nazmKuch Alfaaz

"उस के नाम का पत्थर" इस शहर से दूर एक सहरा है जिस में एक दरिया के किनारे पर मैं बैठा राह तकता हूँ तुम्हारी कब तुम आजाओ किसी पल और देखो आज कुछ ऐसा हुआ है जिस से सब हैरत में हैं ये पेड़ की सूखी हुई टेहनी पे बैठे पंछियों में अफ़रा तफ़री सी मची है रेत जैसे इन हवाओं की धुनों में झूमती हो और मुझ सेे पूछती हो कौन है वो जिस की यादों में मैं रोज़ाना यहाँ आ कर के पत्थर फेंकता हूँ? मैं मगर चुप हूँ तुम्हारी राह तकता हूँ मन ही मन में मैं ये कहते हुए मुस्कान भरता हूँ शहर से दूर एक सहरा के बीचो बीच में गर तुम चले आओ किसी दिन तो तुम्हें भी मैं दिखाऊँगा वो दरिया जिस में उस के नाम का पत्थर नहीं डूबा

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

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"मुलाक़ात" बहुत दिन हो गए मिल के इक अर्से बा'द आए हो ज़माना कैसे गुज़रा है कोई हमराज़ अपना है तुम्हारे दिल में अब तक तो कली इक खिल गई होगी कोई तो मिल गई होगी हाँ बिल्कुल मिल गई है ना बहुत ही ख़ूब-सूरत सी तुम्हारे जैसी इक लड़की बहुत ही नर्म लहजा है कभी ख़ुद कुछ नहीं कहती हमेशा मेरी सुनती है ये दिन जब ढलने लगता है मुझे जब नींद आती है वो बन के ख़्वाब सा कोई मेरी आँखों में आती है है इक लड़की तुम्हीं जैसी मेरी नींदें चुराती है भला अब झूठ क्या बोलूँ मेरे जीवन की वो लड़की हक़ीक़त में तो तुम ही हो मेरी यादों में रहते हो

Hasan Raqim

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"तुम मेरे हो" आँखों से ओझल कोनो में दूर सयारों से तारों से करता हूँ मैं जिस की बातें वो तुम हो और तुम मेरे हो हर इक शे'र का मौज़ू तुम हो हर लेखन है रंग तुम्हारा हर इक फूल तुम्हीं को चाहे हर इक डाल का तुम हो साया इन ग़ज़लों में याद बसर है इन ग़ज़लों में इश्क़ छुपा है है इन सब में फ़िक्र तुम्हारी है इन सब में ज़िक्र तुम्हारा कौन तुम्हें लेकिन बतलाए कौन तुम्हें ये सब समझाए तुम ये कहना दोस्त ही हैं बस मैं कह दूँगा तुम मेरे हो

Hasan Raqim

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"वो" कुछ ऐसा रो'ब था उस का तमाम लोगों पर लबों से निकली हर इक बात उस की चलती थी वो जिस की आँच से तूफ़ान ख़ौफ़ खाता था वो एक लौ जो हवाओं के साथ जलती थी कभी हवा की तरह हाथ ही नहीं लगती, कभी वो बर्फ़ सी हाथों में आ पिघलती थी दिलों को उस ने सभी के यूँँ घेर रक्खा था कि उस की बात ही हर बात पर निकलती थी मुसीबतों में सभी रास्ता बदलते थे, मगर वो थी जो मेरे साथ-साथ चलती थी अब उस के बा'द ये हालात हैं तो लगता है, कि उस के साथ मुलाक़ात एक ग़लती थी

Hasan Raqim

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"है प्यार कितना" जब उस ने पूछा, है प्यार कितना? बताया मैं ने हवाओं जितना या उतना जितने हैं फूल जग में या शायद उतना हैं रंग जितने या फिर है उतना है रेत जितनी या सारी नदियों का सारा पानी, ये नभ में तारे, ये पेड़ सारे, ये जितनी डालों पे बैठे पंछी हैं सारी आँखों में ख़्वाब जितने हैं जितने राही हैं जितने रस्ते है जितना भी सब जहान भर में बहुत ही कम है ये उस की निस्बत जो प्यार तुम सेे किया है मैं ने, अगर मोहब्बत को तोल पाता तो फिर याकीनन तुम्हें दिखाता, है प्यार कितना है प्यार कितना

Hasan Raqim

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“अलार्म” धूप कुछ मिली ही थी फूल कुछ खिले ही थे दूरियाँ हटी ही थीं और हम मिले ही थे फिर ख़याल माज़ी के एक अलार्म की तरहा नींद से जगा बैठे ख़्वाब इक मिटा बैठे फासले बढ़ा बैठे

Hasan Raqim

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