मेरी तमाम काएनात घास के वरक़ की तरह सूखने लगे तो तुम इस तन्हा रस्ते पे आओगे? तख़्लीक़ के चुप मालिक! आक़ा! ख़ुदा! तुम कि खोए होऊँ के दर्द मुद्दतों सँभाले रहे हो उस रस्ते पे कि जहाँ मुझे कभी यक़ीं न हो सका कि पानी माँगूँ तो कैसे रोटी या आफ़ियत या महज़ पहचान की भीक माँगूँ तो कैसे तुम आओगे? जले हुए जिस्म के इस रस्ते पे? मौत के दूसरे साहिल पे धुएँ की तरह पाश पाश बूढ़ी हड्डियों की इस सर-ज़मीन पे? यहाँ बे-नुत्क़ लफ़्ज़ एक दूसरे का मुँह तकते हैं और हर दुआ ने लफ़्ज़ों से मुँह मोड़ लिया है
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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वापसी वापसी शिकस्ता बूढ़े शहर तेरी गलियाँ न जाने कब से उखड़े हुए साँसों की तरह बाहम उलझती रही हैं मिट्टी और फ़ौलाद और लकड़ी के शहर में मुक़द्दर की मिसाल एक बार फिर पलट आया हूँ
Ejaaz Ahamd Ejaaz
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मेरी मौत के मसीहा! तीन बर्र-ए-आज़मों पे तुम ने मेरा पीछा किया है मौसम बदलते रहे तक़दीर की तरह मैं शहर शहर फिरा धूप की तरह मैं ने ख़ामोशियाँ लफ़्ज़ों के सुपुर्द कीं ज़बान के लफ़्ज़ बदले मगर तुम इक तारीक सुरंग की तरह साया साया मेरे शुऊर में उतरते चले गए हो मेरे ज़ेहन मेरे जिस्म मेरे क़ल्ब के माकूस रुख़! मेरी तहरीरों के आसेब! तुम मेरी तंहाई हो मेरे वजूद की इंतिहा और शिकस्त चाहे हुए बदन तुम्हारी आग़ोश में राख हो गए हैं अबदी ख़ामोश हरीफ़! तुम काएनात के तमाम नूर के साथ शतरंज खेलते रहे हो मैं नय तुम्हारी क़ुव्वतों की हमा-गीर गुंजलक बिसात पे ख़ाना-ब-ख़ाना... इश्क़ और लफ़्ज़ों की सलीबें बिछाईं: तुम हवाओं की मिसाल मेरे आस-पास बरसते रहे तुम हर शाम फूलों पे यलग़ार करते पानियों पे चलते रहे हो ये जानते हुए भी कि मेरे लफ़्ज़ रेत के चेहरे पे खिंचे हुए बे-सबात नक़्श हैं मैं ने हर इब्तिदा हर इंतिहा का इसबात किया है फ़ासलों की तरह तुम सब कुछ निकलते चले गए हो हमारा झगड़ा ता-उम्र जारी रहेगा मेरे साँसों के साथी और दुश्मन: मेरे हम-शक्ल: मुक़द्दर की बंद किताब: मैं ने तुम्हारे राज़ जानने चाहे कैलेंडर की तारीख़ों में तुम्हें पढ़ना चाहा पलकों के दरमियान तुम्हारे लिबास के ना-मालूम तार बिछाए याद रखो! हर रौशनी ने तुम्हें अपने फ़ानी शोलों में लपेटना चाहा मगर वक़्त की कलीद! तुम ने कुंजियों का गुच्छा न जाने किस मिट्टी में दफ़्न कर दिया है तुम झूटे लफ़्ज़ों की तरह मेरी उँगलियों में से फिसलते चले गए हो
Ejaaz Ahamd Ejaaz
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यहाँ कभी कभी धूप भी ज़ीना ज़ीना यूँँ उतरी है जैसे अजनबी हो और मुझे वो लोग याद आए हैं जो अपने वतन से बिछड़ गए मुहाजिर जिला-वतन जिन्हों ने समझा था कि अजनबी शहर में मौत कम लोगों को आती है जो यहाँ इस गुमान में आए थे कि आफ़ियत दाइम रहेगी तुम ने ढलते सायों की सियासत से गुरेज़ किया है तुम धूप से डरे हो तुम ने आँख यूँँ बंद कर ली है जैसे पक्की ईंट है मेरे तुम्हारे दरमियान अब रोज़-मर्रा हमदर्दियों के लफ़्ज़ भी नहीं
Ejaaz Ahamd Ejaaz
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तुम ने फ़ासलों की बात समझ ली तो तुम्हें याद आएगा कि फ़ना हम सब की तक़दीर है तुम्हें मालूम है? तुम्हारे घर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मैं ने हज़ार बार चुप-चाप ज़ीने की सफ़ेद दीवारों पे उँगलियाँ फेरी हैं इस उम्मीद में कि शायद लम्स के ऐसे ज़ाइक़े वहाँ रह जाएँ जो तुम हमेशा बदन के गुंजलक और बे-लफ़्ज़ ज़ाइक़ों की तरह पहचान सको और याद रखो अब समझ में आने लगा है कि कोई नज़्म कभी इश्क़ और दर्द की अस्ल ज़रूरियात पूरी नहीं करती कि इश्क़ मौत के ख़िलाफ़ हथियार नहीं कि हमारे लफ़्ज़ हमारे मक़ासिद से ना-आश्ना हैं कि मुझे चाहत उस शख़्स की है जो तुम हो कि मैं मुकम्मल तौर पे तुम्हें कभी न जान पाऊँगा और तुम ने ये तमाम मुद्दत ख़ुद अपने मफ़्हूम की तलाश में सुलगते पिघलते गुज़ारी है
Ejaaz Ahamd Ejaaz
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