गुम्बद-नुमा शफ़्फ़ाफ़ शीशा मोहद्दब बीच से उभरा हुआ गुम्बद-नुमा शफ़्फ़ाफ़ शीशा जिस में से चीज़ें बड़ी मालूम होती हैं ये देखो एक च्यूँँटी हश्त-पा मकड़े की सूरत चल रही है ओस का क़तरा मुसफ़्फ़ा हौज़ के मानिंद साकिन लग रहा है रेत का ज़र्रा पहाड़ी की तरह अफ़्लाक को छूता हुआ महसूस होता है घने पानी में जरसू में की जुम्बिश पर गुमाँ होता है जैसे शे'र ने अँगड़ाई ली हो! हाल-ए-ख़ुर्द ओ कलाँ में उम्र भर छोटा बड़ा करने के चक्कर में बंधी रहती हैं नज़रें एक क़ुब्बा-दार मंज़र में अज़ल से जानती हैं बुलबुला सी पुतलियों की सर्द मेहराबें जब इस गुम्बद-नुमा शफ़्फ़ाफ़ शीशे से गुज़र कर एक मरकज़ पर शुआएँ जम्अ' होंगी सामने जो चीज़ होगी जल उठेगी!!
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"महबूब की एक झलक" रूह में उतर गई शक्ल उस की जब नज़र उठाई तरफ़ उस की रेशमी लिबास में ज़ीनत थी वो दूध की तरह थी कमर उस की कान पर झूलती उस की बाली चूमती जाती थी गर्दन उस की तन से लिपटी ख़म भरी साड़ी दिखाती थी सुंदर कटि उस की आँखों की बनावट बादाम जैसी पूरे शबाब पर थी नज़र उस की गोरे रंग के बीच गले का ख़म कह रहा था चू में नर्मी उस की ज़िस्म की गढ़न थी यूँँ ढली मूरत आरज़ू हो कोई संग-तराश उस की हाथ थे बुतों की तरह तराशे हुए मक्खन जैसी फिसलन उस की बालों की लंबी लटकन छूती जाती कमर उस की पैरों ने पाई थी सीधी गठन केले के पेड़ सी उपमा उस की खिंचता हुआ उठा सीना था कसी हुई थी कमान उस की खिलते लब भरे-भरे से थे शहद से भरी पंखुड़ी उस की फूल की तरह का परी-चेहरा उजले रंग में सूरत उस की और क्या मिसाल दें हम 'अर्जुन' आफ़ताब जैसी झलक उस की
arjun chamoli
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"मोहब्बत क्या है" ये काली आँखें ये काले बाल ये सुर्ख़ लाल लब और ये गेहुँआ रंग तुझ में कुछ ऐसे ये जँचता है जैसे बरसात के बा'द सूरज लगता है जैसे ख़ुदा की मेहर सी जैसे किसी दुश्मन के क़हर सी जैसे सर्द मौसम में सुब्ह की सहर सी जैसे दिवाली की रात हो जैसे मेहँदी वाले हाथ हो जैसे चाँदनी रात हो जैसे तुझ संग नदी किनारे बैठे हो लगता है जैसे मैं धरा हूँ और मुझ में मीलों बहुत दूर तक बेझिझक सी बे-धड़क सी मौसम की बदमाशियों से बेपरवाह सी मुझ में रहती एक नहर सी हो मैं तुझ को देखता रहता हूँ अकेले भी संग तुझे पाता हूँ वक़्त बे-वक़्त तुझ सेे कहता रहता हूँ बदन के नक़्शे पर क़सीदे पढ़ता रहता हूँ फूल ख़ुशबू माँगता है तुझ सेे पानी ने चमकना सीखा है तुझ सेे लगता है ये श्रृष्टि बस तुझ सेे ही है तुझ सेे बस इतना कह पाता हूँ सब लगता तुझ सा ही है धरा और अंबर के बीच जितनी जगह है बस एक चीज़ है जस की तस है वो मोहब्बत जो तुझ सेे होती है मोहब्बत जो तुझ सेे शुरू तुझ पर ही ख़त्म
Ajay Kishor
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“पुरुष की कल्पनाएँ" दफ़्तर से लौट कर थका हुआ पलँग पर बेहोश सा लेटा हुआ एक पुरुष अपने मन में कैसी कल्पना करता है वो कल्पना करता है उस दिन की जब वो सभी सामाजिक बंधनों से मुक्त किसी नदी या झील के किनारे बैठा होगा जब वो सुन सकेगा सुब्ह के पंछियों की आवाज़ें जब वो देख सकेगा ढलता हुआ सूर्य जब वो भी गिन सकेगा आसमान के तारे जब वो महसूस कर सकेगा अपने आस-पास के वातावरण में मौजूद शांति सभी प्रकार की चिंताओं से परे जब वो सुन सकेगा हृदय की बातें जब वो बातें कर सकेगा ख़ुद से जब नहीं खलेगी उसे ये बेपरवाही और भाने लगेगा अकेलापन इस अकेलेपन में वो सुन रहा होगा कोई मधुर संगीत जिस की धुन में उस के पैर थिरकने के लिए उत्साहित हो रहे होंगे किंतु इसी बीच अरनिमा अपने कोमल हाथों से उस के पलकों को स्पर्श करती है और उसे खींच लाती है काल्पनिक लोक से बाहर वो उठता है और अपनी काल्पनिकता को अपने थैले में भरकर फिर से दफ़्तर के रास्ते चल पड़ता है उस की आत्मा से महज़ एक आवाज़ आती है आदमी की कल्पनाएँ क्षणभंगुर होती हैं।
AYUSH SONI
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इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना इक नार पे जान को हार गया मशहूर है उस का अफ़साना उस नार में ऐसा रूप न था जिस रूप से दिन की धूप दबे इस शहर में क्या क्या गोरी है महताब-रुख़े गुलनार-लबे कुछ बात थी उस की बातों में कुछ भेद थे उस की चितवन में वही भेद कि जोत जगाते हैं किसी चाहने वाले के मन में उसे अपना बनाने की धुन में हुआ आप ही आप से बेगाना इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना ना चंचल खेल जवानी के ना प्यार की अल्हड़ घातें थीं बस राह में उन का मिलना था या फ़ोन पे उन की बातें थीं इस इश्क़ पे हम भी हँसते थे बे-हासिल सा बे-हासिल था इक ज़ोर बिफरते सागर में ना कश्ती थी ना साहिल था जो बात थी इन के जी में थी जो भेद था यकसर अन-जाना इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना इक रोज़ मगर बरखा-रुत में वो भादों थी या सावन था दीवार पे बीच समुंदर के ये देखने वालों ने देखा मस्ताना हाथ में हाथ दिए ये एक कगर पर बैठे थे यूँँ शाम हुई फिर रात हुई जब सैलानी घर लौट गए क्या रात थी वो जी चाहता है उस रात पे लिक्खें अफ़साना इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना हाँ उम्र का साथ निभाने के थे अहद बहुत पैमान बहुत वो जिन पे भरोसा करने में कुछ सूद नहीं नुक़सान बहुत वो नार ये कह कर दूर हुई 'मजबूरी साजन मजबूरी' ये वहशत से रंजूर हुए और रंजूरी सी रंजूरी? उस रोज़ हमें मालूम हुआ उस शख़्स का मुश्किल समझाना इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना गो आग से छाती जलती थी गो आँख से दरिया बहता था हर एक से दुख नहीं कहता था चुप रहता था ग़म सहता था नादान हैं वो जो छेड़ते हैं इस आलम में नादानों को उस शख़्स से एक जवाब मिला सब अपनों को बेगानों को 'कुछ और कहो तो सुनता हूँ इस बाब में कुछ मत फ़रमाना' इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना अब आगे का तहक़ीक़ नहीं गो सुनने को हम सुनते थे उस नार की जो जो बातें थीं उस नार के जो जो क़िस्से थे इक शाम जो उस को बुलवाया कुछ समझाया बेचारे ने उस रात ये क़िस्सा पाक किया कुछ खा ही लिया दुखयारे ने क्या बात हुई किस तौर हुई अख़बार से लोगों ने जाना इस बस्ती के इक कूचे में इक इंशा नाम का दीवाना हर बात की खोज तो ठीक नहीं तुम हम को कहानी कहने दो उस नार का नाम मक़ाम है क्या इस बात पे पर्दा रहने दो हम से भी तो सौदा मुमकिन है तुम से भी जफ़ा हो सकती है ये अपना बयाँ हो सकता है ये अपनी कथा हो हो सकती है वो नार भी आख़िर पछताई किस काम का ऐसा पछताना? इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना
Ibn E Insha
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कैसी मख़्लूक़ थी आग में उस का घर था अलाव की हिद्दत में मव्वाज लहरों को अपने बदन की मलाहत में महसूस करती थी लेकिन वो अंदर से अपने ही पानी से डरती थी कितने ही उश्शाक़ अपनी जवानी में पानी में इक सानिया उस को छूने की ख़्वाहिश में नीचे उमुक़ में बहुत नीचे उतरे मगर फिर न उभरे समुंदर ने मंथन से उन के वजूदों को ज़म कर लिया दूधिया झाग ने और कोहना नमक ने उन्हें अपनी तेज़ाबियत में घुलाया भड़कती हुई आग ने जज़्र-ओ-मद में लपेटा उन्हें सर से पा तक जलाया मगर कोई शो'लों से कुंदन सा सीपों से मोती सा बाहर न आया वो अब भी समुंदर में इठलाती सत्हों के नीले बहाव में अपने अलाव में क़स्र-ए-ज़मुर्रद में तन्हा भटकती है इक बा-आह आब-ओ-आतिश में रंगों की बारिश में अब भी वो ज़ुल्फ़ें झटकती है तो ऊद-ओ-अम्बर की महकार आती है क़तरात उड़ कर दहन कितने घोंगों का भरते हैं उस की झलक देखने के लिए आज भी लोग मरते हैं अब भी यहाँ कश्तियों आब-दोज़ों जहाज़ों के अर्शों पे उस की ही बातें हैं दुनिया के सय्याह सातों समुंदर के मल्लाह उस के न होने पे होने पे तकरार करते हैं उस की कशिश में बहुत दूर के पानियों में सफ़र के लिए ख़ुद को तयार करते हैं मैं भी यहाँ मुज़्तरिब और बेहाल ख़स्ता-ओ-पारीना तख़्ते पे बहता हुआ एक ख़ुफ़्ता जज़ीरे के नज़दीक क्या देखता हूँ कि वो एक पत्थर पे बैठी है पानी पे तारी है इक कैफ़ सा चाँदनी की लपक और हवा की मधुर लय पे मछली सा नीचे का धड़ उस का शफ़्फ़ाफ़ पानी में हिलता है अबरेशमीं नूर में अक्स-ए-सीमाब सा उस के गलना चेहरे पे खिलता है अब देखिए मुझ सा मबहूत आशिक़ उसे अपनी आग़ोश में कैसे भरता है ग़र्क़ाब होता है मरता है
Rafiq Sandelvi
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अजीब मा-फ़ौक़ सिलसिला था शजर जड़ों के बग़ैर ही उग रहे थे ख़े में बग़ैर चोबों के और तनाबों के आसरे के ज़मीं पे इस्तादा हो रहे थे चराग़ लौ के बग़ैर ही जल रहे थे कूज़े बग़ैर मिट्टी के चाक पर ढल रहे थे दरिया बग़ैर पानी के बह रहे थे सभी दुआएँ गिरफ़्ता-पा थीं रुकी हुई चीज़ें क़ाफ़िला थीं पहाड़ बारिश के एक क़तरे से घुल रहे थे बग़ैर चाबी के क़ुफ़्ल अज़-ख़ुद ही खुल रहे थे निडर पियादा थे और बुज़दिल असील घोड़ों पे बैठ कर जंग लड़ रहे थे गुनाहगारों ने सर से पा तक बदन को बुर्राक़ चादरों से ढका हुआ था वली की नंगी कमर छुपाने को कोई कपड़ा नहीं बचा था अजीब मा-फ़ौक़ सिलसिला था
Rafiq Sandelvi
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तुम नहीं जानते इस धुँद का क़िस्सा क्या है धुँद जिस में कई ज़ंजीरें हैं एक ज़ंजीर किसी फूल किसी शब्द किसी ताइर की एक ज़ंजीर किसी रंग किसी बर्क़ किसी पानी की ज़ुल्फ़ ओ रुख़्सार लब ओ चश्म की पेशानी की तुम नहीं जानते इस धुँद का ज़ंजीरों से रिश्ता क्या है ये फ़ुसूँ-कार तमाशा क्या है! तुम ने बस धुँद के उस पार से तीरों के निशाने बाँधे और इधर मैं ने तुम्हारे लिए झंकार में दिल रख दिया कड़ियों में ज़माने बाँधे जाओ अब रोते रहो वक़्त के महबस में ख़ुद अपने ही गले से लग कर तुम मिरे सीना-ए-सद-रंग के हक़दार नहीं अब तुम्हारे मिरे माबैन किसी दीद का ना-दीद का असरार नहीं!!
Rafiq Sandelvi
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अजब पानी है अजब मल्लाह है सूराख़ से बे-फ़िक्र आसन मार के कश्ती के इक कोने में बैठा है अजब पानी है जो सूराख़ से दाख़िल नहीं होता कोई मौज-ए-नहुफ़्ता है जो पेंदे से किसी लकड़ी के तख़्ते की तरह चिपकी है कश्ती चल रही है सर-फिरी लहरों के झूले में अभी ओझल है जैसे डूबती अब डूबती है जैसे बत्न-ए-आब से जैसे तलातुम की सियाही से अभी निकली है जैसे रात-दिन बस एक ही आलम में कश्ती चल रही है क्या अजब कश्ती है जिस के दम से ये पानी रवाँ है और उस मल्लाह का दिल नग़्मा-ख़्वाँ है कितने टापू राह में आए मगर मल्लाह ख़ुश्की की तरफ़ खिंचता नहीं नज़ारा-ए-रक़्सन्दगी ख़्वाब में शामिल नहीं होता अजब पानी है जो सूराख़ से दाख़िल नहीं होता
Rafiq Sandelvi
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बीज अंदर है लेकिन मैं बाहर हूँ अपनी ज़मीं से फ़क़त मुश्त दो मुश्त ऊपर ख़ला में उगा हूँ मिरी कोई जड़ ही नहीं है नहीं इल्म तालीफ़ की रौशनी ने हवा और पानी ने किस तरह सींचा नमी कैसे मेरे मसामों में आई जुदाई सही मैं ने कैसे मुक़र्रर जो अज़लों से था बीच का फ़ासला वस्त ना वस्त का मरहला मैं ने कैसे गवारा किया आसमाँ के तले मैं ने धरती पे फैले हुए एक सोंधी सी ख़ुशबू में लिपटे हुए लहलहाते जहानों का ख़ुश्क और बंजर ज़मानों का कैसे नज़ारा किया चंद काँटों की सूई से कौनैन के अपने क़ुतबैन के पेच-ओ-ख़म में वजूद-ओ-अदम में जली और ख़फ़ी सारे अबआ'द की सम्त कैसे इशारा किया मैं ने कैसे ब-यक वक़्त अपनी फ़ना और बक़ा से किनारा किया बीज अंदर है कैसे समझ पाएगा बे-नुमू ओ नुमू-कार दुनिया में मुझ जैसे पौदे ने कैसे गुज़ारा किया
Rafiq Sandelvi
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