nazmKuch Alfaaz

“उम्मीद “ कैसे तन्हाई में रोऊँ कैसे महफ़िल में हसूँ ग़म से सूरत मिरी बर्बाद भी हो सकती है बस यही सोच के ख़ुद को मैं सजाता हूँ रोज़ तुझ से इक रोज़ मुलाक़ात भी हो सकती है न है गैरों से ही शिकवा न ही अपनों से सवाल सब के सब एक तराजू पे हैं तोले मुझ को ग़म अगर आग है तो कहना जलाए मेरा दिल ग़म समुंदर है तो कहना कि डुबोले मुझ को ऐसी तन्हाई भी आती है की दिल चीख़ पड़ा ऐसी ख़ुशियाँ भी थीं कि जिन में मुझे होश न था चाहे मंज़र कोई भी आए गए हों मुझ पर मैं तुझे याद न करता ऐसा मदहोश न था अब चला हूँ तेरी जानिब तो ये डर लगता है तू न पहचान सकेगी मुझे तो क्या होगा फिर उसी पल ये ख़याल आता है दिल में मेरे अब तलक भी तेरे बगैर ही जीता रहा हूँ अब भला कौन सा दुख है नया जो दर पर है अब भला कैसी ख़िज़ाँ है कि जो मुरझा रहा हूँ तू न आए न बुलाए तो कोई बात नहीं पर बुलाये आए तो कोई बात भी हो सकती है इतना कुछ सोच के ख़ुद को में सजाता हूँ फिर तुझ सेे इक रोज़ मुलाक़ात भी हो सकती है

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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जी तो करता है मगर जी तो करता है तुझे दिल के हक़ीक़त कह दूँ दिल तो कहता है मुझे तुझ सेे है उल्फ़त कह दूँ तेरे चेहरे पे तबस्सुम का वो आना अक्सर मेरे सीने में चुभन और सुकूँ देता है तेरे आरिज़ पे वो लाली का चमकना इक दम मेरे भड़के हुए जज़्बों को तुलू देता है चाहता हूँ कि तेरा हाथ पकड़ कर कह दूँ मुझ को ये हाथ हमेशा के लिए पकड़ा दे सोचता हूँ कि तेरी आँखों में आँखें डालूँ और कह दूँ मेरे जज़्बात को तू अपना ले मेरे दिल के ये जो जज़्बे हैं अयाँ तो कर दूँ फिर ये जज़्बात बिखर जाने का डर लगता है तुझ को बतला दूँ मुझे तुझ सेे बहुत उल्फ़त है फिर मगर तेरे मुकर जाने का डर लगता है सोचता हूँ कि मैं जल्दी में करूँँ क्यूँँ कुछ भी तेरे दिल में भी हैं जज़्बात तसल्ली कर लूँ मेरे एहसास को पानी में बहाएगी न तू सब सेे पहले तो मेरे दिल की तशफ्फ़ी कर लूँ कहीं ऐसा तो नहीं मैं ही समझता हूँ फ़क़त तेरे दिल में तो कहीं कोई मुहब्बत ही न हो मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ वो तबस्सुम वो अदाएँ तेरी आदत ही न हो कहीं ऐसा न हो पाँव मेरे बहकें लेकिन तेरी इन मरमरीं बाहों का सहारा न मिले मेरी कश्ती कहीं दरियाओं में डोले डूबे और तेरे प्यार के सागर का किनारा न मिले ख़ैर सब सोच के सोचा तुझे बतला दूँगा मेरी धड़कन को तेरी धड़कनों से रक़बत है तेरे दिल का तू मुझे हाल बता क्या है ज़रा मेरे दिल का तो वही हाल इसे उल्फ़त है मैं ने बतला के तुझे देख ज़रा क्या पाया अपने ख़्वाबों का मज़ा खोए हुए बैठा हूँ तेरे आने से भी पहले मैं अकेला था मगर तेरे जाने पे मैं सहरा की तरह तन्हा हूँ

Praveen Sharma SHAJAR

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“हालत ए हाल” तुम ने मुझ सेे पूछा है मेरा हाल कैसा है क्या बताऊँ मैं तुम को जब से उस ने छोड़ा है मेरी बात को सुनना और उस पे कुछ कहना तब से हाल ऐसा है रोज़ ख़ुद से कहता हूँ उस को भूल जाऊँगा मैं भी एक दिन फिर से खुल के मुस्कुराऊँगा इस सेे पहले भी मैं ने कितने लोग खोए हैं इस सेे पहले भी मेरा हाल ऐसे बिगड़ा था इस सेे पहले भी मेरा दिल कि ऐसे उजड़ा था देखो उन की यादों में अब कहाँ मैं रोता हूँ बात कुछ दिनों की है वो भी कल नहीं होगी ग़म भी कल नहीं होगा सब सही सही होगा एक दरिया यूँँ भी तो इक तरफ़ नहीं बहता एक वक़्त यूँँ भी तो देर तक नहीं रहता दिल तो मेरा करता है उस सेे पूछ लूँ जा कर या वो बोल दे आ कर दोस्ती सलामत है ख़ैर ये नहीं होगा ये भी जानता हूँ मैं और दुख इसी का है एक बात बतलाऊँ वो जो लोग कहते हैं लड़कियाँ वफ़ाओं से वास्ता नहीं रखतीं लड़कियाँ मोहब्बत से राब्ता नहीं रखतीं वो जो लोग कहते हैं बेवफाएं होती हैं वो जो तंज करते हैं लड़कियों की उल्फत पे और उन की फ़ितरत पे उन की बात मत सुनना वो न झूठ कहते हैं मेरे साथ हो ना हो लेकिन अब भी कहता हूँ वो वफ़ा की मूरत है वो हया की शिद्दत है उस ने जो किया होगा सोच कर किया होगा हाँ यही तो होता है लड़कियाँ जो करती हैं सोच कर ही करती हैं उस ने जो भी चाहा था उस ने जो भी माँगा था मैं उसे न दे पाया उस ने क्या ही माँगा था बस उसे समझ लूँ मैं उस को मान लूँ अपना मुझ सेे ये न हो पाया मुझ सेे हाथ फैला कर उस ने मुझ को माँगा था मैं उसे न दे पाया तुम तो जानते ही हो मैं तो ज़िन्दगी भर के रब्त कब बनाता हूँ तुम तो जानते ही हो मैं किसी के होने का अहद कब निभाता हूँ मेरी सोच जो भी हो इस सेे उस को क्या लेना उस का हाल जो भी हो मुझ को इस सेे क्या मतलब कल तो जाने क्या होगा आज लेकिन ऐसा है आज दर्द होता है तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने अपने सारे ज़ख़्मों को लो दिखा दिया मैं ने लेकिन उस के ज़ख़्मों कौन देखता होगा मुझ सेे दूर हो कर के उस का हाल कैसा है कौन पूछता होगा मेरे दोस्त हो न तुम एक काम कर दोगे वो अगर मिले तुम को लौटती जो दफ़्तर से उस को रोक लेना तुम उस सेे पूछ लेना तुम उस का हाल कैसा है

Praveen Sharma SHAJAR

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“चाय” सड़क के किनारे पे उगते हुए और कहीं आसमानों को छूते हुए परबतों और पहाड़ों पे ढलती हुई बारिशों की बदौलत पले चंद पेड़ों के बागान से कितने मीलों के तन्हा सफ़र तय किए कितनी झीलों के सागर के दरिया के पानी को पीते हुए कहीं आँधियों से उलझते हुए कहीं शांत नदियों के वातास पीते हुए कितने गाँवों से शहरों से लहरों से होते हुए कहीं टूट कर के कहीं फूट कर के कहीं पे मशीनों कहीं पे वो फ़नकार मानिंद मज़दूर हाथों की सतहों पे रगड़े हुए गलियारों में कैफ़े में सड़कों पर घर की रसोई में दफ़्तर में होटलों में, मिट्टी के लोहे के बादल नुमा चायदानों में उबलती मचलती हुई सजी धजी कीमती काँच की प्यालियों से कहीं झाँकती मुस्कुराती हुई और कहीं काग़ज़ी कप में बेजान सोई हुई हम को उस अपने पीले कहीं लाल रंग की कहीं पर सफ़ेदी के रंगों से पैदा हुई एक मद्धम सी आवाज़ देकर बुलाती हुई एक चाय जो मिल जाए तो फिर शराबी भला कोई क्यूँँ हो

Praveen Sharma SHAJAR

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"नामालूम" तुझ को लगता है जो पेड़ सूखे हुए हैं उन्हें सूखने का सबब है ख़िज़ाँ तुझ को लगता है सागर जो ठहरा हुआ है वो ठहरा हुआ है यूँँ ही बे-वजह तुझ को लगता है सहरा में जो धूल है उड़ रही है वो बस आँधियों के सबब तुझ को लगता है जो कुछ हुआ है वो बस हो गया है यूँँ ही जो हुआ वो बजा तू नहीं जानती पँछियों ने ही ख़ुद तोड़ डाले हैं अपने घरौंदे मगर अब वो बे-घर हैं और ढूँढ़ते हैं किसी और के घोंसले क्यूँँकि उन की सजाई हुई शाख़ पर किसी अंजान परिंदे ने अपने घरौंदे बनाए हुए हैं कि फिर जो पा सकें नेह जो उन को पहले मिला था कभी आस ले कर के ऐसी तेरे दर पे आए हुए हैं तू समझती है ये पेड़ यूँँ ही गिरा है नहीं इस की शाख़ों पे पंछी नहीं थे इसी के सबब ख़ुद-कुशी कर चुका है तू समझती है ये जो इमारत है बस वक़्त की मार से ढह गई है नहीं इस को तन्हाइयों ने सताया बहुत बरग़लाया बहुत बस इसी के सबब अपनी बुनियाद को छोड़ कर जा रही है तुझ को लगता है इन राहगीरों को अब तक मिला ही नहीं है कोई कारवाँ पर ये वो हैं जो भीड़ों में छुप न सके और अकेले किसी को दिखे ही नहीं इनको तन्हाइयों ने रुलाया बहुत फिर इन्होंने मगर उन ही तन्हाइयों को ग़ज़ल कर दिया तू नहीं जानती इन दरख़्तों को इन की जड़ों ने कभी इन के पत्तों तलक झील के पानी से भी सींचा नहीं तू नहीं जानती ये नदी जो समुंदर की बाहों में भरने को अपने ख़यालात की मस्तियों में बँधी बह रही थी इसे उन पहाड़ों ने रोका हुआ है जिन्हें एक दिन अपने बादल के पानी में भीगे हुए सर्दियों में सिसकने का अभिशाप था तू नहीं जानती आइनों का वो दुख जो कि दीवार पर लटके रहते हैं और ढूँढ़ते हैं वो चेहरा जो दिखने में ख़ुद्दार हो और ज़माने की नज़रों में बेकार हो फिर मगर झुर्रियों से भरे अक्स देखें तो ये सोचते हैं क्या इनको किसी ने इसी के लिए रेत की धड़कनों से निचोड़ा था तू नहीं जानती कि वो मज़दूर ईनाम लेने गए थे मगर शाह ने उन के फ़न को ही उन सेे अलग कर के ऐसा शहर गढ़ दिया कि जहाँ अठारह हज़ार बे-हाथ लोगों की बाशिंदगी थी जहाँ अब तलक इक हसीं ताज के चौदह दफ़ा हामिला होने की चीख़ें गढ़ी हैं मगर उस इमारत को फिर भी मुहब्बत की झूठी निशानी बनाया गया तू नहीं जानती मैं वही रेत हूँ जिस को जितना दबाया गया मुट्ठियों में वो उतनी ही ज़्यादा फिसलती गई और फिर जा गिरी दामनों में किसी के मगर फिर वहाँ भी ये रह न सकी जिस का दामन था उस की ही आँखों में ये रेत चुभने लगी उस ने दामन को अपने सफ़ा कर दिया रेत को दामनों से जुदा कर दिया

Praveen Sharma SHAJAR

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“एक रात“ एक पंखा है एक रस्सी है और तन्हाई काफ़ी अच्छी है तेरा ग़म सोने पे सुहागा है जैसे दस्तूर और मौका है ऐसे मौसम में यही अच्छा है या तो तू आए तसल्ली देने या तेरा कॉल भी बहुत होगा वरना ये ज़िंदगी खोने के लिए ऐसा माहौल भी बहुत होगा

Praveen Sharma SHAJAR

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