nazmKuch Alfaaz

ये लफ़्ज़ सुक़रात लफ़्ज़ ईसा मैं इन का ख़ालिक़ ये मेरे ख़ालिक़ यही अज़ल हैं यही अबद हैं यही ज़माँ हैं यही मकाँ हैं ये ज़ेहन-ता-ज़ेहन रह-गुज़र हैं ये रूह-ता-रूह इक सफ़र हैं सदाक़त-ए-अस्र भी यही हैं कराहत-ए-जब्र भी यही हैं अलामत-ए-दर्द भी यही हैं करामत-ए-सब्र भी यही हैं बग़ैर तफ़रीक़-ए-रंग-ओ-मज़हब ज़मीं ज़मीं इन की बादशाही खिंचे हुए हैं लहू लहू में बिछे हुए हैं ज़बाँ ज़बाँ पर ये झूट भी हैं ये लूट भी हैं ये जंग भी हैं ये ख़ून भी हैं मगर ये मजबूरियाँ हैं इन की बग़ैर इन के हयात सारी तवह्हुमाती हर एक हरकत सुकूत ठहरे न कह सकें कुछ न सुन सकें कुछ हर एक आईना अपनी अक्कासियों पे हैराँ हो और चुप हो निगाह-ए-नज़्ज़ारा-बीं तमाशा हो वहशतों का इजाज़त-ए-जल्वा दे के जैसे ज़बाँ से गोयाई छीन ली जाए न हुस्न कुछ हो न इश्क़ कुछ हो तमाम एहसास की हवाएँ तमाम इरफ़ान के जज़ीरे तमाम ये इल्म के समुंदर सराब हों वहम हों गुमाँ हों ये लफ़्ज़ तेशा हैं जिन से अफ़्कार अपनी सूरत तराशते हैं मसीह-ए-दस्त-ओ-क़लम से निकलें तो फिर ये अल्फ़ाज़ बोलते हैं यही मुसव्विर यही हैं बुत-गर यही हैं शाइ'र यही मुग़न्नी यही नवा हैं यही पयम्बर यही ख़ुदा हैं मैं कीमिया हूँ ये कीमिया-गर ये मेरा कल्याण चाहते हैं मैं इन की तस्ख़ीर कर रहा हूँ ये मेरी तामीर कर रहे हैं

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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तुम्हारे हैं कहो इक दिन कहो इक दिन कि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा है कहो इक दिन जिसे तुम चाँद सा कहते हो वो चेहरा तुम्हारा था सितारा सी जिन्हें कहते हो वो आँखें तुम्हारी हैं जिन्हें तुम शाख़ सी कहते हो वो बाँहें तुम्हारी हैं कबूतर तोलते हैं पर तो परवाज़ें तुम्हारी हैं जिन्हें तुम फूल सी कहते हो वो बातें तुम्हारी हैं क़यामत सी जिन्हें कहते हो रफ़्तारें तुम्हारी हैं कहो इक दिन कहो इक दिन कि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा है अगर सब कुछ ये मेरा है तो सब कुछ बख़्श दो इक दिन वजूद अपना मुझे दे दो मोहब्बत बख़्श दो इक दिन मिरे होंटों पे अपने होंट रख कर रूह मेरी खींच लो इक दिन

Obaidullah Aleem

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मुझे ख़बर है तुम्हारी आँखों में जो छुपा है तुम्हारे चेहरे पे जो लिखा है लहू जो हर आन बोलता है मुझे बता दो और अपने दुख से नजात पा लो

Obaidullah Aleem

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सब बारिशें हो के थम चुकी थीं रूहों में धनक उतर रही थी मैं ख़्वाब में बात कर रहा था वो नींद में प्यार कर रही थी अहवाल ही और हो रहे थे लज़्ज़त में विसाल रो रहे थे बोसों में धुले-धुलाए दोनों नश्शे में लिपट के सो रहे थे छोटा सा हसीन सा वो कमरा इक आलम-ए-ख़्वाब हो रहा था ख़ुश्बू से गुलाब हो रहा था मस्ती से शराब हो रहा था वो छाँव सा चाँदनी सा बिस्तर हम रंग नहा रहे थे जिस पर यूँँ था कि हम अपनी ज़ात के अंदर थे अपना ही एक और मंज़र सैराब मोहब्बतों के धारे बाहम थे वजूद के किनारे मौज़ू-ए-सुख़न, सुख़न थे सारे आलम ही अजीब थे हमारे जागे वो लहू में सिलसिले फिर तन मन के वही थे ज़ाइक़े फिर थम थम के बरस बरस गए फिर पाताल तक हो गए हरे फिर जारी था वो रक़्स-ए-हम-किनारी निकली नई सुब्ह की सवारी ऐसा लगा काएनात सारी इस आन तो है फ़क़त हमारी जब चाँद मिरा नहा के निकला मैं दिल को दिया बना के निकला कश्कोल-ए-दुआ उठा के निकला शाइ'र था सदा लगा के निकला दरिया वो समुंदरों से गहरे वो ख़्वाब गुलाब ऐसे चेहरे सब ज़ावियों हो गए सुनहरे आईनों में जब वो आ के ठहरे

Obaidullah Aleem

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उदास यादों की मुज़्महिल रात बीत भी जा कि मेरी आँखों में अब लहू है न ख़्वाब कोई मैं सब दिए ताक़-ए-आरज़ू के बुझा चुका हूँ तू ही बता अब कि मर्ग-ए-महताब ओ ख़ून-ए-अंजुम पे नज़्र क्या दूँ न मेरा माज़ी न मेरा फ़र्दा बिखर गई थी जो ज़ुल्फ़ कब की सँवर चुकी है और आने वाली सहर भी आ कर गुज़र चुकी है उदास यादों की मुज़्महिल रात बीत भी जा!

Obaidullah Aleem

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मेरी आँखों में कोई चेहरा चराग़-ए-आरज़ू वो मेरा आईना जिस से ख़ुद झलक जाऊँ कभी ऐसा मौसम जैसे मय पी कर छलक जाऊँ कभी या कोई है ख़्वाब जो देखा था लेकिन फिर मुझे याद करने पर भी याद आया न था दिल ये कहता है वही है हू-ब-हू जिस को देखा था कभी और सामने पाया न था गुफ़्तुगू उस से है और है रू-ब-रू ख़्वाब हो जाए न लेकिन गुफ़्तुगू मेरी आँखों में कोई चेहरा चराग़-ए-आरज़ू

Obaidullah Aleem

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