सिपाही आज भी कोई नहीं आया किसी ने फूल ही भेजे न बस्ती के घरों से आश्ना गीतों की आवाज़ें सुनाई दें न परचम कोई लहराया सिपाही! शाम होने आई और कोई नहीं आया फ़ना की ख़ंदक़ों को जान दे कर पार कर जाना बड़ी बात जहाँ जीने की ख़ातिर मर रहे हों लोग उस बस्ती में मर जाना बड़ी बात मगर पल भर को ये सोचा तो होता तुम्हारे बा'द घर की मुंतज़िर दहलीज़ को जागे हुए दिल की निशानी कौन देगा हवाओं से उलझती रौशनी को ए'तिबार-ए-कामरानी कौन देगा दर-ओ-दीवार से लिपटी हुई बेलों को पानी कौन देगा
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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शाख़-ए-ज़ैतून पर कम-सुख़न फ़ाख़्ताओं के इतने बसेरे उजाड़े गए और हवा चुप रही बे-कराँ आसमानों की पिहनाइयाँ बे-नशेमन शिकस्ता परों की तग-ओ-ताज़ पर बैन करती रहीं और हवा चुप रही ज़र्द परचम उड़ाता हुआ लश्कर-ए-बे-अमाँ गुल-ज़मीनों को पामाल करता रहा और हवा चुप रही आरज़ूमंद आँखें बशारत-तलब दिल दु'आओं को उट्ठे हुए हाथ सब बे-समर रह गए और हवा चुप रही और तब हब्स के क़हरमाँ मौसमों के अज़ाब इन ज़मीनों पे भेजे गए और मुनादी करा दी गई जब कभी रंग की ख़ुशबुओं की उड़ानों की आवाज़ की और ख़्वाबों की तौहीन की जाएगी ये अज़ाब इन ज़मीनों पे आते रहेंगे
Iftikhar Arif
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जौहरी को क्या मालूम किस तरह की मिट्टी में कैसे फूल होते हैं किस तरह के फूलों में कैसी बास होती है जौहरी को क्या मालूम जौहरी तो सारी उम्र पत्थरों में रहता है ज़र-गरों में रहता है जौहरी को क्या मालूम ये तो बस वही जाने जिस ने अपनी मिट्टी से अपना एक इक पैमाँ उस्तुवार रक्खा हो जिस ने हर्फ़-ए-पैमाँ का ए'तिबार रक्खा हो जौहरी को क्या मालूम किस तरह की मिट्टी में कैसे फूल होते हैं किस तरह के फूलों में कैसी बास होती है
Iftikhar Arif
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बचपन की गलियों में जिन जिन घरों के शीशे मेरी गेंद से टूटे थे उन सब की किर्चें कभी कभी मेरी आँखों में चुभने लगती हैं जलती दोपहरों में मेरे हाथों उजड़े हुए घोंसलों के बेहाल परिंदों की चीख़ें फ़रियादें मेरी बे-घर शामों में कोहराम मचाती रहती हैं चकनाचूर दिनों रेज़ा रेज़ा रातों में सोए हुए सब ख़्वाब जगाती रहती हैं अपने ख़ंजर अपने ही सीने में उतरने लगते हैं ज़िंदा चेहरे जलते बुझते लम्हों की आग़ोश में मरने लगते हैं
Iftikhar Arif
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मैं जिन को छोड़ आया था शनासाई की बस्ती के वो सारे रास्ते आवाज़ देते हैं नहीं मालूम अब किस वास्ते आवाज़ देते हैं लहू में ख़ाक उड़ती है बदन ख़्वाहिश-ब-ख़्वाहिश ढह रहा है और नफ़स की आमद-ओ-शुद दिल की ना-हमवारियों पर बैन करती है वो सारे ख़्वाब एक इक कर के रुख़्सत हो चुके हैं जिन से आँखें जागती थीं और उम्मीदों के रौज़न शहर-ए-आइंदा में खिलते थे बहुत आहिस्ता आहिस्ता अँधेरा दिल में, आँखों में, लहू में, बहते बहते जम गया है वक़्त जैसे थम गया है
Iftikhar Arif
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पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी उन्हें इस से ग़रज़ क्या पेँच पड़ते वक़्त किन हाथों में लर्ज़ा आ गया था और किस की खेंच अच्छी थी? हवा किस की तरफ़ थी, कौन सी पाली की बैरी थी? पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम? उन्हें तो बस बसंत आते ही अपनी अपनी डाँगेँ ले के मैदानों में आना है गली-कूचों में काँटी मारना है पतंगें लूटना है लूट के जौहर दिखाना है पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी?
Iftikhar Arif
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