nazmKuch Alfaaz

तुम ने फ़ासलों की बात समझ ली तो तुम्हें याद आएगा कि फ़ना हम सब की तक़दीर है तुम्हें मालूम है? तुम्हारे घर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मैं ने हज़ार बार चुप-चाप ज़ीने की सफ़ेद दीवारों पे उँगलियाँ फेरी हैं इस उम्मीद में कि शायद लम्स के ऐसे ज़ाइक़े वहाँ रह जाएँ जो तुम हमेशा बदन के गुंजलक और बे-लफ़्ज़ ज़ाइक़ों की तरह पहचान सको और याद रखो अब समझ में आने लगा है कि कोई नज़्म कभी इश्क़ और दर्द की अस्ल ज़रूरियात पूरी नहीं करती कि इश्क़ मौत के ख़िलाफ़ हथियार नहीं कि हमारे लफ़्ज़ हमारे मक़ासिद से ना-आश्ना हैं कि मुझे चाहत उस शख़्स की है जो तुम हो कि मैं मुकम्मल तौर पे तुम्हें कभी न जान पाऊँगा और तुम ने ये तमाम मुद्दत ख़ुद अपने मफ़्हूम की तलाश में सुलगते पिघलते गुज़ारी है

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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वापसी वापसी शिकस्ता बूढ़े शहर तेरी गलियाँ न जाने कब से उखड़े हुए साँसों की तरह बाहम उलझती रही हैं मिट्टी और फ़ौलाद और लकड़ी के शहर में मुक़द्दर की मिसाल एक बार फिर पलट आया हूँ

Ejaaz Ahamd Ejaaz

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मेरी मौत के मसीहा! तीन बर्र-ए-आज़मों पे तुम ने मेरा पीछा किया है मौसम बदलते रहे तक़दीर की तरह मैं शहर शहर फिरा धूप की तरह मैं ने ख़ामोशियाँ लफ़्ज़ों के सुपुर्द कीं ज़बान के लफ़्ज़ बदले मगर तुम इक तारीक सुरंग की तरह साया साया मेरे शुऊर में उतरते चले गए हो मेरे ज़ेहन मेरे जिस्म मेरे क़ल्ब के माकूस रुख़! मेरी तहरीरों के आसेब! तुम मेरी तंहाई हो मेरे वजूद की इंतिहा और शिकस्त चाहे हुए बदन तुम्हारी आग़ोश में राख हो गए हैं अबदी ख़ामोश हरीफ़! तुम काएनात के तमाम नूर के साथ शतरंज खेलते रहे हो मैं नय तुम्हारी क़ुव्वतों की हमा-गीर गुंजलक बिसात पे ख़ाना-ब-ख़ाना... इश्क़ और लफ़्ज़ों की सलीबें बिछाईं: तुम हवाओं की मिसाल मेरे आस-पास बरसते रहे तुम हर शाम फूलों पे यलग़ार करते पानियों पे चलते रहे हो ये जानते हुए भी कि मेरे लफ़्ज़ रेत के चेहरे पे खिंचे हुए बे-सबात नक़्श हैं मैं ने हर इब्तिदा हर इंतिहा का इसबात किया है फ़ासलों की तरह तुम सब कुछ निकलते चले गए हो हमारा झगड़ा ता-उम्र जारी रहेगा मेरे साँसों के साथी और दुश्मन: मेरे हम-शक्ल: मुक़द्दर की बंद किताब: मैं ने तुम्हारे राज़ जानने चाहे कैलेंडर की तारीख़ों में तुम्हें पढ़ना चाहा पलकों के दरमियान तुम्हारे लिबास के ना-मालूम तार बिछाए याद रखो! हर रौशनी ने तुम्हें अपने फ़ानी शोलों में लपेटना चाहा मगर वक़्त की कलीद! तुम ने कुंजियों का गुच्छा न जाने किस मिट्टी में दफ़्न कर दिया है तुम झूटे लफ़्ज़ों की तरह मेरी उँगलियों में से फिसलते चले गए हो

Ejaaz Ahamd Ejaaz

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यहाँ कभी कभी धूप भी ज़ीना ज़ीना यूँँ उतरी है जैसे अजनबी हो और मुझे वो लोग याद आए हैं जो अपने वतन से बिछड़ गए मुहाजिर जिला-वतन जिन्हों ने समझा था कि अजनबी शहर में मौत कम लोगों को आती है जो यहाँ इस गुमान में आए थे कि आफ़ियत दाइम रहेगी तुम ने ढलते सायों की सियासत से गुरेज़ किया है तुम धूप से डरे हो तुम ने आँख यूँँ बंद कर ली है जैसे पक्की ईंट है मेरे तुम्हारे दरमियान अब रोज़-मर्रा हमदर्दियों के लफ़्ज़ भी नहीं

Ejaaz Ahamd Ejaaz

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मेरी तमाम काएनात घास के वरक़ की तरह सूखने लगे तो तुम इस तन्हा रस्ते पे आओगे? तख़्लीक़ के चुप मालिक! आक़ा! ख़ुदा! तुम कि खोए होऊँ के दर्द मुद्दतों सँभाले रहे हो उस रस्ते पे कि जहाँ मुझे कभी यक़ीं न हो सका कि पानी माँगूँ तो कैसे रोटी या आफ़ियत या महज़ पहचान की भीक माँगूँ तो कैसे तुम आओगे? जले हुए जिस्म के इस रस्ते पे? मौत के दूसरे साहिल पे धुएँ की तरह पाश पाश बूढ़ी हड्डियों की इस सर-ज़मीन पे? यहाँ बे-नुत्क़ लफ़्ज़ एक दूसरे का मुँह तकते हैं और हर दुआ ने लफ़्ज़ों से मुँह मोड़ लिया है

Ejaaz Ahamd Ejaaz

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