मेरी आँखों में कोई चेहरा चराग़-ए-आरज़ू वो मेरा आईना जिस से ख़ुद झलक जाऊँ कभी ऐसा मौसम जैसे मय पी कर छलक जाऊँ कभी या कोई है ख़्वाब जो देखा था लेकिन फिर मुझे याद करने पर भी याद आया न था दिल ये कहता है वही है हू-ब-हू जिस को देखा था कभी और सामने पाया न था गुफ़्तुगू उस से है और है रू-ब-रू ख़्वाब हो जाए न लेकिन गुफ़्तुगू मेरी आँखों में कोई चेहरा चराग़-ए-आरज़ू
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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सब बारिशें हो के थम चुकी थीं रूहों में धनक उतर रही थी मैं ख़्वाब में बात कर रहा था वो नींद में प्यार कर रही थी अहवाल ही और हो रहे थे लज़्ज़त में विसाल रो रहे थे बोसों में धुले-धुलाए दोनों नश्शे में लिपट के सो रहे थे छोटा सा हसीन सा वो कमरा इक आलम-ए-ख़्वाब हो रहा था ख़ुश्बू से गुलाब हो रहा था मस्ती से शराब हो रहा था वो छाँव सा चाँदनी सा बिस्तर हम रंग नहा रहे थे जिस पर यूँँ था कि हम अपनी ज़ात के अंदर थे अपना ही एक और मंज़र सैराब मोहब्बतों के धारे बाहम थे वजूद के किनारे मौज़ू-ए-सुख़न, सुख़न थे सारे आलम ही अजीब थे हमारे जागे वो लहू में सिलसिले फिर तन मन के वही थे ज़ाइक़े फिर थम थम के बरस बरस गए फिर पाताल तक हो गए हरे फिर जारी था वो रक़्स-ए-हम-किनारी निकली नई सुब्ह की सवारी ऐसा लगा काएनात सारी इस आन तो है फ़क़त हमारी जब चाँद मिरा नहा के निकला मैं दिल को दिया बना के निकला कश्कोल-ए-दुआ उठा के निकला शाइ'र था सदा लगा के निकला दरिया वो समुंदरों से गहरे वो ख़्वाब गुलाब ऐसे चेहरे सब ज़ावियों हो गए सुनहरे आईनों में जब वो आ के ठहरे
Obaidullah Aleem
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तुम्हारे हैं कहो इक दिन कहो इक दिन कि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा है कहो इक दिन जिसे तुम चाँद सा कहते हो वो चेहरा तुम्हारा था सितारा सी जिन्हें कहते हो वो आँखें तुम्हारी हैं जिन्हें तुम शाख़ सी कहते हो वो बाँहें तुम्हारी हैं कबूतर तोलते हैं पर तो परवाज़ें तुम्हारी हैं जिन्हें तुम फूल सी कहते हो वो बातें तुम्हारी हैं क़यामत सी जिन्हें कहते हो रफ़्तारें तुम्हारी हैं कहो इक दिन कहो इक दिन कि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा है अगर सब कुछ ये मेरा है तो सब कुछ बख़्श दो इक दिन वजूद अपना मुझे दे दो मोहब्बत बख़्श दो इक दिन मिरे होंटों पे अपने होंट रख कर रूह मेरी खींच लो इक दिन
Obaidullah Aleem
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आख़िरी रात थी वो मैं ने दिल से ये कहा हर्फ़ जो लिक्खे गए और जो ज़बाँ बोली गई सभी बे-कार गए मैं भी अब हार गया यार भी सब हार गए कोई चारा नहीं जुज़-तर्क-ए-तअल्लुक़ ऐ दिल इक सदा और सही आख़िरी बार जिस्म से छेड़ा उसे रूह से छू ले उसे आख़िरी बार बहे साज़-ए-बदन से कोई नग़्मा कोई लै आख़िरी रात है ये आख़िरी बार है ये ज़ाइक़ा-ए-बोसा-ओ-लम्स आख़िरी बार छलक जाए लहू गर्मी-ए-जाँ से महक जाए नफ़स की ख़ुश्बू ख़्वाब में ख़्वाब के मानिंद उतर जा ऐ दिल आख़िरी रात थी वो फिर गुज़र कू-ए-नदामत से हुआ तो देखा बाम रौशन है जो था और दरवाज़े पे दस्तक है वही मेरा क़ातिल दर-ओ-दीवार पे कुछ नक़्श बनाता है अभी उँगलियाँ ख़ून से तर दिल-ए-कम-ज़र्फ़ को है वाहम-ए-अर्ज़-ए-हुनर दिन की हर बात हुई बे-तौक़ीर रात है और ज़मीर चश्म है मुंतज़िर-ए-ख़्वाब-ए-दिगर ख़्वाब आते हैं ठहरते हैं चले जाते हैं और क़ातिल की सज़ा ये भी कि मैं ज़िंदा हूँ
Obaidullah Aleem
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मुझे ख़बर है तुम्हारी आँखों में जो छुपा है तुम्हारे चेहरे पे जो लिखा है लहू जो हर आन बोलता है मुझे बता दो और अपने दुख से नजात पा लो
Obaidullah Aleem
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मैं वो शजर था कि मेरे साए में बैठने और शाख़ों पे झूलने की हज़ारों जिस्मों को आरज़ू थी ज़मीं की आँखें दराज़ी-ए-उम्र की दु'आओं में रो रही थीं और सूरज के हाथ थकते नहीं थे मुझ को सँवारने में कि मैं इक आवाज़ का सफ़र था अजब शजर था कि उस मुसाफ़िर का मुंतज़िर था जो मेरे साए में आ के बैठे तो फिर न उट्ठे जो मेरी शाख़ों पे आए झूले तो सारे मौसम यहीं गुज़ारे मगर वो पागल हवा का झोंका मगर वो पागल हवा का झोंका अजब मुसाफ़िर था रहगुज़र का जो छोड़ आया था कितनी शाख़ें मगर लगा यूँँ कि जैसे अब वो शिकस्ता-तर है वो मेरे ख़्वाबों का हम-सफ़र है सो मैं ने साए बिछा दिए थे तमाम झूले हिला दिए थे मगर वो पागल हवा का झोंका मगर वो पागल हवा का झोंका अजब मुसाफ़िर था रहगुज़र था कि लम्हे भर में गुज़र चुका था मैं बे-नुमू और बे-समर था मगर मैं आवाज़ का सफ़र था सो मेरी आवाज़ का अजर था अजब शजर था अजब शजर हूँ कि आने वाले सह कह रहा हूँ ऐ मेरे दिल में उतरने वाले ऐ मुझ को शादाब करने वाले तुझे मिरी रौशनी मुबारक तुझे मिरी ज़िंदगी मुबारक
Obaidullah Aleem
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