न हो पाया मुझ सेे हाथ फैला कर उस ने मुझ को माँगा था मैं उसे न दे पाया तुम तो जानते ही हो मैं तो ज़िन्दगी भर के रब्त कब बनाता हूँ तुम तो जानते ही हो मैं किसी के होने का अहद कब निभाता हूँ मेरी सोच जो भी हो इस सेे उस को क्या लेना उस का हाल जो भी हो मुझ को इस सेे क्या मतलब कल तो जाने क्या होगा आज लेकिन ऐसा है आज दर्द होता है तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने अपने सारे ज़ख़्मों को लो दिखा दिया मैं ने लेकिन उस के ज़ख़्मों कौन देखता होगा मुझ सेे दूर हो कर के उस का हाल कैसा है कौन पूछता होगा मेरे दोस्त हो न तुम एक काम कर दोगे वो अगर मिले तुम को लौटती जो दफ़्तर से उस को रोक लेना तुम उस सेे पूछ लेना तुम उस का हाल कैसा है

Praveen Sharma SHAJAR

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“एक रात“ एक पंखा है एक रस्सी है और तन्हाई काफ़ी अच्छी है तेरा ग़म सोने पे सुहागा है जैसे दस्तूर और मौका है ऐसे मौसम में यही अच्छा है या तो तू आए तसल्ली देने या तेरा कॉल भी बहुत होगा वरना ये ज़िंदगी खोने के लिए ऐसा माहौल भी बहुत होगा

Praveen Sharma SHAJAR

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“चाय” सड़क के किनारे पे उगते हुए और कहीं आसमानों को छूते हुए परबतों और पहाड़ों पे ढलती हुई बारिशों की बदौलत पले चंद पेड़ों के बागान से कितने मीलों के तन्हा सफ़र तय किए कितनी झीलों के सागर के दरिया के पानी को पीते हुए कहीं आँधियों से उलझते हुए कहीं शांत नदियों के वातास पीते हुए कितने गाँवों से शहरों से लहरों से होते हुए कहीं टूट कर के कहीं फूट कर के कहीं पे मशीनों कहीं पे वो फ़नकार मानिंद मज़दूर हाथों की सतहों पे रगड़े हुए गलियारों में कैफ़े में सड़कों पर घर की रसोई में दफ़्तर में होटलों में, मिट्टी के लोहे के बादल नुमा चायदानों में उबलती मचलती हुई सजी धजी कीमती काँच की प्यालियों से कहीं झाँकती मुस्कुराती हुई और कहीं काग़ज़ी कप में बेजान सोई हुई हम को उस अपने पीले कहीं लाल रंग की कहीं पर सफ़ेदी के रंगों से पैदा हुई एक मद्धम सी आवाज़ देकर बुलाती हुई एक चाय जो मिल जाए तो फिर शराबी भला कोई क्यूँँ हो

Praveen Sharma SHAJAR

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