nazmKuch Alfaaz

मैं तुझे फूल कहूँ और कहूँ भंवरो से आओ उस फूल का रस चूस के नाचो-झूमो मैं तुझे शम्अ'' कहूँ और कहूँ परवानो आओ उस शम्अ'' के होंटों को ख़ुशी से चूमो मैं तिरी आँख को तश्बीह दूँ मयख़ाने से और ख़ुद ज़हर-ए-जुदाई का तलबगार रहूँ ग़ैर सोए तिरी ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव में और मैं चाँदनी रातों मैं फ़क़त शे'र कहूँ मुझ से ये तेरे क़सीदे न लिखे जाएँगे मुझ से तेरे लिए ये ग़ज़लें न कही जाएँगी याद में तेरी मैं सुलगा न सकूँगा आँखें सख़्तियाँ दर्द की मुझ से न सही जाएँगी शहर में ऐसे मुसव्विर हैं जो सिक्कों के एवज़ हुस्न में लैला-ओ-अज़रा से बढ़ा देंगे तुझे तूल दे कर तिरी ज़ुल्फ़ों को शब-ए-ग़म की तरह फ़न के ए'जाज़ से नागिन सी बना देंगे तुझे तुझ को शहर की ज़रूरत है मोहब्बत की मुझे ऐ हसीना तिरी मंज़िल मिरी मंज़िल में नहीं नाच घर तेरी निगाहों में हैं रक़्साँ लेकिन इस तअ'य्युश की तमन्नाएँ मिरे दिल में नहीं देख के ग़ैर के पहलू में तुझे रक़्स-कुनाँ भीग जाती है मिरी आँख सरिश्क-ए-ग़म से मुझ को बरसों की ग़ुलामी का ख़याल आता है जिस ने अंदाज़-ए-वफ़ा छीन लिया है हम से मुझ को भँवरा न समझ मुझ को पतंगा न समझ मुझ को इंसान समझ मेरी सदाक़त से न खेल तेरी तफ़रीह का सामाँ न बनूँगा हरगिज़ मेरी दुनिया है यही मेरी मोहब्बत से न खेल

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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

Kumar Vishwas

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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पूछ न क्या लाहौर में देखा हम ने मियाँ-'नज़ीर' पहनें सूट अंग्रेज़ी बोलें और कहलाएँ 'मीर' चौधरियों की मुट्ठी में है शाइ'र की तक़दीर रोए भगत कबीर इक-दूजे को जाहिल समझें नट-खट बुद्धीवान मेट्रो में जो चाय पिलाए बस वो बाप समान सब से अच्छा शाइ'र वो है जिस का यार मुदीर रोए भगत कबीर सड़कों पर भूके फिरते हैं शाइ'र मूसीक़ार एक्ट्रसों के बाप लिए फिरते हैं मोटर-कार फ़िल्म-नगर तक आ पहुँचे हैं सय्यद पीर फ़क़ीर रोए भगत कबीर लाल-दीन की कोठी देखी रंग भी जिस का लाल शहर में रह कर ख़ूब उड़ाए दहक़ानों का माल और कहे अज्दाद ने बख़्शी मुझ को ये जागीर रोए भगत कबीर जिस को देखो लीडर है और से मिलो वकील किसी तरह भरता ही नहीं है पेट है उन का झील मजबूरन सुनना पड़ती है उन सब की तक़दीर रोए भगत कबीर महफ़िल से जो उठ कर जाए कहलाए वो बोर अपनी मस्जिद की ता'रीफ़ें बाक़ी जूते-चोर अपना झंग भला है प्यारे जहाँ हमारी हीर रोए भगत कबीर

Habib Jalib

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देना पड़े कुछ ही हर्जाना सच ही लिखते जाना मत घबराना मत डर जाना सच ही लिखते जाना बातिल की मुँह-ज़ोर हवा से जो न कभी बुझ पाएँ वो शमएँ रौशन कर जाना सच ही लिखते जाना पल दो पल के ऐश की ख़ातिर क्या देना क्या झुकना आख़िर सब को है मर जाना सच ही लिखते जाना लौह-ए-जहाँ पर नाम तुम्हारा लिखा रहेगा यूँँही 'जालिब' सच का दम भर जाना सच ही लिखते जाना

Habib Jalib

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जो हो न सकी बात वो चेहरों से अयां थी हालात का मातम था मुलाक़ात कहाँ थी उस ने न ठहरने दिया पहरों मिरे दिल को जो तेरी निगाहों में शिकायत मिरी जाँ थी घर में भी कहाँ चैन से सोए थे कभी हम जो रात है ज़िंदां में वही रात वहाँ थी यकसां हैं मिरी जान क़फ़स और नशेमन इंसान की तौक़ीर यहाँ है न वहाँ थी शाहों से जो कुछ रब्त न क़ाएम हुआ अपना आदत का भी कुछ जब्र था कुछ अपनी ज़बां थी सय्याद ने यूँ ही तो क़फ़स में नहीं डाला मशहूर गुलिस्ताँ में बहुत मेरी फ़ुग़ाँ थी तू एक हक़ीक़त है मिरी जाँ मिरी हमदम जो थी मिरी ग़ज़लों में वो इक वहम-ओ-गुमां थी महसूस किया मैं ने तिरे ग़म से ग़म-ए-दहर वर्ना मिरे अश'आर में ये बात कहाँ थी

Habib Jalib

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पूछ न क्या लाहौर में देखा हम ने मियाँ-'नज़ीर' पहनें सूट अंग्रेज़ी बोलें और कहलाएँ 'मीर' चौधरियों की मुट्ठी में है शाइ'र की तक़दीर रोए भगत कबीर इक-दूजे को जाहिल समझें नट-खट बुद्धीवान मेट्रो में जो चाय पिलाए बस वो बाप समान सब से अच्छा शाइ'र वो है जिस का यार मुदीर रोए भगत कबीर सड़कों पर भूके फिरते हैं शाइ'र मूसीक़ार एक्ट्रसों के बाप लिए फिरते हैं मोटर-कार फ़िल्म-नगर तक आ पहुँचे हैं सय्यद पीर फ़क़ीर रोए भगत कबीर लाल-दीन की कोठी देखी रंग भी जिस का लाल शहर में रह कर ख़ूब उड़ाए दहक़ानों का माल और कहे अज्दाद ने बख़्शी मुझ को ये जागीर रोए भगत कबीर जिस को देखो लीडर है और से मिलो वकील किसी तरह भरता ही नहीं है पेट है उन का झील मजबूरन सुनना पड़ती है उन सब की तक़दीर रोए भगत कबीर महफ़िल से जो उठ कर जाए कहलाए वो बोर अपनी मस्जिद की ता'रीफ़ें बाक़ी जूते-चोर अपना झंग भला है प्यारे जहाँ हमारी हीर रोए भगत कबीर

Habib Jalib

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इक हसीं गाँव था कनार-ए-आब कितना शादाब था दयार-ए-आब क्या अजब बे-नियाज़ बस्ती थी मुफ़्लिसी में भी एक मस्ती थी कितने दिलदार थे हमारे दोस्त वो बिचारे वो बे-सहारे दोस्त अपना इक दायरा था धरती थी ज़िंदगी चीन से गुज़रती थी क़िस्सा जब यूसुफ़ ओ ज़ुलेख़ा का मीठे मीठे सुरों में छिड़ता था क़स्र शाहों के हिलने लगते थे चाक सीनों के सिलने लगते थे

Habib Jalib

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