nazmKuch Alfaaz

“चाय” सड़क के किनारे पे उगते हुए और कहीं आसमानों को छूते हुए परबतों और पहाड़ों पे ढलती हुई बारिशों की बदौलत पले चंद पेड़ों के बागान से कितने मीलों के तन्हा सफ़र तय किए कितनी झीलों के सागर के दरिया के पानी को पीते हुए कहीं आँधियों से उलझते हुए कहीं शांत नदियों के वातास पीते हुए कितने गाँवों से शहरों से लहरों से होते हुए कहीं टूट कर के कहीं फूट कर के कहीं पे मशीनों कहीं पे वो फ़नकार मानिंद मज़दूर हाथों की सतहों पे रगड़े हुए गलियारों में कैफ़े में सड़कों पर घर की रसोई में दफ़्तर में होटलों में, मिट्टी के लोहे के बादल नुमा चायदानों में उबलती मचलती हुई सजी धजी कीमती काँच की प्यालियों से कहीं झाँकती मुस्कुराती हुई और कहीं काग़ज़ी कप में बेजान सोई हुई हम को उस अपने पीले कहीं लाल रंग की कहीं पर सफ़ेदी के रंगों से पैदा हुई एक मद्धम सी आवाज़ देकर बुलाती हुई एक चाय जो मिल जाए तो फिर शराबी भला कोई क्यूँँ हो

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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"हिज्र" न जाने कैसे लोग थे वो जो उन के दिल को भा गए मैं ने मोहब्बत चाही तो वो यादें मुझ को थमा गए प्रेम जितना दिल में था ज़बाँ पर आ कर लफ़्ज़ हुआ जब तुम ने उन को सुना नहीं नम बनकर नयन में समा गए दिल में थी एक आस बची तेरी बे-रुख़ी से हार गई वो मोहब्बत थी मेरी जो तुम हँसी में उड़ा गए तुम ने आँखें जो फेरी हैं अब ऐसा शाम सवेरा है सूरज है जैसे बुझा हुआ चँदा तुम जैसे जला गए कानों को थे जो तीर लगे वो दिल पर आ कर ज़ख़्म हुए अब दर्द आँखों में रहता है ये क्या तुम मुझ को सुना गए सागर जो बादल बनकर साहिल से था जुदा हुआ पर्वत ने पूछा हाल ज़रा सारा मंज़र वो बहा गए नींद हटा कर आँखों से ये ख़्वाब तुम्हारे बैठे हैं याद उठी जब आँखों में तो ख़्वाब ये सारे नहा गए बस पैदल ही चल कर के कोई भव-सागर पार हुआ और इस ज़मीं पर डूब कर ये जान कितने गँवा गए अब बस अकेला रहता है और बात तुम्हारी करता है बस खोया सा रहता है क्या तुम दिल को सिखा गए जब साथ तुम्हारा छूटा तो सब ख़्वाब ये मेरे टूटे हैं जब ख़्वाब को पाना चाहा तो सब ज़िम्मेदारी बता गए

Divya 'Kumar Sahab'

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"वो" वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबा वो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबा किस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कार किस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ार गेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुए और कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुए रंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहीं कैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहीं वो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशी जैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ी मुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहीं ऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहीं दुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहीं वो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं

Jaun Elia

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"तेरी याद है" मैं हूँ ये काली अँधेरी रात है तन्हाई है और तेरी याद है मेरे हाथ में क़लम है पास में रखा एक गिलास है जो शराब से भरा है तुझे याद किए जा रहा हूँ शराब पीते हुए नज़्म लिखते जा रहा हूँ सुनो मेरे लिखे नज़्म तो पढ़ोगी ना ख़्वाबों में मुलाक़ात तो करोगी ना प्यार से न सही, नफ़रत से ही मुझे याद तो करोगी ना जब याद आए मेरी तो ये भी ख़याल करना मैं तेरी आवाज़ सुनने को परेशान रहता हूँ मैं तुझे एक बार देखना चाहता हूँ मैं चाहता हूँ कि तू फिर से मेरे सर पे हाथ फेरे मैं ये भी चाहता हूँ कि तू फिर से आए मेरे पास और आ कर फिर कभी न जाए पर ऐसा तो हो ही नहीं सकता ऐसा होना तो नामुम्किन है

Rovej sheikh

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हम दोनो घर चल देंगे हाथ पकड़ कर रख मेरा सर सीने पर रख मेरा यक़ीन तू कर, तू कहीं जाने वाला नहीं है वेंटिलेटर कम पड़ जाए तो क्या ? अपने हाथों को वेंटिलेटर, मैं बना दूँगा मैं तेरी सांसो की ख़ातिर सच में सनम मैं अपनी सांसे तक गिरवी रख दूँगा मैं रब से झगड़ा कर लूंगा पर कैसे भी मैं तुझ को जाने नहीं दूँगा तू घबरा मत सब कुछ ठीक हो जाएगा जैसे पहले था सब वैसा हो जाएगा तू रो मत इतनी सी तो बात है, और इतना कुछ तो हम ने साथ में झेला है और फिर इक दिन ये भी दुख चला जाएगा ऐसा समझो हम एक जंग में है ऐसा जानो हम जीतेंगे बस तू अपना हौसला मत जाने देना बाकी तो तू मुझ पर छोड़ दे सब कुछ मैं हूँ ना !! क्यूँ फिक्र तू करती है ? जैसे कट जाता है हर इक दिन वैसे ये दिन भी कट जाएगा ये अँधेरा धीरे-धीरे हट जाएगा फिर से सहर होगी हमनें कितना कुछ जीना है अभी तो अपना वेट भी करता होगा, घर अपना तेरी बातों में फिर से खोना है मुझे तेरे साथ अभी कितना हँसना है मुझे मैं ने तेरे हाथों का खाना फिर से खाना है तू टेंशन मत रख हम जल्दी ही घर चल देंगे तुझ को कुछ नहीं होगा बस कुछ दिन की बात है फिर हम दोनो घर चल देंगे

BR SUDHAKAR

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"नामालूम" तुझ को लगता है जो पेड़ सूखे हुए हैं उन्हें सूखने का सबब है ख़िज़ाँ तुझ को लगता है सागर जो ठहरा हुआ है वो ठहरा हुआ है यूँँ ही बे-वजह तुझ को लगता है सहरा में जो धूल है उड़ रही है वो बस आँधियों के सबब तुझ को लगता है जो कुछ हुआ है वो बस हो गया है यूँँ ही जो हुआ वो बजा तू नहीं जानती पँछियों ने ही ख़ुद तोड़ डाले हैं अपने घरौंदे मगर अब वो बे-घर हैं और ढूँढ़ते हैं किसी और के घोंसले क्यूँँकि उन की सजाई हुई शाख़ पर किसी अंजान परिंदे ने अपने घरौंदे बनाए हुए हैं कि फिर जो पा सकें नेह जो उन को पहले मिला था कभी आस ले कर के ऐसी तेरे दर पे आए हुए हैं तू समझती है ये पेड़ यूँँ ही गिरा है नहीं इस की शाख़ों पे पंछी नहीं थे इसी के सबब ख़ुद-कुशी कर चुका है तू समझती है ये जो इमारत है बस वक़्त की मार से ढह गई है नहीं इस को तन्हाइयों ने सताया बहुत बरग़लाया बहुत बस इसी के सबब अपनी बुनियाद को छोड़ कर जा रही है तुझ को लगता है इन राहगीरों को अब तक मिला ही नहीं है कोई कारवाँ पर ये वो हैं जो भीड़ों में छुप न सके और अकेले किसी को दिखे ही नहीं इनको तन्हाइयों ने रुलाया बहुत फिर इन्होंने मगर उन ही तन्हाइयों को ग़ज़ल कर दिया तू नहीं जानती इन दरख़्तों को इन की जड़ों ने कभी इन के पत्तों तलक झील के पानी से भी सींचा नहीं तू नहीं जानती ये नदी जो समुंदर की बाहों में भरने को अपने ख़यालात की मस्तियों में बँधी बह रही थी इसे उन पहाड़ों ने रोका हुआ है जिन्हें एक दिन अपने बादल के पानी में भीगे हुए सर्दियों में सिसकने का अभिशाप था तू नहीं जानती आइनों का वो दुख जो कि दीवार पर लटके रहते हैं और ढूँढ़ते हैं वो चेहरा जो दिखने में ख़ुद्दार हो और ज़माने की नज़रों में बेकार हो फिर मगर झुर्रियों से भरे अक्स देखें तो ये सोचते हैं क्या इनको किसी ने इसी के लिए रेत की धड़कनों से निचोड़ा था तू नहीं जानती कि वो मज़दूर ईनाम लेने गए थे मगर शाह ने उन के फ़न को ही उन सेे अलग कर के ऐसा शहर गढ़ दिया कि जहाँ अठारह हज़ार बे-हाथ लोगों की बाशिंदगी थी जहाँ अब तलक इक हसीं ताज के चौदह दफ़ा हामिला होने की चीख़ें गढ़ी हैं मगर उस इमारत को फिर भी मुहब्बत की झूठी निशानी बनाया गया तू नहीं जानती मैं वही रेत हूँ जिस को जितना दबाया गया मुट्ठियों में वो उतनी ही ज़्यादा फिसलती गई और फिर जा गिरी दामनों में किसी के मगर फिर वहाँ भी ये रह न सकी जिस का दामन था उस की ही आँखों में ये रेत चुभने लगी उस ने दामन को अपने सफ़ा कर दिया रेत को दामनों से जुदा कर दिया

Praveen Sharma SHAJAR

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जी तो करता है मगर जी तो करता है तुझे दिल के हक़ीक़त कह दूँ दिल तो कहता है मुझे तुझ सेे है उल्फ़त कह दूँ तेरे चेहरे पे तबस्सुम का वो आना अक्सर मेरे सीने में चुभन और सुकूँ देता है तेरे आरिज़ पे वो लाली का चमकना इक दम मेरे भड़के हुए जज़्बों को तुलू देता है चाहता हूँ कि तेरा हाथ पकड़ कर कह दूँ मुझ को ये हाथ हमेशा के लिए पकड़ा दे सोचता हूँ कि तेरी आँखों में आँखें डालूँ और कह दूँ मेरे जज़्बात को तू अपना ले मेरे दिल के ये जो जज़्बे हैं अयाँ तो कर दूँ फिर ये जज़्बात बिखर जाने का डर लगता है तुझ को बतला दूँ मुझे तुझ सेे बहुत उल्फ़त है फिर मगर तेरे मुकर जाने का डर लगता है सोचता हूँ कि मैं जल्दी में करूँँ क्यूँँ कुछ भी तेरे दिल में भी हैं जज़्बात तसल्ली कर लूँ मेरे एहसास को पानी में बहाएगी न तू सब सेे पहले तो मेरे दिल की तशफ्फ़ी कर लूँ कहीं ऐसा तो नहीं मैं ही समझता हूँ फ़क़त तेरे दिल में तो कहीं कोई मुहब्बत ही न हो मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ वो तबस्सुम वो अदाएँ तेरी आदत ही न हो कहीं ऐसा न हो पाँव मेरे बहकें लेकिन तेरी इन मरमरीं बाहों का सहारा न मिले मेरी कश्ती कहीं दरियाओं में डोले डूबे और तेरे प्यार के सागर का किनारा न मिले ख़ैर सब सोच के सोचा तुझे बतला दूँगा मेरी धड़कन को तेरी धड़कनों से रक़बत है तेरे दिल का तू मुझे हाल बता क्या है ज़रा मेरे दिल का तो वही हाल इसे उल्फ़त है मैं ने बतला के तुझे देख ज़रा क्या पाया अपने ख़्वाबों का मज़ा खोए हुए बैठा हूँ तेरे आने से भी पहले मैं अकेला था मगर तेरे जाने पे मैं सहरा की तरह तन्हा हूँ

Praveen Sharma SHAJAR

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“हालत ए हाल” तुम ने मुझ सेे पूछा है मेरा हाल कैसा है क्या बताऊँ मैं तुम को जब से उस ने छोड़ा है मेरी बात को सुनना और उस पे कुछ कहना तब से हाल ऐसा है रोज़ ख़ुद से कहता हूँ उस को भूल जाऊँगा मैं भी एक दिन फिर से खुल के मुस्कुराऊँगा इस सेे पहले भी मैं ने कितने लोग खोए हैं इस सेे पहले भी मेरा हाल ऐसे बिगड़ा था इस सेे पहले भी मेरा दिल कि ऐसे उजड़ा था देखो उन की यादों में अब कहाँ मैं रोता हूँ बात कुछ दिनों की है वो भी कल नहीं होगी ग़म भी कल नहीं होगा सब सही सही होगा एक दरिया यूँँ भी तो इक तरफ़ नहीं बहता एक वक़्त यूँँ भी तो देर तक नहीं रहता दिल तो मेरा करता है उस सेे पूछ लूँ जा कर या वो बोल दे आ कर दोस्ती सलामत है ख़ैर ये नहीं होगा ये भी जानता हूँ मैं और दुख इसी का है एक बात बतलाऊँ वो जो लोग कहते हैं लड़कियाँ वफ़ाओं से वास्ता नहीं रखतीं लड़कियाँ मोहब्बत से राब्ता नहीं रखतीं वो जो लोग कहते हैं बेवफाएं होती हैं वो जो तंज करते हैं लड़कियों की उल्फत पे और उन की फ़ितरत पे उन की बात मत सुनना वो न झूठ कहते हैं मेरे साथ हो ना हो लेकिन अब भी कहता हूँ वो वफ़ा की मूरत है वो हया की शिद्दत है उस ने जो किया होगा सोच कर किया होगा हाँ यही तो होता है लड़कियाँ जो करती हैं सोच कर ही करती हैं उस ने जो भी चाहा था उस ने जो भी माँगा था मैं उसे न दे पाया उस ने क्या ही माँगा था बस उसे समझ लूँ मैं उस को मान लूँ अपना मुझ सेे ये न हो पाया मुझ सेे हाथ फैला कर उस ने मुझ को माँगा था मैं उसे न दे पाया तुम तो जानते ही हो मैं तो ज़िन्दगी भर के रब्त कब बनाता हूँ तुम तो जानते ही हो मैं किसी के होने का अहद कब निभाता हूँ मेरी सोच जो भी हो इस सेे उस को क्या लेना उस का हाल जो भी हो मुझ को इस सेे क्या मतलब कल तो जाने क्या होगा आज लेकिन ऐसा है आज दर्द होता है तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने अपने सारे ज़ख़्मों को लो दिखा दिया मैं ने लेकिन उस के ज़ख़्मों कौन देखता होगा मुझ सेे दूर हो कर के उस का हाल कैसा है कौन पूछता होगा मेरे दोस्त हो न तुम एक काम कर दोगे वो अगर मिले तुम को लौटती जो दफ़्तर से उस को रोक लेना तुम उस सेे पूछ लेना तुम उस का हाल कैसा है

Praveen Sharma SHAJAR

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“एक रात“ एक पंखा है एक रस्सी है और तन्हाई काफ़ी अच्छी है तेरा ग़म सोने पे सुहागा है जैसे दस्तूर और मौका है ऐसे मौसम में यही अच्छा है या तो तू आए तसल्ली देने या तेरा कॉल भी बहुत होगा वरना ये ज़िंदगी खोने के लिए ऐसा माहौल भी बहुत होगा

Praveen Sharma SHAJAR

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“उम्मीद “ कैसे तन्हाई में रोऊँ कैसे महफ़िल में हसूँ ग़म से सूरत मिरी बर्बाद भी हो सकती है बस यही सोच के ख़ुद को मैं सजाता हूँ रोज़ तुझ से इक रोज़ मुलाक़ात भी हो सकती है न है गैरों से ही शिकवा न ही अपनों से सवाल सब के सब एक तराजू पे हैं तोले मुझ को ग़म अगर आग है तो कहना जलाए मेरा दिल ग़म समुंदर है तो कहना कि डुबोले मुझ को ऐसी तन्हाई भी आती है की दिल चीख़ पड़ा ऐसी ख़ुशियाँ भी थीं कि जिन में मुझे होश न था चाहे मंज़र कोई भी आए गए हों मुझ पर मैं तुझे याद न करता ऐसा मदहोश न था अब चला हूँ तेरी जानिब तो ये डर लगता है तू न पहचान सकेगी मुझे तो क्या होगा फिर उसी पल ये ख़याल आता है दिल में मेरे अब तलक भी तेरे बगैर ही जीता रहा हूँ अब भला कौन सा दुख है नया जो दर पर है अब भला कैसी ख़िज़ाँ है कि जो मुरझा रहा हूँ तू न आए न बुलाए तो कोई बात नहीं पर बुलाये आए तो कोई बात भी हो सकती है इतना कुछ सोच के ख़ुद को में सजाता हूँ फिर तुझ सेे इक रोज़ मुलाक़ात भी हो सकती है

Praveen Sharma SHAJAR

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