nazmKuch Alfaaz

सख़्त सफ़्फ़ाक ख़ुद में सिमट कर चटख़ती हुई बर्फ़ और मुंजमिद जिस्म-ओ-जाँ रात जज़्बों की क़ब्रों पे कत्बे के मानिंद अटकी हुई हाथ खुर्चे हुए साँस उखड़ी हुई लफ़्ज़ गोया समाअ'त के पर्दे से टकरा के चिपके हुए बर्फ़ पर चार-ओ-नाचार पैरों की जमती हुई उँगलियाँ हड्डियों की दराड़ों में घुसती हवा ख़ून तक राह पाने की कोशिश में टूटी फ़सीलों पे यलग़ार करती हुई दिल बक़ा के लिए ख़ुद से लड़ता हुआ ख़ून पीता हुआ और उगलता हुआ कैसा बोहरान है दम निकलता नहीं सर्द मौसम किसी तौर टलता नहीं जिस क़दर हो सके गिरते पेड़ों की शाख़ें जलाते रहो आग बुझने न दो

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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लिबास जल कर मिरे बदन पर चिपक गया है बदन मुसलसल सुलग रहा है कहीं कहीं भूले भटके शो'ले उठा के लौ सर की अब भी बाहर को झूलते हैं जिन्हें मैं अपनी जली हथेली की पुश्त से ख़ुद दबा रहा हूँ अलाव से बाहर आ के दहशत-ज़दा निगाहों से देखता हूँ कहीं से अब ऐम्बुलेंस आएगी मेरी जानिब कोई मसीहा-नफ़स सँभालेगा आगे बढ़ कर मगर यहाँ तो कोई मसीहा-नफ़स नहीं है मैं चीख़ता हूँ कोई तो होगा कोई तो बे-इख़्तियार मेरी तरफ़ भी आए बदन से चिमटी क़बा को ख़ुद ही बची खुची उँगलियों की पोरों स छू के महसूस कर रहा हूँ कि जिस्म है या जला हुआ पैरहन है मेरा जो मेरी मिट्टी में धँस रहा है अज़िय्यतों की गवाही देता है ख़लिया ख़लिया जकड़ चुका हूँ मैं इस की परतों में चाहता हूँ कि खींच डालूँ उतार फेंकूँ इसे मगर अब इसे उतारूँ तो खाल मेरी ही खींच लेगा और इन सुलगती बची खुची उँगलियों की पोरों से नाख़ुनों से कुरेदना भी नहीं है बस में जो पैरहन था वो पैरहन अब मिरा क़फ़स है जो पैरहन था वो पैरहन अब मिरा बदन है

Faisal Azeem

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पीने वाले दहन लब-ए-दरिया प्यास बुझने के मंज़रों का फ़िशार सुर्ख़ होंटों से वो टपकता लहू पपड़ियाँ जा-ब-जा चटख़ती हैं ख़ुश्क होंटों में गड़े जाते हैं ख़ार और इधर होंट जो नमी से दो-चार

Faisal Azeem

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रौशनी पर धुँद की तह आइने के नक़्श फीके शीशे के उस पार इबहाम-ए-मुजर्रद खिड़कियों पर आँसुओं की बाढ़ मूरतें हों सूरतों से जैसे आरी पिघले चेहरों से थी हर तस्वीर भारी और सुकूत बोझ हो गोया बसारत पर नमी खिड़की खुलते ही मगर बाँहें फैला कर हवा ने बढ़ के आँखें चूम लीं आइनों के आँसू पोंछे रंग धोए शीशे की तर-दामनी का क़तरा क़तरा खींच डाला खिड़की खुलते ही वो सारी धुँद जैसे रक़्स करती बादलों की ओर लपकी मुज़्महिल चादर नज़र की हटते हटते हट गई रौशनी फिर मंज़रों से पट गई

Faisal Azeem

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क्या पहनने को उस परी के पास एक भी ढंग का नहीं है लिबास जब भी मुझ से वो मिलने आती है सोगवार मातमी रंग ओढ़े आती है

Faisal Azeem

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ख़ुशी अदम के किसी झरोके की ओट से झाँकती नज़र का फ़रेब कोई तवील बे-रहम रास्तों पर सराब कोई तमाम शब जुगनुओं को चुनने का ख़्वाब कोई ख़ुशी वो रह रह के चंद लम्हों को साँस लेता हबाब कोई उदास तारों को छेड़ती उँगलियों के ज़ख़्मों स उठते सर के ख़याल में गुम रबाब कोई ख़ुशी कि मीज़ान के जज़ीरों से दूर इक बे-निशान साहिल ज़माने भर की ख़लीज हाइल उभरती मौजों में ग़र्क़ होने की दास्तानों की झिलमिलाहट जो छूना चाहो तो दस्तरस में कोई जज़ीरा न कोई साहिल ये ख़ाक और आब का तवाज़ुन ये बंद मुट्ठी से ज़र्रा ज़र्रा फिसलती मिट्टी नज़र में कोलाज़ इक मुजर्रद इधर गुमाँ की मुंडेर पर कुछ निशान अन्क़ा के बैठने का फ़रेब जैसे तू उस किनारे तराज़ू था में मुजस्स में की सफ़ेद आँखों पे मा'नविय्यत की काली पट्टी वही सियाही अँधेरे का है जो पेश-ख़ेमा वो संग आँखें कि जिन में पुतली कभी नहीं थी वो जिन की तह में किसी किरन का गुज़र नहीं है ख़ुशी है क्या मुंसिफ़ी है क्या कुछ ख़बर नहीं है

Faisal Azeem

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