"ग़लती करली प्यार कर के" क़स में वादों को दर किनार कर के उस ने छोड़ा है मुझे प्यार कर के मुनाफि़कों के ख़ानदान से है वास्ता उस का गया है वो अच्छा व्यापार कर के हमें नाज़ था तबीअत पर हमारी वो मुस्कुरा रहा है हमें बीमार कर के एक मुद्दत से हमें सुकून नहीं है तौबा करली इज़हार कर के
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"वो लड़की" सीने में अतीत की यादे दबाते हुए उदासी छिपा रही थी वो मुस्कुराते हुए अंदर उस के आंसुओ का सैलाब भरा हुआ था डर रही थी वो उन्हें बाहर लाते हुए उसे धोखा मिला था मोहबब्त में कुछ दोस्त भी यक़ीनन मतलबी रहे उस के मैं ने बढ़ाया जो हाथ दोस्ती का वो कांप रही थी हाथ मिलाते हुए मुकम्मल मुलाक़ात अधूरी छोड़ आया मैं इज़हार करने से पहले लब मोड़ आया मैं उस की बस यही बात उदास कर गई उस ने पलटकर ना देखा वापस जाते हुए
Mayank Agarwal
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"वो ढूँढ़ रही है" बेईमानों की बस्ती में वो ज़मीर ढूँढ़ रही है सुना है शादी के लिए शौहर अमीर ढूँढ़ रही है बेरूखी से उजाड़ कर ज़िन्दगी दीवाने की वो हाथ में अपने वफ़ा की लकीर ढूँढ़ रही है रूहानी इश्क़ उस का मसला ही नहीं है वो सोने की मिट्टी वाला शरीर ढूँढ़ रही है मोहब्बत का फिर एक कफ़स तैयार किया है उस ने अब एक राजकुमार उस में करने को असीर ढूँढ़ रही है ये दौलत, ये सल्तनत, ये तख़्तोताज मेरा मुद्दा नहीं मेरी तो शा'इरी है जो मेरे अंदर फ़कीर ढूँढ़ रही है
Mayank Agarwal
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नज़्म: दिसंबर में पिछले बरस मुझे कुछ हो गया था दिसंबर में मेरा कोई अपना था जो खो गया था दिसंबर में होश आया था अस्पताल के बिस्तर पे कुछ पी कर जब मैं सो गया था दिसंबर में ठंडी रातें, अकेला चाँद और एक याद दिसंबर में मुझे करती रहती है ये सब बर्बाद दिसंबर में ग्यारह महीने कट जाते हैं जैसे तैसे लंबी होती है हर एक रात दिसंबर में मेरा ख़ुदा भी शायद सो जाता है सुनी नहीं जाती कोई फरियाद दिसंबर में जाड़ों की रात और सर्दी न लगे माने तुम न आओ मुझे याद दिसंबर में इन सबके बा'द भी मोहब्बत है इसी से उन की आई थी बारात दिसंबर में
Mayank Agarwal
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"अपनो के बिन बिताये बुरे दिन" ये चाँद ये तारे, ये ओझल थे सारे थी तन्हाई, था मातम कुछ आँसू हमारे एक अलग सी दुनिया जो थी बे-रंग दूर था घर सब दूर हमारे वो दिन वो रात कुछ फर्क नहीं था सजाए थी सब बस नरक नहीं था थी उम्मीद, था हौसला, और चंद ख़्वाब के सहारे तैर कर पार कर दिए दरिया वो सारे वो ता'ने, वो बातें वो छोटी सी नौकरी वो नंन्हे से कांधो पर ख़्वाहिश की टोकरी वो सड़क, वो नदी और नदिया के किनारे वो जुगनू जो सुनते थे दुखड़े हमारे वो दर्द, भुखार और ज़रूरत मेरी वो हर तरफ़ दिखना सूरत तेरी थी ग़लती और मजबूरी साथ हमारे काट ही दिए बुरे दिन भी सारे ये चाँद ये तारे, ये ओझल थे सारे थी तन्हाई, था मातम कुछ आँसू हमारे
Mayank Agarwal
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