"1947 की तक़्सीम और इंसाँ" इंसाँ कुछ यहाँ से निकले वहाँ से कुछ आए एक दूजे से मिले लेकिन सरहद के साए इंसाँ काटे इंसाँ को और कोहराम मचाए कुछ ज़ख़्मी कुछ मर गए किस को कौन बचाए कुछ ज़िंदा कुछ मुर्दा राह में गिरते जाए जिस्म ही जिस्म हैं रूह कहीं न नज़र आ पाए कौन किसे अब देखे सँभाले समझाए होश ही गुम है होश कहाँ से अब लाए ख़ून से धरती माँ सुर्ख़ अब होती जाए रोते हैं बच्चे कई माँ कहाँ है हाए ज़र्द से चेहरे उजड़ी हवाएँ नज़र को न भाए ताज़ा कोई हवा बस इस सरहद को मिटाए
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"बादल और आँसू" सीख लो बादल से आँसू को बहाना हो न आँसू गिरने का कोई ठिकाना वज्ह हो कोई हो कोई फिर ज़माना ग़म न कोई हो न ख़ुद को हो मनाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना अपने मातम में सभी को यूँँ भिगाना सब को ही ग़म-ख़्वार तुम अपना बनाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना अपने आँसू से ज़मीं को यूँँ भिगाना दूर से ही नक़्श तुम अपना बनाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना धुन सुरीली कोई बूँदों से बनाना रोते रोते तुम भी नग़्मा कोई गाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना यूँँ बहा के आँसू तुम ख़ुद को मिटाना सीख लो बादल से हस्ती को मिटाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना
Sanjay Bhat
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"विधाता" न पूछ मुझ से तू हाल दिल का न पूछ मुझ से कि कौन हूँ मैं न पूछ मुझ से कि मैं कहाँ हूँ मैं एक ज़र्रा हूँ दर-ब-दर सा तेरी ही राहों में हूँ मैं उलझा तेरी ही चाहत में हूँ मैं धुँदला न पूछ मुझ से तू हाल दिल का कि धूप से कब तलक मैं छुपता कि छाँव को कब तलक मैं तकता सो मैं चला हूँ तेरी ही जानिब तू आख़िरी सच तू ही विधाता
Sanjay Bhat
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"पत्ता और गुल" ख़ुश्क पत्ता हूँ जो गुल बनने चला था पर उसी डाली पे मैं भी तो खिला था क्यूँ न आई मुझ से ख़ुशबू गुल के जैसी यूँँ तो मैं भी साथ उन के ही पला था रंग था मेरा तो बस इक ही तरह का रंग हर गुल को चटक सा भी मिला था सब ने रौंदा क्यूँ गिरा जो शाख़ से मैं यूँँ उसी सूरज से मैं भी तो जला था वो ही मिट्टी थी रहा मौसम भी वो ही क्या निहाँ था फिर कि जिस शय ने छला था
Sanjay Bhat
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धरती की मौजूदा हालत अपना हाल बताए कैसे पाँव की थप थप जिस्म की हरकत सब की राह बनाए कैसे अपना हाल बताए कैसे शोर मशीनों और लोगों का अपना साज़ सुनाए कैसे धुन जो दबी है जगाए कैसे अपना हाल बताए कैसे गर्द धुआँ सब घेर के बैठे बादल फिर से बिछाए कैसे अपना हाल बताए कैसे सूरज है तपता ग़ुस्से में उस की आग बुझाए कैसे सुर्ख़ है अब आँखें भी उस की ख़ुद को उस से छुपाए कैसे अपना हाल बताए कैसे घर की नहीं है मकानों की होड़ वुसअत अपनी बचाए कैसे सिमटी शक्ल दिखाए कैसे अपना हाल बताए कैसे पेड़ भी काटे पर्बत तोड़े शाख़ें तोड़ीं दरिया मोड़े दस्त-ओ-बाज़ू बचाए कैसे अपना हाल बताए कैसे बढ़ते ही सारे जाते हैं रेंगते इंसाँ रेंगते वाहन लर्ज़िश इतनी दबाए कैसे अपना हाल बताए कैसे अब तो बहती नदियाँ काली बहता ज़हर है दरिया दरिया ख़ुद की प्यास बुझाए कैसे अपना हाल बताए कैसे
Sanjay Bhat
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मिट्टी और पेड़ की जड़ पेड़ की जड़ को देखा है कैसे मिट्टी को पकड़े रहती है और जब मिट्टी को इस क़ुर्बत का एहसास होता है तो जड़ को अपना रंग दे देती है
Sanjay Bhat
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