"है प्यार कितना" जब उस ने पूछा, है प्यार कितना? बताया मैं ने हवाओं जितना या उतना जितने हैं फूल जग में या शायद उतना हैं रंग जितने या फिर है उतना है रेत जितनी या सारी नदियों का सारा पानी, ये नभ में तारे, ये पेड़ सारे, ये जितनी डालों पे बैठे पंछी हैं सारी आँखों में ख़्वाब जितने हैं जितने राही हैं जितने रस्ते है जितना भी सब जहान भर में बहुत ही कम है ये उस की निस्बत जो प्यार तुम सेे किया है मैं ने, अगर मोहब्बत को तोल पाता तो फिर याकीनन तुम्हें दिखाता, है प्यार कितना है प्यार कितना
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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"मुलाक़ात" बहुत दिन हो गए मिल के इक अर्से बा'द आए हो ज़माना कैसे गुज़रा है कोई हमराज़ अपना है तुम्हारे दिल में अब तक तो कली इक खिल गई होगी कोई तो मिल गई होगी हाँ बिल्कुल मिल गई है ना बहुत ही ख़ूब-सूरत सी तुम्हारे जैसी इक लड़की बहुत ही नर्म लहजा है कभी ख़ुद कुछ नहीं कहती हमेशा मेरी सुनती है ये दिन जब ढलने लगता है मुझे जब नींद आती है वो बन के ख़्वाब सा कोई मेरी आँखों में आती है है इक लड़की तुम्हीं जैसी मेरी नींदें चुराती है भला अब झूठ क्या बोलूँ मेरे जीवन की वो लड़की हक़ीक़त में तो तुम ही हो मेरी यादों में रहते हो
Hasan Raqim
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"तुम मेरे हो" आँखों से ओझल कोनो में दूर सयारों से तारों से करता हूँ मैं जिस की बातें वो तुम हो और तुम मेरे हो हर इक शे'र का मौज़ू तुम हो हर लेखन है रंग तुम्हारा हर इक फूल तुम्हीं को चाहे हर इक डाल का तुम हो साया इन ग़ज़लों में याद बसर है इन ग़ज़लों में इश्क़ छुपा है है इन सब में फ़िक्र तुम्हारी है इन सब में ज़िक्र तुम्हारा कौन तुम्हें लेकिन बतलाए कौन तुम्हें ये सब समझाए तुम ये कहना दोस्त ही हैं बस मैं कह दूँगा तुम मेरे हो
Hasan Raqim
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"वो" कुछ ऐसा रो'ब था उस का तमाम लोगों पर लबों से निकली हर इक बात उस की चलती थी वो जिस की आँच से तूफ़ान ख़ौफ़ खाता था वो एक लौ जो हवाओं के साथ जलती थी कभी हवा की तरह हाथ ही नहीं लगती, कभी वो बर्फ़ सी हाथों में आ पिघलती थी दिलों को उस ने सभी के यूँँ घेर रक्खा था कि उस की बात ही हर बात पर निकलती थी मुसीबतों में सभी रास्ता बदलते थे, मगर वो थी जो मेरे साथ-साथ चलती थी अब उस के बा'द ये हालात हैं तो लगता है, कि उस के साथ मुलाक़ात एक ग़लती थी
Hasan Raqim
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"उस के नाम का पत्थर" इस शहर से दूर एक सहरा है जिस में एक दरिया के किनारे पर मैं बैठा राह तकता हूँ तुम्हारी कब तुम आजाओ किसी पल और देखो आज कुछ ऐसा हुआ है जिस से सब हैरत में हैं ये पेड़ की सूखी हुई टेहनी पे बैठे पंछियों में अफ़रा तफ़री सी मची है रेत जैसे इन हवाओं की धुनों में झूमती हो और मुझ सेे पूछती हो कौन है वो जिस की यादों में मैं रोज़ाना यहाँ आ कर के पत्थर फेंकता हूँ? मैं मगर चुप हूँ तुम्हारी राह तकता हूँ मन ही मन में मैं ये कहते हुए मुस्कान भरता हूँ शहर से दूर एक सहरा के बीचो बीच में गर तुम चले आओ किसी दिन तो तुम्हें भी मैं दिखाऊँगा वो दरिया जिस में उस के नाम का पत्थर नहीं डूबा
Hasan Raqim
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“अलार्म” धूप कुछ मिली ही थी फूल कुछ खिले ही थे दूरियाँ हटी ही थीं और हम मिले ही थे फिर ख़याल माज़ी के एक अलार्म की तरहा नींद से जगा बैठे ख़्वाब इक मिटा बैठे फासले बढ़ा बैठे
Hasan Raqim
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