धरती की मौजूदा हालत अपना हाल बताए कैसे पाँव की थप थप जिस्म की हरकत सब की राह बनाए कैसे अपना हाल बताए कैसे शोर मशीनों और लोगों का अपना साज़ सुनाए कैसे धुन जो दबी है जगाए कैसे अपना हाल बताए कैसे गर्द धुआँ सब घेर के बैठे बादल फिर से बिछाए कैसे अपना हाल बताए कैसे सूरज है तपता ग़ुस्से में उस की आग बुझाए कैसे सुर्ख़ है अब आँखें भी उस की ख़ुद को उस से छुपाए कैसे अपना हाल बताए कैसे घर की नहीं है मकानों की होड़ वुसअत अपनी बचाए कैसे सिमटी शक्ल दिखाए कैसे अपना हाल बताए कैसे पेड़ भी काटे पर्बत तोड़े शाख़ें तोड़ीं दरिया मोड़े दस्त-ओ-बाज़ू बचाए कैसे अपना हाल बताए कैसे बढ़ते ही सारे जाते हैं रेंगते इंसाँ रेंगते वाहन लर्ज़िश इतनी दबाए कैसे अपना हाल बताए कैसे अब तो बहती नदियाँ काली बहता ज़हर है दरिया दरिया ख़ुद की प्यास बुझाए कैसे अपना हाल बताए कैसे
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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??
Shadab Javed
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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'हमारी बे-वफ़ा हम सफ़र' बे-सबब प्यार करते हैं तुझ से हम ने ये भी जताया नहीं है कब से तू ने निकाला है दिल से तू ने अब तक बताया नहीं है अपने चेहरे से चिलमन हटा ले हम ने जी भर के देखा नहीं है प्यार होगा मुकम्मल ये कैसे साथ तू ने निभाया नहीं है हम तेरे हैं तेरे ही रहेंगे तू ने अपना ही समझा नहीं है हम तो मजनूँ हुए तेरी ख़ातिर तुझ को हम ने सताया नहीं है प्यार के तोहफ़े हम ने जो दी हैं तू ने उस को भी रक्खा नहीं है रंजिशों में ही छोड़ा है तू ने हम ने मातम मनाया नहीं है बे-वफ़ा तू है 'दानिश' के दिल में तेरे दिल में क्यूँ 'दानिश' नहीं है तेरी ख़ातिर ये जाँ भी है हाज़िर तुझ को जुमला सुनाया नहीं है
Danish Balliavi
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"बादल और आँसू" सीख लो बादल से आँसू को बहाना हो न आँसू गिरने का कोई ठिकाना वज्ह हो कोई हो कोई फिर ज़माना ग़म न कोई हो न ख़ुद को हो मनाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना अपने मातम में सभी को यूँँ भिगाना सब को ही ग़म-ख़्वार तुम अपना बनाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना अपने आँसू से ज़मीं को यूँँ भिगाना दूर से ही नक़्श तुम अपना बनाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना धुन सुरीली कोई बूँदों से बनाना रोते रोते तुम भी नग़्मा कोई गाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना यूँँ बहा के आँसू तुम ख़ुद को मिटाना सीख लो बादल से हस्ती को मिटाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना
Sanjay Bhat
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"विधाता" न पूछ मुझ से तू हाल दिल का न पूछ मुझ से कि कौन हूँ मैं न पूछ मुझ से कि मैं कहाँ हूँ मैं एक ज़र्रा हूँ दर-ब-दर सा तेरी ही राहों में हूँ मैं उलझा तेरी ही चाहत में हूँ मैं धुँदला न पूछ मुझ से तू हाल दिल का कि धूप से कब तलक मैं छुपता कि छाँव को कब तलक मैं तकता सो मैं चला हूँ तेरी ही जानिब तू आख़िरी सच तू ही विधाता
Sanjay Bhat
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"1947 की तक़्सीम और इंसाँ" इंसाँ कुछ यहाँ से निकले वहाँ से कुछ आए एक दूजे से मिले लेकिन सरहद के साए इंसाँ काटे इंसाँ को और कोहराम मचाए कुछ ज़ख़्मी कुछ मर गए किस को कौन बचाए कुछ ज़िंदा कुछ मुर्दा राह में गिरते जाए जिस्म ही जिस्म हैं रूह कहीं न नज़र आ पाए कौन किसे अब देखे सँभाले समझाए होश ही गुम है होश कहाँ से अब लाए ख़ून से धरती माँ सुर्ख़ अब होती जाए रोते हैं बच्चे कई माँ कहाँ है हाए ज़र्द से चेहरे उजड़ी हवाएँ नज़र को न भाए ताज़ा कोई हवा बस इस सरहद को मिटाए
Sanjay Bhat
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"कश्मीर- एक पानी का बुलबुला" रेत की एक गर्म चादर पर एक पानी का बुलबुला है ये आप कश्मीर जिस को कहते हैं जन्नत-ए-बे-नज़ीर कहते हैं सच कहें तो ये बुलबुला है वो वक़्त-बे-वक़्त फूटता है जो और इस बुलबुले के फूटने से एक तूफ़ान ऐसा उठता है जिस की ज़ालिम गिरिफ़्त में आ कर जाने कितने ही घर तबाह हुए कुछ तो घर छोड़ के चले ही गए खेत और बाग़ भी वो छोड़ चले ख़ौफ़ की महफ़िलों से दूर कहीं टेंट में रहने को ज़लील हुए रंग चेहरों के धुल गए सब के लोग अपनों से दूर दूर हुए ख़्वाब कितने ही चूर चूर हुए मौत का खेल भी तो खेला गया क़त्ल कुछ लोग भी हुए हैं यहाँ बच गए जो वो दिल-मलूल हुए ज़ेहनी बीमारियों से चूर हुए अब खंडर हो गए हैं वो जो कभी घर थे खिलते हुए महकते हुए लोग कुछ आज भी ख़मोश हैं क्यूँ जैसे कुछ भी यहाँ हुआ ही नहीं ये ही कह के जहाँ में सब चुप हैं बुलबुला ये तो फूटना ही था फिर बनेगा ये फिर से फूटेगा किस का इस में है हाथ मत पूछो हाथ माज़ी की कुछ ख़ताओं का है किसी ज़ाती मफ़ाद की ख़ातिर एक चादर को गर्म रक्खा गया ताकि ये बुलबुला सदा ही फटे और तूफ़ान का सबब ये बने फिर किसी माँ की आँख नम ही रहे उम्र भर उस को दर्द-ओ-ग़म ही रहे
Sanjay Bhat
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"पत्ता और गुल" ख़ुश्क पत्ता हूँ जो गुल बनने चला था पर उसी डाली पे मैं भी तो खिला था क्यूँ न आई मुझ से ख़ुशबू गुल के जैसी यूँँ तो मैं भी साथ उन के ही पला था रंग था मेरा तो बस इक ही तरह का रंग हर गुल को चटक सा भी मिला था सब ने रौंदा क्यूँ गिरा जो शाख़ से मैं यूँँ उसी सूरज से मैं भी तो जला था वो ही मिट्टी थी रहा मौसम भी वो ही क्या निहाँ था फिर कि जिस शय ने छला था
Sanjay Bhat
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