nazmKuch Alfaaz

बहार की ये दिल-आवेज़ शाम जिस की तरफ़ क़दम उठाए हैं मैं ने कि उस से हाथ मिलाऊँ और इक शगुफ़्ता शनासाई की बिना रक्खूँ फिर अपनी ख़ाना-बदोशी की मुश्तरक लय पर उसे गुलाब-ब-कफ़ ख़ेमा-ए-जुनूँ तक लाऊँ कुछ उस की ख़ैर ख़बर पूछूँ और कुछ अपनी कहूँ कहूँ कि कितने ही पतझड़ के मौसम आए गए मगर इन आँखों की सहर-उल-बयानियाँ न गईं कहूँ कि गरचे अनासिर ने तोहमतें बाँधीं जुनूँ ज़दों की मगर सख़्त-जानियाँ न गईं कहूँ कि एक हैं अंदेशे सब मिरे तेरे कहूँ अलग नहीं जीने के ढब मिरे तेरे कहूँ कि एक से हैं रोज़-ओ-शब मिरे तेरे कहूँ कि मिलते हैं नाम-ओ-नसब मिरे तेरे कहूँ अज़ल से जुनूँ कारोबार अपना है हज़ार जब्र हो कुछ इख़्तियार अपना है

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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पहले रातें इतनी लंबी कब होती थीं जो भी हिसाब और खेल हुआ करता था सब मौसम का था रोज़-ओ-शब की हर साअ'त का इक जैसा पैमाना था अपने मिलने वाले सारे झूटे सच्चे यारों से इक मुस्तहकम याराना था लेकिन अपने दर्द की सम्तों की पहचान न रखने वाले दिल ये सोचना था हर ख़्वाब की क़ीमत होती है और अब इन दो आँखों में इतने तरह तरह के दुनिया भर के ख़्वाब भरे हैं इन में से इक इक को गिन कर सब के मुनासिब दाम चुकाना इस के लिए तो दो सदियाँ भी कम होंगी कंगले इतनी नक़दी कहाँ से आएगी

Wali Alam Shaheen

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गुम हुए यूँँ कि कभी मेरे शनासा ही न थे कुछ लिखा होता तुम्हें मुझ से शिकायत क्या है ख़बर कब आए हो कैसे सुनाओ प्यारे क्या ख़बर लाए हो यारों की हिकायत क्या है उस ने ये कुछ न कहा और कहा तो इतना खेल दिल-चस्प है नज़्ज़ारे करो और फिर एक ख़ला एक गिराँ-बार ख़मोशी की अज़िय्यत ले कर मैं ये कहता हुआ उठ आया कि हाँ खेल है दिलचस्प बहुत

Wali Alam Shaheen

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खेत प्यासे हैं फ़ज़ा हाँफती है जा-ब-जा उखड़ी जड़ें चाटती इक गाए के सूखे हुए मटियाले खुरों की मानिंद फट गई है जो ज़मीं उस में उगी झाड़ियाँ बे-बर्ग-ओ-समर रहती हैं मौसम हो कोई किसी फ़ालिज-ज़दा बीमार के अकड़े हुए पंजे की तरह टहनियाँ सोए फ़लक देखती फ़रियाद-कुनाँ हैं कब से महज़ फ़रियाद से ऐ दोस्त मगर क्या होगा जोड़ता रहता है मौसम की विरासत से दिलों को जो किसी मेज़-नुमा शय ये कई दिन से पड़ा चाए-ख़ाने का फटा सा अख़बार इक नज़र आओ इसे देख तो लें हाल ऐसा है कि अब जो भी हो अच्छा होगा

Wali Alam Shaheen

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मूँद कर आँखें बड़े ही ध्यान से मैं ने पीछे की तरफ़ हौज़ के पानी में सिक्के फेंकते ही इक ज़रा सी छेड़ की अपने दिल-ए-ख़ुश-फ़हम से ऐ बावले अब तो हो जाएगी पूरी ख़ैर से तेरी मुराद सह-पहर की धूप में हौज़ के झरने में सिक्के सात रंगों में चमकते यूँँ दिखाई दे रहे थे जैसे हम आवाज़ हो कर सब उड़ाते हों मिरे दिल का मज़ाक़ जैसे आपस में ही कर रक्खा हो बरपा मेरी नम-ख़ुर्दा हथेली के सितारों ने फ़साद

Wali Alam Shaheen

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मिट्टी की दीवार पे इक खूँटी से लटकी मेरी यादों की ज़म्बील जिस में छुपे थे रंग-बिरंगे कपड़ों के बोसीदा कतरन गोल गोल सी नन्ही मुन्नी कर धनियों के दाने इक अमरूद की डाली काट के बाबा ने जो बनाई थी वो टेढ़ी-मेढ़ी एक ग़ुलैल नीले पीले मटियाले और लाल परों की ढेरी चौड़े मुँह का इक मुँह ज़ोर सा काठ का अड़ियल घोड़ा अपनी अकड़ में खाता हुआ बग्घी वाले का कोड़ा इतनी मुद्दत बा'द जो खोली मैं ने वो ज़म्बील इक नन्हा इस में से निकल कर जैसे सरपट भागा देखता था पीछा ही वो अपना और न अपना आगा और उलझता जाता जितना खुलता लिपटा धागा जैसे भयानक सपने देखे कई दिनों का जागा अब के फिर वो नज़र आया तो सरगोशी में पूछूँगा तुम तो मेरे यार थे फिर क्यूँँ सालों साल नहीं मिलने को अपने शुऊ'र की हैरानी का बोझ उठाए जाने कितनी कठिन राहों से गुज़रते हो जग वालों पर हँसते हो या छुप छुप आहें भरते हो बस्ती छोड़ के जंगल जंगल रैन बसेरा करते हो या फिर इक पाताल की निचली तह में उतर जा मरते हो शायद तुम भी गौतम हो और अपने आप से डरते हो

Wali Alam Shaheen

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