ख़ुशी अदम के किसी झरोके की ओट से झाँकती नज़र का फ़रेब कोई तवील बे-रहम रास्तों पर सराब कोई तमाम शब जुगनुओं को चुनने का ख़्वाब कोई ख़ुशी वो रह रह के चंद लम्हों को साँस लेता हबाब कोई उदास तारों को छेड़ती उँगलियों के ज़ख़्मों स उठते सर के ख़याल में गुम रबाब कोई ख़ुशी कि मीज़ान के जज़ीरों से दूर इक बे-निशान साहिल ज़माने भर की ख़लीज हाइल उभरती मौजों में ग़र्क़ होने की दास्तानों की झिलमिलाहट जो छूना चाहो तो दस्तरस में कोई जज़ीरा न कोई साहिल ये ख़ाक और आब का तवाज़ुन ये बंद मुट्ठी से ज़र्रा ज़र्रा फिसलती मिट्टी नज़र में कोलाज़ इक मुजर्रद इधर गुमाँ की मुंडेर पर कुछ निशान अन्क़ा के बैठने का फ़रेब जैसे तू उस किनारे तराज़ू था में मुजस्स में की सफ़ेद आँखों पे मा'नविय्यत की काली पट्टी वही सियाही अँधेरे का है जो पेश-ख़ेमा वो संग आँखें कि जिन में पुतली कभी नहीं थी वो जिन की तह में किसी किरन का गुज़र नहीं है ख़ुशी है क्या मुंसिफ़ी है क्या कुछ ख़बर नहीं है
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"क्या लगती हो" मैं जब कोई नज़्म कहता हूँ तुम उस का उनवान लगती हो मुझ सेे मिरी बातें करती हो कौन हो तुम मेरी क्या लगती हो कितनी कम मुयस्सर हो तुम मुझ को फिर भी सारी की सारी लगती हो तुम्हें तितलियाँ तलाश करती हैं बारिशों में भीगा गुलाब लगती हो सितारे तुम्हारा तवाफ़ करते हैं फ़लक पर चमकता चाँद लगती हो आँखें ग़ज़ल हिरणी ज़ुल्फ़ घटा सावन पहाड़ी पर रक़्स करता बादल लगती हो हर एक बात वली सी करती हो जैसे किसी मज़ार की दुआ लगती हो ये हुस्न-ए-आतिश दहकता शबाब कितने ही कोह-ए-तूर जलाती हो तुम्हें ख़ामोशियाँ इस तरह पुकारती हैं जैसे गाँव में मग़रिब की अज़ान लगती हो अब क्या ज़ेहमत करें ये कहने में फ़लक से उतरा हुआ फरिश्ता लगती हो
ALI ZUHRI
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जब छुआ साथ तुलसी चौरा आँखों में साँसों को खींचे तुम सेे जो वा'दा किया कभी पड़िया जी के पीपल नीचे तुम ने चाहा था ख़ुश रहना ख़ुद ख़ुशी सदा मुझ से सीखे दुनिया भर के संकल्प सतत पूरे होते मुझ में दीखे ख़ुद से अनुबंध किया है अब मन को निर्बंध किया है अब गत-विगत मुक्त हो सकने का सम्पूर्ण प्रबन्ध किया है अब इस नए साल के पहले दिन तुम से बाहर सोचा तो है मन-प्राण सुमरनी छोड़ेंगे सुनते तो हैं होता तो है काफ़ी है।
Kumar Vishwas
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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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'हम लड़के हैं' आज आप को सब सच-सच बताते हैं हम किस लिए इतना मुस्कुराते हैं हम को रोना भी आए तो कहाँ रो पाते हैं कोई देख न ले रोता हुआ ये सोच कर डर जाते हैं दर्द सहते हैं और अपने आसुओं को पी जाते हैं हम वो हैं जिन्हें अपने अश्क बहाने से रोका जाता है जिन्हें अपना दर्द सुनाने से रोका जाता है हम वो हैं जो ख़ुद ही ख़ुद का मज़ाक़ बनाते हैं और फिर एक दूजे से सच छिपाते हैं हम सब कुछ कर सकते हैं मगर कभी खुल कर रो नहीं सकते हमारा दर्द हमारे सिवा इस दुनिया में कहाँ कोई समझ पाता है सुख में खुल के हँसते हैं और दुख में झूठ-मूठ का मुस्कुराना आता है हम लड़के हैं साहब हमें बचपन से बस यही सिखाया गया है लड़के रोते नहीं हैं ये बोल-बोल कर पत्थर दिल बनाया गया है अपने मन की करने वाला इस समाज की नज़र में हर लड़का बुरा है अपने आसुओं को पी जाओ दोस्तों हम लड़के हैं हमें रोना मना है
ABhishek Parashar
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लिबास जल कर मिरे बदन पर चिपक गया है बदन मुसलसल सुलग रहा है कहीं कहीं भूले भटके शो'ले उठा के लौ सर की अब भी बाहर को झूलते हैं जिन्हें मैं अपनी जली हथेली की पुश्त से ख़ुद दबा रहा हूँ अलाव से बाहर आ के दहशत-ज़दा निगाहों से देखता हूँ कहीं से अब ऐम्बुलेंस आएगी मेरी जानिब कोई मसीहा-नफ़स सँभालेगा आगे बढ़ कर मगर यहाँ तो कोई मसीहा-नफ़स नहीं है मैं चीख़ता हूँ कोई तो होगा कोई तो बे-इख़्तियार मेरी तरफ़ भी आए बदन से चिमटी क़बा को ख़ुद ही बची खुची उँगलियों की पोरों स छू के महसूस कर रहा हूँ कि जिस्म है या जला हुआ पैरहन है मेरा जो मेरी मिट्टी में धँस रहा है अज़िय्यतों की गवाही देता है ख़लिया ख़लिया जकड़ चुका हूँ मैं इस की परतों में चाहता हूँ कि खींच डालूँ उतार फेंकूँ इसे मगर अब इसे उतारूँ तो खाल मेरी ही खींच लेगा और इन सुलगती बची खुची उँगलियों की पोरों से नाख़ुनों से कुरेदना भी नहीं है बस में जो पैरहन था वो पैरहन अब मिरा क़फ़स है जो पैरहन था वो पैरहन अब मिरा बदन है
Faisal Azeem
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सख़्त सफ़्फ़ाक ख़ुद में सिमट कर चटख़ती हुई बर्फ़ और मुंजमिद जिस्म-ओ-जाँ रात जज़्बों की क़ब्रों पे कत्बे के मानिंद अटकी हुई हाथ खुर्चे हुए साँस उखड़ी हुई लफ़्ज़ गोया समाअ'त के पर्दे से टकरा के चिपके हुए बर्फ़ पर चार-ओ-नाचार पैरों की जमती हुई उँगलियाँ हड्डियों की दराड़ों में घुसती हवा ख़ून तक राह पाने की कोशिश में टूटी फ़सीलों पे यलग़ार करती हुई दिल बक़ा के लिए ख़ुद से लड़ता हुआ ख़ून पीता हुआ और उगलता हुआ कैसा बोहरान है दम निकलता नहीं सर्द मौसम किसी तौर टलता नहीं जिस क़दर हो सके गिरते पेड़ों की शाख़ें जलाते रहो आग बुझने न दो
Faisal Azeem
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एक दीवार और उस पर वो मिरे नक़्श-ओ-निगार मेरी दीवार पे दावा सो ये दावा कैसा एक दीवार पे दीवार के रंगों पे कहाँ ख़त्म ये बात एक पिचकारी की हैं मार ये सब नक़्श-ओ-निगार जाओ जाने दो इसे और खुरच ले जाए नक़्श क्या है मिरे हाथों का तहर्रुक है बस रंग क्या हैं मिरे हाथों में दबी पिचकारी शहर क्या है मिरी आँखों में बसी दीवारें रंग मेरे हैं लकीरें हैं मिरी मेरे क़लम रंग दूँगा मैं ज़रा देर में ये शहर तमाम नक़्श कर दूँगा निगाहों पे ये रंगों का फ़ुसूँ और रौज़न नज़र आएँगी सभी दीवारें एक दीवार पे दा'वा सो ये दा'वा कैसा
Faisal Azeem
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रौशनी पर धुँद की तह आइने के नक़्श फीके शीशे के उस पार इबहाम-ए-मुजर्रद खिड़कियों पर आँसुओं की बाढ़ मूरतें हों सूरतों से जैसे आरी पिघले चेहरों से थी हर तस्वीर भारी और सुकूत बोझ हो गोया बसारत पर नमी खिड़की खुलते ही मगर बाँहें फैला कर हवा ने बढ़ के आँखें चूम लीं आइनों के आँसू पोंछे रंग धोए शीशे की तर-दामनी का क़तरा क़तरा खींच डाला खिड़की खुलते ही वो सारी धुँद जैसे रक़्स करती बादलों की ओर लपकी मुज़्महिल चादर नज़र की हटते हटते हट गई रौशनी फिर मंज़रों से पट गई
Faisal Azeem
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पानी अच्छा ख़ासा गले तक आ पहुँचा था अच्छी ख़ासी डूब गई थी सारी बस्ती अच्छा ख़ासा इक सैलाब था पानी उतरा भीगे जिस्म पे चिपके कपड़ों और ख़ाशाक का मंज़र उभरा पानी क्या उतरा तन्हाई उभर आई है वो जो नहीं था वो भी जैसे सैल-ए-रवाँ के साथ गया हो गलियों में बे-जान बदन हैं या सन्नाटा तैर रहा है
Faisal Azeem
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