यहाँ कभी कभी धूप भी ज़ीना ज़ीना यूँँ उतरी है जैसे अजनबी हो और मुझे वो लोग याद आए हैं जो अपने वतन से बिछड़ गए मुहाजिर जिला-वतन जिन्हों ने समझा था कि अजनबी शहर में मौत कम लोगों को आती है जो यहाँ इस गुमान में आए थे कि आफ़ियत दाइम रहेगी तुम ने ढलते सायों की सियासत से गुरेज़ किया है तुम धूप से डरे हो तुम ने आँख यूँँ बंद कर ली है जैसे पक्की ईंट है मेरे तुम्हारे दरमियान अब रोज़-मर्रा हमदर्दियों के लफ़्ज़ भी नहीं
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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जब छुआ साथ तुलसी चौरा आँखों में साँसों को खींचे तुम सेे जो वा'दा किया कभी पड़िया जी के पीपल नीचे तुम ने चाहा था ख़ुश रहना ख़ुद ख़ुशी सदा मुझ से सीखे दुनिया भर के संकल्प सतत पूरे होते मुझ में दीखे ख़ुद से अनुबंध किया है अब मन को निर्बंध किया है अब गत-विगत मुक्त हो सकने का सम्पूर्ण प्रबन्ध किया है अब इस नए साल के पहले दिन तुम से बाहर सोचा तो है मन-प्राण सुमरनी छोड़ेंगे सुनते तो हैं होता तो है काफ़ी है।
Kumar Vishwas
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वापसी वापसी शिकस्ता बूढ़े शहर तेरी गलियाँ न जाने कब से उखड़े हुए साँसों की तरह बाहम उलझती रही हैं मिट्टी और फ़ौलाद और लकड़ी के शहर में मुक़द्दर की मिसाल एक बार फिर पलट आया हूँ
Ejaaz Ahamd Ejaaz
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मेरी मौत के मसीहा! तीन बर्र-ए-आज़मों पे तुम ने मेरा पीछा किया है मौसम बदलते रहे तक़दीर की तरह मैं शहर शहर फिरा धूप की तरह मैं ने ख़ामोशियाँ लफ़्ज़ों के सुपुर्द कीं ज़बान के लफ़्ज़ बदले मगर तुम इक तारीक सुरंग की तरह साया साया मेरे शुऊर में उतरते चले गए हो मेरे ज़ेहन मेरे जिस्म मेरे क़ल्ब के माकूस रुख़! मेरी तहरीरों के आसेब! तुम मेरी तंहाई हो मेरे वजूद की इंतिहा और शिकस्त चाहे हुए बदन तुम्हारी आग़ोश में राख हो गए हैं अबदी ख़ामोश हरीफ़! तुम काएनात के तमाम नूर के साथ शतरंज खेलते रहे हो मैं नय तुम्हारी क़ुव्वतों की हमा-गीर गुंजलक बिसात पे ख़ाना-ब-ख़ाना... इश्क़ और लफ़्ज़ों की सलीबें बिछाईं: तुम हवाओं की मिसाल मेरे आस-पास बरसते रहे तुम हर शाम फूलों पे यलग़ार करते पानियों पे चलते रहे हो ये जानते हुए भी कि मेरे लफ़्ज़ रेत के चेहरे पे खिंचे हुए बे-सबात नक़्श हैं मैं ने हर इब्तिदा हर इंतिहा का इसबात किया है फ़ासलों की तरह तुम सब कुछ निकलते चले गए हो हमारा झगड़ा ता-उम्र जारी रहेगा मेरे साँसों के साथी और दुश्मन: मेरे हम-शक्ल: मुक़द्दर की बंद किताब: मैं ने तुम्हारे राज़ जानने चाहे कैलेंडर की तारीख़ों में तुम्हें पढ़ना चाहा पलकों के दरमियान तुम्हारे लिबास के ना-मालूम तार बिछाए याद रखो! हर रौशनी ने तुम्हें अपने फ़ानी शोलों में लपेटना चाहा मगर वक़्त की कलीद! तुम ने कुंजियों का गुच्छा न जाने किस मिट्टी में दफ़्न कर दिया है तुम झूटे लफ़्ज़ों की तरह मेरी उँगलियों में से फिसलते चले गए हो
Ejaaz Ahamd Ejaaz
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मेरी तमाम काएनात घास के वरक़ की तरह सूखने लगे तो तुम इस तन्हा रस्ते पे आओगे? तख़्लीक़ के चुप मालिक! आक़ा! ख़ुदा! तुम कि खोए होऊँ के दर्द मुद्दतों सँभाले रहे हो उस रस्ते पे कि जहाँ मुझे कभी यक़ीं न हो सका कि पानी माँगूँ तो कैसे रोटी या आफ़ियत या महज़ पहचान की भीक माँगूँ तो कैसे तुम आओगे? जले हुए जिस्म के इस रस्ते पे? मौत के दूसरे साहिल पे धुएँ की तरह पाश पाश बूढ़ी हड्डियों की इस सर-ज़मीन पे? यहाँ बे-नुत्क़ लफ़्ज़ एक दूसरे का मुँह तकते हैं और हर दुआ ने लफ़्ज़ों से मुँह मोड़ लिया है
Ejaaz Ahamd Ejaaz
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तुम ने फ़ासलों की बात समझ ली तो तुम्हें याद आएगा कि फ़ना हम सब की तक़दीर है तुम्हें मालूम है? तुम्हारे घर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मैं ने हज़ार बार चुप-चाप ज़ीने की सफ़ेद दीवारों पे उँगलियाँ फेरी हैं इस उम्मीद में कि शायद लम्स के ऐसे ज़ाइक़े वहाँ रह जाएँ जो तुम हमेशा बदन के गुंजलक और बे-लफ़्ज़ ज़ाइक़ों की तरह पहचान सको और याद रखो अब समझ में आने लगा है कि कोई नज़्म कभी इश्क़ और दर्द की अस्ल ज़रूरियात पूरी नहीं करती कि इश्क़ मौत के ख़िलाफ़ हथियार नहीं कि हमारे लफ़्ज़ हमारे मक़ासिद से ना-आश्ना हैं कि मुझे चाहत उस शख़्स की है जो तुम हो कि मैं मुकम्मल तौर पे तुम्हें कभी न जान पाऊँगा और तुम ने ये तमाम मुद्दत ख़ुद अपने मफ़्हूम की तलाश में सुलगते पिघलते गुज़ारी है
Ejaaz Ahamd Ejaaz
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