मैं वो शजर था कि मेरे साए में बैठने और शाख़ों पे झूलने की हज़ारों जिस्मों को आरज़ू थी ज़मीं की आँखें दराज़ी-ए-उम्र की दु'आओं में रो रही थीं और सूरज के हाथ थकते नहीं थे मुझ को सँवारने में कि मैं इक आवाज़ का सफ़र था अजब शजर था कि उस मुसाफ़िर का मुंतज़िर था जो मेरे साए में आ के बैठे तो फिर न उट्ठे जो मेरी शाख़ों पे आए झूले तो सारे मौसम यहीं गुज़ारे मगर वो पागल हवा का झोंका मगर वो पागल हवा का झोंका अजब मुसाफ़िर था रहगुज़र का जो छोड़ आया था कितनी शाख़ें मगर लगा यूँँ कि जैसे अब वो शिकस्ता-तर है वो मेरे ख़्वाबों का हम-सफ़र है सो मैं ने साए बिछा दिए थे तमाम झूले हिला दिए थे मगर वो पागल हवा का झोंका मगर वो पागल हवा का झोंका अजब मुसाफ़िर था रहगुज़र था कि लम्हे भर में गुज़र चुका था मैं बे-नुमू और बे-समर था मगर मैं आवाज़ का सफ़र था सो मेरी आवाज़ का अजर था अजब शजर था अजब शजर हूँ कि आने वाले सह कह रहा हूँ ऐ मेरे दिल में उतरने वाले ऐ मुझ को शादाब करने वाले तुझे मिरी रौशनी मुबारक तुझे मिरी ज़िंदगी मुबारक
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं
Tehzeeb Hafi
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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मेरी आँखों में कोई चेहरा चराग़-ए-आरज़ू वो मेरा आईना जिस से ख़ुद झलक जाऊँ कभी ऐसा मौसम जैसे मय पी कर छलक जाऊँ कभी या कोई है ख़्वाब जो देखा था लेकिन फिर मुझे याद करने पर भी याद आया न था दिल ये कहता है वही है हू-ब-हू जिस को देखा था कभी और सामने पाया न था गुफ़्तुगू उस से है और है रू-ब-रू ख़्वाब हो जाए न लेकिन गुफ़्तुगू मेरी आँखों में कोई चेहरा चराग़-ए-आरज़ू
Obaidullah Aleem
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सब बारिशें हो के थम चुकी थीं रूहों में धनक उतर रही थी मैं ख़्वाब में बात कर रहा था वो नींद में प्यार कर रही थी अहवाल ही और हो रहे थे लज़्ज़त में विसाल रो रहे थे बोसों में धुले-धुलाए दोनों नश्शे में लिपट के सो रहे थे छोटा सा हसीन सा वो कमरा इक आलम-ए-ख़्वाब हो रहा था ख़ुश्बू से गुलाब हो रहा था मस्ती से शराब हो रहा था वो छाँव सा चाँदनी सा बिस्तर हम रंग नहा रहे थे जिस पर यूँँ था कि हम अपनी ज़ात के अंदर थे अपना ही एक और मंज़र सैराब मोहब्बतों के धारे बाहम थे वजूद के किनारे मौज़ू-ए-सुख़न, सुख़न थे सारे आलम ही अजीब थे हमारे जागे वो लहू में सिलसिले फिर तन मन के वही थे ज़ाइक़े फिर थम थम के बरस बरस गए फिर पाताल तक हो गए हरे फिर जारी था वो रक़्स-ए-हम-किनारी निकली नई सुब्ह की सवारी ऐसा लगा काएनात सारी इस आन तो है फ़क़त हमारी जब चाँद मिरा नहा के निकला मैं दिल को दिया बना के निकला कश्कोल-ए-दुआ उठा के निकला शाइ'र था सदा लगा के निकला दरिया वो समुंदरों से गहरे वो ख़्वाब गुलाब ऐसे चेहरे सब ज़ावियों हो गए सुनहरे आईनों में जब वो आ के ठहरे
Obaidullah Aleem
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तुम्हारे हैं कहो इक दिन कहो इक दिन कि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा है कहो इक दिन जिसे तुम चाँद सा कहते हो वो चेहरा तुम्हारा था सितारा सी जिन्हें कहते हो वो आँखें तुम्हारी हैं जिन्हें तुम शाख़ सी कहते हो वो बाँहें तुम्हारी हैं कबूतर तोलते हैं पर तो परवाज़ें तुम्हारी हैं जिन्हें तुम फूल सी कहते हो वो बातें तुम्हारी हैं क़यामत सी जिन्हें कहते हो रफ़्तारें तुम्हारी हैं कहो इक दिन कहो इक दिन कि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा है अगर सब कुछ ये मेरा है तो सब कुछ बख़्श दो इक दिन वजूद अपना मुझे दे दो मोहब्बत बख़्श दो इक दिन मिरे होंटों पे अपने होंट रख कर रूह मेरी खींच लो इक दिन
Obaidullah Aleem
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ये लफ़्ज़ सुक़रात लफ़्ज़ ईसा मैं इन का ख़ालिक़ ये मेरे ख़ालिक़ यही अज़ल हैं यही अबद हैं यही ज़माँ हैं यही मकाँ हैं ये ज़ेहन-ता-ज़ेहन रह-गुज़र हैं ये रूह-ता-रूह इक सफ़र हैं सदाक़त-ए-अस्र भी यही हैं कराहत-ए-जब्र भी यही हैं अलामत-ए-दर्द भी यही हैं करामत-ए-सब्र भी यही हैं बग़ैर तफ़रीक़-ए-रंग-ओ-मज़हब ज़मीं ज़मीं इन की बादशाही खिंचे हुए हैं लहू लहू में बिछे हुए हैं ज़बाँ ज़बाँ पर ये झूट भी हैं ये लूट भी हैं ये जंग भी हैं ये ख़ून भी हैं मगर ये मजबूरियाँ हैं इन की बग़ैर इन के हयात सारी तवह्हुमाती हर एक हरकत सुकूत ठहरे न कह सकें कुछ न सुन सकें कुछ हर एक आईना अपनी अक्कासियों पे हैराँ हो और चुप हो निगाह-ए-नज़्ज़ारा-बीं तमाशा हो वहशतों का इजाज़त-ए-जल्वा दे के जैसे ज़बाँ से गोयाई छीन ली जाए न हुस्न कुछ हो न इश्क़ कुछ हो तमाम एहसास की हवाएँ तमाम इरफ़ान के जज़ीरे तमाम ये इल्म के समुंदर सराब हों वहम हों गुमाँ हों ये लफ़्ज़ तेशा हैं जिन से अफ़्कार अपनी सूरत तराशते हैं मसीह-ए-दस्त-ओ-क़लम से निकलें तो फिर ये अल्फ़ाज़ बोलते हैं यही मुसव्विर यही हैं बुत-गर यही हैं शाइ'र यही मुग़न्नी यही नवा हैं यही पयम्बर यही ख़ुदा हैं मैं कीमिया हूँ ये कीमिया-गर ये मेरा कल्याण चाहते हैं मैं इन की तस्ख़ीर कर रहा हूँ ये मेरी तामीर कर रहे हैं
Obaidullah Aleem
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मिरे ख़ुदाया मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँ ये मेरा चेहरा ये मेरी आँखें बुझे हुए से चराग़ जैसे जो फिर से चलने के मुंतज़िर हों वो चाँद-चेहरा सितारा-आँखें वो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें जिन्हों ने पैमाँ किए थे मुझ से रफ़ाक़तों के मोहब्बतों के कहा था मुझ से कि ऐ मुसाफ़िर रह-ए-वफ़ा के जहाँ भी जाएगा हम भी आएँगे साथ तेरे बनेंगे रातों में चाँदनी हम तो दिन में साए बिखेर देंगे वो चाँद-चेहरा सितारा-आँखें वो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें वो अपने पैमाँ रफ़ाक़तों के मोहब्बतों के शिकस्त कर के न जाने अब किस की रहगुज़र का मनारा-ए-रौशनी हुए हैं मगर मुसाफ़िर को क्या ख़बर है वो चाँद-चेहरा तो बुझ गया है सितारा-आँखें तो सो गई हैं वो ज़ुल्फ़ें बे-साया हो गई हैं वो रौशनी और वो साए मिरी अता थे सो मेरी राहों में आज भी हैं कि मैं मुसाफ़िर रह-ए-वफ़ा का वो चाँद-चेहरा सितारा-आँखें वो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें हज़ारों चेहरों हज़ारों आँखों हज़ारों ज़ुल्फ़ों का एक सैलाब-ए-तुंद ले कर मिरे तआक़ुब में आ रहे हैं हर एक चेहरा है चाँद-चेहरा हैं सारी आँखें सितारा-आँखें तमाम हैं मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें मैं किस को चाहूँ मैं किस को चूमूँ मैं किस के साए में बैठ जाऊँ बचूँ कि तूफ़ाँ में डूब जाऊँ न मेरा चेहरा न मेरी आँखें मिरे ख़ुदाया मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँ
Obaidullah Aleem
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