nazmKuch Alfaaz

हज़ारों साल बीते मिरी ज़रख़ेज़ धरती के सिंघासन पर बिराजे देवताओं के सरापे साँवले थे मगर उस वक़्त भी कुछ हुस्न का मेआ'र ऊँचा था हिमाला की हसीं बेटी उन्हें भाई बृन्दाबन की धरती पर थिरकती नाचती राधा बसी थी कृष्ण के दिल में उन्हें भी हुस्न की मन-मोहनी मूरत पसंद आई मगर उन को ख़ुदा होते हुए भी ये ख़बर कब थी कि उन की आने वाली नस्ल पर उन का सरापा बहुत गहरा असर है छोड़ने वाला हज़ारों साल बीते मगर अब भी हमारी साँवली रंगत तिरा वरदान हो गोया हमारा हम-सफ़र भी किसी पारो किसी राधा का अंधा ख़्वाब आँखों में बसाए लिए कश्कोल हाथों में फिरे बस्ती की गलियों में हम अब किस ज़ो'म में पूजा की थाली में दिए रख कर तिरी चौखट पे आएँ सर झुकाएँ उतारें आरती तेरी हमारे बख़्त पर तेरा ये श्यामल रंग इक आसेब की सूरत मुसल्लत है हम अब तो डर के मारे आइनों से मुँह छुपाए फिर रहे हैं

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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं

Divya 'Kumar Sahab'

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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना

Rishabh Sharma

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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“ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है” न आराम अब मुझ को इक पल भी यारों मुझे याद आया था वो कल भी यारों वो यारों मेरे साथ क्यूँँ कर गया ये कोई तो दवा हो जो आराम दे दे मैं दफ़्तर के पहिये में पिसने लगा हूँ हैं हाथों में पत्थर मैं ख़ुद आइना हूँ वो तारों से आगे मैं धरती के अंदर बना है वो पागल जो कल था सिकंदर वो कल था जहाँ पर वो अब भी वहीं है ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है मैं बरसों से दर दर भटकता रहा हूँ मैं बेचैन भी हूँ मैं बे-आसरा हूँ नए ज़ख़्म फिर से है लाई मोहब्बत कि जब से हुई है परायी मोहब्बत मोहब्बत का मुझ को सिला ये मिला है दिवानों का अब साथ में क़ाफ़िला है सुकूँ ढूँढ़ते ढूँढ़ते थक गया हूँ मैं दुनिया से आगे फ़लक तक गया हूँ ये दिल है कहीं और धड़कन कहीं है ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है

Amaan Pathan

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"शनासाई" रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा अपना हक़ माँगती है दूर ख़्वाबों के जज़ीरे में किसी रौज़न से सुब्ह की एक किरन झाँकती है वो किरन दरपा-ए-आज़ार हुई जाती है मेरी ग़म-ख़्वार हुई जाती है आओ किरनों को अँधेरों का कफ़न पहनाएँ इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़्तल लाएँ तुम मिरे पास रहो और यही बात कहो आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है अपने क़ातिल से मिरी ख़ूब शनासाई है

Akhtar Payami

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बहुत सी नज़्में कही थीं मैं ने लिखें भी लिख लिख के फाड़ डालें जो शायद नाज़ुक तब्अ' पे तेरी गराँ गुज़रतीं कि जानती थी वो सारे मौसम जो तेरे अंदर हैं आते जाते परख चुकी थी मैं तेरे दिल की तमाम रुत को मैं तेरी सोचों से आश्ना थी इसी लिए तो बहुत सी नज़्में कही थीं लेकिन

Kahkashan Tabassum

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वो मुअज़्ज़िन था ज़रा सी देर को आ या था अपने घर ये कहने को कि कोई शोर हो दस्तक हो दरवाज़ा न खोलोगी दरीचे बंद रक्खोगी हवाएँ शहर की बदली हुई हैं यही ताकीद कर के वो वापस हो गया था और अपनी कोठरी में बंद उस की काँपती बीवी कलेजे से लगाए नन्हे बच्चों को किसी सहमी हुई चिड़िया की सूरत पर समेटे दम-ब-ख़ुद बैठी रही न जाने रात के कितने पहर बीते फज्र होने को आई बशारत बाँग की सूरत किसी मुर्ग़े ने दी थी सुब्ह होने की मगर मस्जिद के मिम्बर से बिला-नाग़ा बुलंद होती मोअज़्ज़िन की सदा चुप थी अज़ान-ए-सुब्ह ग़ाएब थी

Kahkashan Tabassum

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शाकाहारी गोश्त मछली अंडे नहीं खाते कि भ्रष्ट न हो जाए धर्म मगर खेतों में हमारी लाशें दबा कर सब्ज़ियाँ उगाते हैं हमारे ही लहू की नमी से करते हैं पटवन शाकाहारी मांसाहारी जो नहीं होते

Kahkashan Tabassum

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चलो आओ चलें चलें फिर लौट के वापस उसी अंधी गुफा में हम जहाँ रौशन हुई थी आग पहले-पहल कि अब काली हवाओं से बचाओ का यही इक रास्ता है चलो आओ उन्हीं ग़ारों की जानिब फिर चलें जानाँ और अंदर की बरसती बारिशों में जम के भीगें भीगते जाएँ ठिठुर जाएँ ठिठुर कर सर्द पड़ते जिस्म-ओ-जाँ को हम उसी पहले-पहल की आग से राहत दिलाएँ उसी पहले जनम से फिर करें ना इब्तिदा जानाँ चलो आओ

Kahkashan Tabassum

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ये तिरी शक्ल है कि चाँद का रौशन चेहरा ये सितारे तिरी आँखों से दमकते क्यूँँ हैं ये तिरी शोख़ अदाओं सी सनकती पुर्वा जो मिरे सर से दुपट्टे को गिरा देती है ख़ुश्क बालों को ज़रा और उड़ा देती है ये तिरी याद के जुगनू हैं कि शबनम क़तरे जिस से बे-ख़्वाब निगाहों की ज़मीं गीली है कोई आहट न ही दस्तक कि गली सूनी है गर मुझे वक़्त के तेवर का पता जो होता घर की दहलीज़ से बाहर नहीं जाने देती सारे दरवाज़ों दरीचों को मुक़फ़्फ़ल रखती सूनी आँखों में छुपा लेती मैं काजल की तरह अपनी बाँहों के हिसारों में मुक़य्यद रखती मिरे बच्चे जो मुझे काश ख़बर ये होती एक दो पल में मिरा शहर है जलने वाला

Kahkashan Tabassum

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