गोलियों से ये जवाँ आग न बुझ पाएगी गैस फेंकोगे तो कुछ और भी लहराएगी ये जवाँ आग जो हर शहर में जाग उट्ठी है तीरगी देख के इस आग को भाग उट्ठी है कब तलक इस से बचाओगे तुम अपने दामाँ ये जवाँ आग जला देगी तुम्हारे ऐवाँ ये जवाँ ख़ून बहाएा है जो तुम ने अक्सर ये जवाँ ख़ून निकल आया है बन के लश्कर ये जवाँ ख़ून सियह-रात का रहने देगा दुख में डूबे हुए हालात न रहने देगा ये जवाँ ख़ून है महलों पे लपकता तूफ़ाँ उस की यलग़ार से हर अहल-ए-सितम है लर्ज़ां ये जवाँ फ़िक्र तुम्हें ख़ून न पीने देगी ग़ासिबो अब न तुम्हें चैन से जीने देगी क़ातिलो राह से हट जाओ कि हम आते हैं अपने हाथों में लिए सुर्ख़ अलम आते हैं तोड़ देगी ये जवाँ फ़िक्र हिसार-ए-ज़िन्दाँ जाग उट्ठे हैं मिरे देस के बेकस इंसाँ
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है" गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है ज़मीं पाँव निगलती जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है परी आगे निकलती जा रही है सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं हवा मोअत्तर होती जा रही है चमकती जा रही है कोई मछली समुंदर बर्फ़ करती जा रही है मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है
Ammar Iqbal
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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"मुझ सेे पहले" मुझ सेे पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा खो चुका है जो किसी और की रा'नाई में शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में मैं ने माना कि शब-ओ-रोज़ के हंगामों में वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ता चाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़ मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशीमाँ हो कर तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ
Ahmad Faraz
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पूछ न क्या लाहौर में देखा हम ने मियाँ-'नज़ीर' पहनें सूट अंग्रेज़ी बोलें और कहलाएँ 'मीर' चौधरियों की मुट्ठी में है शाइ'र की तक़दीर रोए भगत कबीर इक-दूजे को जाहिल समझें नट-खट बुद्धीवान मेट्रो में जो चाय पिलाए बस वो बाप समान सब से अच्छा शाइ'र वो है जिस का यार मुदीर रोए भगत कबीर सड़कों पर भूके फिरते हैं शाइ'र मूसीक़ार एक्ट्रसों के बाप लिए फिरते हैं मोटर-कार फ़िल्म-नगर तक आ पहुँचे हैं सय्यद पीर फ़क़ीर रोए भगत कबीर लाल-दीन की कोठी देखी रंग भी जिस का लाल शहर में रह कर ख़ूब उड़ाए दहक़ानों का माल और कहे अज्दाद ने बख़्शी मुझ को ये जागीर रोए भगत कबीर जिस को देखो लीडर है और से मिलो वकील किसी तरह भरता ही नहीं है पेट है उन का झील मजबूरन सुनना पड़ती है उन सब की तक़दीर रोए भगत कबीर महफ़िल से जो उठ कर जाए कहलाए वो बोर अपनी मस्जिद की ता'रीफ़ें बाक़ी जूते-चोर अपना झंग भला है प्यारे जहाँ हमारी हीर रोए भगत कबीर
Habib Jalib
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ये एक अहद-ए-सज़ा है जज़ा की बात न कर दुआ से हाथ उठा रख दवा की बात न कर ख़ुदा के नाम पे ज़ालिम नहीं ये ज़ुल्म रवा मुझे जो चाहे सज़ा दे ख़ुदा की बात न कर हयात अब तो इन्हीं महबसों में गुज़रेगी सितमगरों से कोई इल्तिजा की बात न कर उन्हीं के हाथ में पत्थर हैं जिन को प्यार किया ये देख हश्र हमारा वफ़ा की बात न कर अभी तो पाई है मैं ने रिहाई रहज़न से भटक न जाऊँ मैं फिर रहनुमा की बात न कर बुझा दिया है हवा ने हर एक दया का दिया न ढूँड अहल-ए-करम को दया की बात न कर नुज़ूल-ए-हब्स हुआ है फ़लक से ऐ 'जालिब' घुटा घुटा ही सही दम घटा की बात न कर
Habib Jalib
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मैं तुझे फूल कहूँ और कहूँ भंवरो से आओ उस फूल का रस चूस के नाचो-झूमो मैं तुझे शम्अ'' कहूँ और कहूँ परवानो आओ उस शम्अ'' के होंटों को ख़ुशी से चूमो मैं तिरी आँख को तश्बीह दूँ मयख़ाने से और ख़ुद ज़हर-ए-जुदाई का तलबगार रहूँ ग़ैर सोए तिरी ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव में और मैं चाँदनी रातों मैं फ़क़त शे'र कहूँ मुझ से ये तेरे क़सीदे न लिखे जाएँगे मुझ से तेरे लिए ये ग़ज़लें न कही जाएँगी याद में तेरी मैं सुलगा न सकूँगा आँखें सख़्तियाँ दर्द की मुझ से न सही जाएँगी शहर में ऐसे मुसव्विर हैं जो सिक्कों के एवज़ हुस्न में लैला-ओ-अज़रा से बढ़ा देंगे तुझे तूल दे कर तिरी ज़ुल्फ़ों को शब-ए-ग़म की तरह फ़न के ए'जाज़ से नागिन सी बना देंगे तुझे तुझ को शहर की ज़रूरत है मोहब्बत की मुझे ऐ हसीना तिरी मंज़िल मिरी मंज़िल में नहीं नाच घर तेरी निगाहों में हैं रक़्साँ लेकिन इस तअ'य्युश की तमन्नाएँ मिरे दिल में नहीं देख के ग़ैर के पहलू में तुझे रक़्स-कुनाँ भीग जाती है मिरी आँख सरिश्क-ए-ग़म से मुझ को बरसों की ग़ुलामी का ख़याल आता है जिस ने अंदाज़-ए-वफ़ा छीन लिया है हम से मुझ को भँवरा न समझ मुझ को पतंगा न समझ मुझ को इंसान समझ मेरी सदाक़त से न खेल तेरी तफ़रीह का सामाँ न बनूँगा हरगिज़ मेरी दुनिया है यही मेरी मोहब्बत से न खेल
Habib Jalib
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जो हो न सकी बात वो चेहरों से अयां थी हालात का मातम था मुलाक़ात कहाँ थी उस ने न ठहरने दिया पहरों मिरे दिल को जो तेरी निगाहों में शिकायत मिरी जाँ थी घर में भी कहाँ चैन से सोए थे कभी हम जो रात है ज़िंदां में वही रात वहाँ थी यकसां हैं मिरी जान क़फ़स और नशेमन इंसान की तौक़ीर यहाँ है न वहाँ थी शाहों से जो कुछ रब्त न क़ाएम हुआ अपना आदत का भी कुछ जब्र था कुछ अपनी ज़बां थी सय्याद ने यूँ ही तो क़फ़स में नहीं डाला मशहूर गुलिस्ताँ में बहुत मेरी फ़ुग़ाँ थी तू एक हक़ीक़त है मिरी जाँ मिरी हमदम जो थी मिरी ग़ज़लों में वो इक वहम-ओ-गुमां थी महसूस किया मैं ने तिरे ग़म से ग़म-ए-दहर वर्ना मिरे अश'आर में ये बात कहाँ थी
Habib Jalib
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ऐ निज़ाम-ए-कोहन के फ़रज़ंदो ऐ शब-ए-तार के जिगर-बंदो ये शब-ए-तार जावेदाँ तो नहीं ये शब-ए-तार जाने वाली है ता-ब-कै तीरगी के अफ़्साने सुब्ह-ए-नौ मुस्कुराने वाली है ऐ शब-ए-तार के जिगर-गोशो ऐ सहर-दुश्मनो सितम-गोशो सुब्ह का आफ़्ताब चमकेगा टूट जाएगा जहल का जादू फैल जाएगी इन दयारों में इल्म-ओ-दानिश की रौशनी हर-सू ऐ शब-ए-तार के निगहबानो शम-ए-अहद-ए-ज़ियाँ के परवानो शहर-ए-ज़ुल्मात के सना-ख़्वानो शहर-ए-ज़ुल्मात को सबात नहीं और कुछ देर सुब्ह पर हँस लो और कुछ देर कोई बात नहीं
Habib Jalib
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