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रौशनी पर धुँद की तह आइने के नक़्श फीके शीशे के उस पार इबहाम-ए-मुजर्रद खिड़कियों पर आँसुओं की बाढ़ मूरतें हों सूरतों से जैसे आरी पिघले चेहरों से थी हर तस्वीर भारी और सुकूत बोझ हो गोया बसारत पर नमी खिड़की खुलते ही मगर बाँहें फैला कर हवा ने बढ़ के आँखें चूम लीं आइनों के आँसू पोंछे रंग धोए शीशे की तर-दामनी का क़तरा क़तरा खींच डाला खिड़की खुलते ही वो सारी धुँद जैसे रक़्स करती बादलों की ओर लपकी मुज़्महिल चादर नज़र की हटते हटते हट गई रौशनी फिर मंज़रों से पट गई

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उस का चेहरा सिंपल सादा सा भोला चेहरा है यार क़सम से वो प्यारा चेहरा है पेड़ नदी ये फूल सभी छोड़ो उस को देखो उस का चेहरा है दुनिया लाख हसीन हो सकती है लेकिन उस का चेहरा चेहरा है देख उसे कह डाला हम ने भी बातें प्यारी हैं प्यारा चेहरा है इक तिल होट पे, गाल के नीचे इक और वो चाँद सा नाक पे नूर लिए दो प्यारी आँखें, और सुर्ख़ से लब प्यार मिलाकर अपना रंगों में हम ने बनाया उस का चेहरा है भोली सूरत पे वो अकड़ देखो ग़लती कर के घुमाया चेहरा है रूठ गई जो हम सेे कभी वो दोस्त सब सेे पहले चुराया चेहरा है जब भी उस को चूमने आए हम होट से पहले आया चेहरा है मुँह से इक वो स्वाद नहीं जाता जबसे उस का चूमा चेहरा है रात का होना उस की आँखें हैं दिन का निकलना उस का चेहरा है दुनिया में है उस के चेहरे से है नूर रौशनी लाया उस का चेहरा है हम जैसे भी दरिया करेंगे पार ! अब जो सहारा उस का चेहरा है हम आबाद रहेंगे ऐसे ही हम पे गर साया वो चेहरा है वो चेहरा है बस वो चेहरा है हम को बस वो चेहरा चेहरा है हम ने चाहा बस वो चेहरा है हम ने माँगा बस वो चेहरा है हम ने देखा भी तो वो चेहरा हम ने सोचा बस वो चेहरा है

BR SUDHAKAR

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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती

Tehzeeb Hafi

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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए

Abrar Kashif

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"मकान" कहीं दूर मकाँ बनाऊँगा अपना.. जहाँ ना ये मतलबी लोग हो ना फ़रेबी चेहरे हो जहाँ बस कुछ रिश्ते हो जो सच में अच्छे हो जहाँ चाहे चार दोस्त हो मेरे पर मन के सच्चे हो इस जलन, धोखे, दुख दर्द से भरी और जेहनी तौर पर बीमार दुनिया से पीछा छुड़ाऊँगा अपना कहीं दूर मकाँ बनाऊँगा अपना जहाँ उम्मीद थपकियाँ दे जहाँ सुकून हो राहत हो जहाँ मदद की रौशनी हो हमदर्दी हो...चाहत हो हौसला सुब्ह आवाज़ लगा कर जगाए मेरे ख्वाहिशों के काफिले दिन भर हँसे खिलखिलाए.. जहाँ सहारा बन जाना सबाब का काम हो जहाँ मरहम हो जाना नेकी का काम हो जहाँ खैरात करते हो लोग बेगरज हो कर जहाँ साफ हो दिल और सच्चे जज़्बात हो फिर सब हसरतों के चराग़ों से वो घर सजाऊँगा अपना कहीं दूर मकान बनाऊँगा अपना

Abhishek Bajpei

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"अजनबी शाम" धुँद छाई हुई है झीलों पर उड़ रहे हैं परिंद टीलों पर सब का रुख़ है नशेमनों की तरफ़ बस्तियों की तरफ़ बनों की तरफ़ अपने गल्लों को ले के चरवाहे सरहदी बस्तियों में जा पहुँचे दिल-ए-नाकाम मैं कहाँ जाऊँ अजनबी शाम मैं कहाँ जाऊँ

Jaun Elia

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लिबास जल कर मिरे बदन पर चिपक गया है बदन मुसलसल सुलग रहा है कहीं कहीं भूले भटके शो'ले उठा के लौ सर की अब भी बाहर को झूलते हैं जिन्हें मैं अपनी जली हथेली की पुश्त से ख़ुद दबा रहा हूँ अलाव से बाहर आ के दहशत-ज़दा निगाहों से देखता हूँ कहीं से अब ऐम्बुलेंस आएगी मेरी जानिब कोई मसीहा-नफ़स सँभालेगा आगे बढ़ कर मगर यहाँ तो कोई मसीहा-नफ़स नहीं है मैं चीख़ता हूँ कोई तो होगा कोई तो बे-इख़्तियार मेरी तरफ़ भी आए बदन से चिमटी क़बा को ख़ुद ही बची खुची उँगलियों की पोरों स छू के महसूस कर रहा हूँ कि जिस्म है या जला हुआ पैरहन है मेरा जो मेरी मिट्टी में धँस रहा है अज़िय्यतों की गवाही देता है ख़लिया ख़लिया जकड़ चुका हूँ मैं इस की परतों में चाहता हूँ कि खींच डालूँ उतार फेंकूँ इसे मगर अब इसे उतारूँ तो खाल मेरी ही खींच लेगा और इन सुलगती बची खुची उँगलियों की पोरों से नाख़ुनों से कुरेदना भी नहीं है बस में जो पैरहन था वो पैरहन अब मिरा क़फ़स है जो पैरहन था वो पैरहन अब मिरा बदन है

Faisal Azeem

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सख़्त सफ़्फ़ाक ख़ुद में सिमट कर चटख़ती हुई बर्फ़ और मुंजमिद जिस्म-ओ-जाँ रात जज़्बों की क़ब्रों पे कत्बे के मानिंद अटकी हुई हाथ खुर्चे हुए साँस उखड़ी हुई लफ़्ज़ गोया समाअ'त के पर्दे से टकरा के चिपके हुए बर्फ़ पर चार-ओ-नाचार पैरों की जमती हुई उँगलियाँ हड्डियों की दराड़ों में घुसती हवा ख़ून तक राह पाने की कोशिश में टूटी फ़सीलों पे यलग़ार करती हुई दिल बक़ा के लिए ख़ुद से लड़ता हुआ ख़ून पीता हुआ और उगलता हुआ कैसा बोहरान है दम निकलता नहीं सर्द मौसम किसी तौर टलता नहीं जिस क़दर हो सके गिरते पेड़ों की शाख़ें जलाते रहो आग बुझने न दो

Faisal Azeem

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एक दीवार और उस पर वो मिरे नक़्श-ओ-निगार मेरी दीवार पे दावा सो ये दावा कैसा एक दीवार पे दीवार के रंगों पे कहाँ ख़त्म ये बात एक पिचकारी की हैं मार ये सब नक़्श-ओ-निगार जाओ जाने दो इसे और खुरच ले जाए नक़्श क्या है मिरे हाथों का तहर्रुक है बस रंग क्या हैं मिरे हाथों में दबी पिचकारी शहर क्या है मिरी आँखों में बसी दीवारें रंग मेरे हैं लकीरें हैं मिरी मेरे क़लम रंग दूँगा मैं ज़रा देर में ये शहर तमाम नक़्श कर दूँगा निगाहों पे ये रंगों का फ़ुसूँ और रौज़न नज़र आएँगी सभी दीवारें एक दीवार पे दा'वा सो ये दा'वा कैसा

Faisal Azeem

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माह-ए-कामिल हैरत की तस्वीर हो जैसे हद्द-ए-चाह-ए-नख़शब आलमगीर हो जैसे होली के रंगों का धोका चेहरों पर तहरीर हो जैसे भीगी रात में आब-ए-शर-अंगेज़ के मारे मस्त सितारे अपनी चालें चूक रहे हैं दहलीज़ों पर पिघली शमएँ नीले बादल के पर्दे में ओझल होते आँख के तारे ढूँड रही हैं आईनों से नालाँ नक़्श से आरी चेहरे जज़्बों के उक़्दों में उलझे मूर्तियों की माला जपते कान में हल्क़े डाले गेरवे बादल पहने नाच रहे हैं लाल तिलक में आँख उगाए शमएँ था में चोब उठाए यक-रंगी दस्तारें जुब्बे गुम्बद ओढ़े सदियों की दीवार पे रोते रक़्स-ए-वहशत का ज़हराब उंडेल रहे हैं ना-बीनाई के पैग़म्बर रंग रचाती मौत की बोली बोल रहे हैं चीख़ रहे हैं इन के पैराहन को देखो चेहरे देखो आँखें देखो देखो सब हाथों को देखो जिस पर रंग नज़र आ जाए जान से जाए लेकिन इन को कौन बताए सब के हाथ रंगे हैं सब के दामन तर हैं आँखें ख़ूनीं हैं चेहरों पर ख़ौफ़ लिखा है लेकिन बे-नूरी में सब तहरीरें आँखों से ओझल हैं राह-ए-अदम पर नक़्श क़दम के ढूँडने वाला सायों की बोहतात में सहमा दहशत की हर ताल पे रक़्साँ सोच रहा है वक़्त के पैरों को दलदल से कौन निकाले शब की ओट से जलता सूरज अपने सर पर कौन उठाए रंगों की बौछार में जाने किस चेहरे पर किस को रंग नज़र आ जाए देव का साया अगले पल किस को खा जाए क्या मा'लूम कि अपनी बारी कब आ जाए

Faisal Azeem

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पीने वाले दहन लब-ए-दरिया प्यास बुझने के मंज़रों का फ़िशार सुर्ख़ होंटों से वो टपकता लहू पपड़ियाँ जा-ब-जा चटख़ती हैं ख़ुश्क होंटों में गड़े जाते हैं ख़ार और इधर होंट जो नमी से दो-चार

Faisal Azeem

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