nazmKuch Alfaaz

"कश्मीर- एक पानी का बुलबुला" रेत की एक गर्म चादर पर एक पानी का बुलबुला है ये आप कश्मीर जिस को कहते हैं जन्नत-ए-बे-नज़ीर कहते हैं सच कहें तो ये बुलबुला है वो वक़्त-बे-वक़्त फूटता है जो और इस बुलबुले के फूटने से एक तूफ़ान ऐसा उठता है जिस की ज़ालिम गिरिफ़्त में आ कर जाने कितने ही घर तबाह हुए कुछ तो घर छोड़ के चले ही गए खेत और बाग़ भी वो छोड़ चले ख़ौफ़ की महफ़िलों से दूर कहीं टेंट में रहने को ज़लील हुए रंग चेहरों के धुल गए सब के लोग अपनों से दूर दूर हुए ख़्वाब कितने ही चूर चूर हुए मौत का खेल भी तो खेला गया क़त्ल कुछ लोग भी हुए हैं यहाँ बच गए जो वो दिल-मलूल हुए ज़ेहनी बीमारियों से चूर हुए अब खंडर हो गए हैं वो जो कभी घर थे खिलते हुए महकते हुए लोग कुछ आज भी ख़मोश हैं क्यूँ जैसे कुछ भी यहाँ हुआ ही नहीं ये ही कह के जहाँ में सब चुप हैं बुलबुला ये तो फूटना ही था फिर बनेगा ये फिर से फूटेगा किस का इस में है हाथ मत पूछो हाथ माज़ी की कुछ ख़ताओं का है किसी ज़ाती मफ़ाद की ख़ातिर एक चादर को गर्म रक्खा गया ताकि ये बुलबुला सदा ही फटे और तूफ़ान का सबब ये बने फिर किसी माँ की आँख नम ही रहे उम्र भर उस को दर्द-ओ-ग़म ही रहे

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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'फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है' फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है ख़्वाब सारे टूट कर कहीं सिफ़र जाने को हैं घोंसला वहम-ओ-गुमान का फिर से उजड़ जाने को है ज़ख़्म वो पुराने फिर निखर आने को हैं सारा जहाँ मानो गहरी नींद में सो गया है ये मन मेरा फिर उन हसीं यादों में खो गया है क़लम जैसे फिर कोई नज़्म लिखने की ज़िद पे अड़ी है शरीफ़ दिल की ये आदत आज भी बहुत बुरी है आँखों से नींद फिर गुम सी गई है सीने में धड़कन जैसे थम सी गई है ये चंचल हवाऍं ये गुम सुम घटाऍं मुझे ख़ुद से कहीं दूर ले जा रही हैं वो सुनसान सड़कें वो वीरान गलियाँ मुझे फिर से अपने पास बुला रही हैं हरेक परवाने को जैसे बस शमा' की तलाश है लहरों के मन में भी कोई अधूरी सी प्यास है सितारे अब चमक चमक कर थक से गए हैं पत्ते भी पूरी तरह शबनम से लिपट गए हैं वक़्त जैसे रेत की तरह फिसल रहा है चाँद तेजी से फ़लक की ओर बढ़ रहा है ये सुकून-ए-अँधेरा फिर से उतर जाने को है ये ख़ूब-सूरत नज़ारे फिर से बिखर जाने को हैं फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है

Rehaan

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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

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एक सहेली की नसीहत तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मानकर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम सेे पहले भी ऐसा ही इक ख़्वाब, झूटी तसल्ली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो, तुम सेे पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है शाइ'र हवा की हथेली पे लिक्खी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सहरा में रमन करने वाला हिरन है शोबदा साज़ सुब्ह की पहली किरन है अदबगाह-ए-उल्फ़त का मेमार है वो तो शाइ'र है शाइ'र को बस फ़िक्र-ए-लौह-ए-कलम है उसे कोई दुख है किसी का ना ग़म है वो तो शाइ'र है शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से शाइ'र तो ख़ुद शहसवार-ए-अजल है उसे किस तरह टाल सकता है कोई, के वो तो अटल है मैं उसे जानती हूँ, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारे से वापस पलटते हुए मेरी खुरदुरी एड़ियों पर लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुई शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़्में कशीदी जिन्हें पढ़ के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसअला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली तुम मेरी बात मानो तुम उसे जानती ही नहीं वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई उसी की ही एक नज़्म हो

Tehzeeb Hafi

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"है प्यार कितना" जब उस ने पूछा, है प्यार कितना? बताया मैं ने हवाओं जितना या उतना जितने हैं फूल जग में या शायद उतना हैं रंग जितने या फिर है उतना है रेत जितनी या सारी नदियों का सारा पानी, ये नभ में तारे, ये पेड़ सारे, ये जितनी डालों पे बैठे पंछी हैं सारी आँखों में ख़्वाब जितने हैं जितने राही हैं जितने रस्ते है जितना भी सब जहान भर में बहुत ही कम है ये उस की निस्बत जो प्यार तुम सेे किया है मैं ने, अगर मोहब्बत को तोल पाता तो फिर याकीनन तुम्हें दिखाता, है प्यार कितना है प्यार कितना

Hasan Raqim

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"बादल और आँसू" सीख लो बादल से आँसू को बहाना हो न आँसू गिरने का कोई ठिकाना वज्ह हो कोई हो कोई फिर ज़माना ग़म न कोई हो न ख़ुद को हो मनाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना अपने मातम में सभी को यूँँ भिगाना सब को ही ग़म-ख़्वार तुम अपना बनाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना अपने आँसू से ज़मीं को यूँँ भिगाना दूर से ही नक़्श तुम अपना बनाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना धुन सुरीली कोई बूँदों से बनाना रोते रोते तुम भी नग़्मा कोई गाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना यूँँ बहा के आँसू तुम ख़ुद को मिटाना सीख लो बादल से हस्ती को मिटाना सीख लो बादल से आँसू को बहाना

Sanjay Bhat

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"विधाता" न पूछ मुझ से तू हाल दिल का न पूछ मुझ से कि कौन हूँ मैं न पूछ मुझ से कि मैं कहाँ हूँ मैं एक ज़र्रा हूँ दर-ब-दर सा तेरी ही राहों में हूँ मैं उलझा तेरी ही चाहत में हूँ मैं धुँदला न पूछ मुझ से तू हाल दिल का कि धूप से कब तलक मैं छुपता कि छाँव को कब तलक मैं तकता सो मैं चला हूँ तेरी ही जानिब तू आख़िरी सच तू ही विधाता

Sanjay Bhat

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"पत्ता और गुल" ख़ुश्क पत्ता हूँ जो गुल बनने चला था पर उसी डाली पे मैं भी तो खिला था क्यूँ न आई मुझ से ख़ुशबू गुल के जैसी यूँँ तो मैं भी साथ उन के ही पला था रंग था मेरा तो बस इक ही तरह का रंग हर गुल को चटक सा भी मिला था सब ने रौंदा क्यूँ गिरा जो शाख़ से मैं यूँँ उसी सूरज से मैं भी तो जला था वो ही मिट्टी थी रहा मौसम भी वो ही क्या निहाँ था फिर कि जिस शय ने छला था

Sanjay Bhat

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धरती की मौजूदा हालत अपना हाल बताए कैसे पाँव की थप थप जिस्म की हरकत सब की राह बनाए कैसे अपना हाल बताए कैसे शोर मशीनों और लोगों का अपना साज़ सुनाए कैसे धुन जो दबी है जगाए कैसे अपना हाल बताए कैसे गर्द धुआँ सब घेर के बैठे बादल फिर से बिछाए कैसे अपना हाल बताए कैसे सूरज है तपता ग़ुस्से में उस की आग बुझाए कैसे सुर्ख़ है अब आँखें भी उस की ख़ुद को उस से छुपाए कैसे अपना हाल बताए कैसे घर की नहीं है मकानों की होड़ वुसअत अपनी बचाए कैसे सिमटी शक्ल दिखाए कैसे अपना हाल बताए कैसे पेड़ भी काटे पर्बत तोड़े शाख़ें तोड़ीं दरिया मोड़े दस्त-ओ-बाज़ू बचाए कैसे अपना हाल बताए कैसे बढ़ते ही सारे जाते हैं रेंगते इंसाँ रेंगते वाहन लर्ज़िश इतनी दबाए कैसे अपना हाल बताए कैसे अब तो बहती नदियाँ काली बहता ज़हर है दरिया दरिया ख़ुद की प्यास बुझाए कैसे अपना हाल बताए कैसे

Sanjay Bhat

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मिट्टी और पेड़ की जड़ पेड़ की जड़ को देखा है कैसे मिट्टी को पकड़े रहती है और जब मिट्टी को इस क़ुर्बत का एहसास होता है तो जड़ को अपना रंग दे देती है

Sanjay Bhat

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