ऐ निज़ाम-ए-कोहन के फ़रज़ंदो ऐ शब-ए-तार के जिगर-बंदो ये शब-ए-तार जावेदाँ तो नहीं ये शब-ए-तार जाने वाली है ता-ब-कै तीरगी के अफ़्साने सुब्ह-ए-नौ मुस्कुराने वाली है ऐ शब-ए-तार के जिगर-गोशो ऐ सहर-दुश्मनो सितम-गोशो सुब्ह का आफ़्ताब चमकेगा टूट जाएगा जहल का जादू फैल जाएगी इन दयारों में इल्म-ओ-दानिश की रौशनी हर-सू ऐ शब-ए-तार के निगहबानो शम-ए-अहद-ए-ज़ियाँ के परवानो शहर-ए-ज़ुल्मात के सना-ख़्वानो शहर-ए-ज़ुल्मात को सबात नहीं और कुछ देर सुब्ह पर हँस लो और कुछ देर कोई बात नहीं
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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ये एक अहद-ए-सज़ा है जज़ा की बात न कर दुआ से हाथ उठा रख दवा की बात न कर ख़ुदा के नाम पे ज़ालिम नहीं ये ज़ुल्म रवा मुझे जो चाहे सज़ा दे ख़ुदा की बात न कर हयात अब तो इन्हीं महबसों में गुज़रेगी सितमगरों से कोई इल्तिजा की बात न कर उन्हीं के हाथ में पत्थर हैं जिन को प्यार किया ये देख हश्र हमारा वफ़ा की बात न कर अभी तो पाई है मैं ने रिहाई रहज़न से भटक न जाऊँ मैं फिर रहनुमा की बात न कर बुझा दिया है हवा ने हर एक दया का दिया न ढूँड अहल-ए-करम को दया की बात न कर नुज़ूल-ए-हब्स हुआ है फ़लक से ऐ 'जालिब' घुटा घुटा ही सही दम घटा की बात न कर
Habib Jalib
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पूछ न क्या लाहौर में देखा हम ने मियाँ-'नज़ीर' पहनें सूट अंग्रेज़ी बोलें और कहलाएँ 'मीर' चौधरियों की मुट्ठी में है शाइ'र की तक़दीर रोए भगत कबीर इक-दूजे को जाहिल समझें नट-खट बुद्धीवान मेट्रो में जो चाय पिलाए बस वो बाप समान सब से अच्छा शाइ'र वो है जिस का यार मुदीर रोए भगत कबीर सड़कों पर भूके फिरते हैं शाइ'र मूसीक़ार एक्ट्रसों के बाप लिए फिरते हैं मोटर-कार फ़िल्म-नगर तक आ पहुँचे हैं सय्यद पीर फ़क़ीर रोए भगत कबीर लाल-दीन की कोठी देखी रंग भी जिस का लाल शहर में रह कर ख़ूब उड़ाए दहक़ानों का माल और कहे अज्दाद ने बख़्शी मुझ को ये जागीर रोए भगत कबीर जिस को देखो लीडर है और से मिलो वकील किसी तरह भरता ही नहीं है पेट है उन का झील मजबूरन सुनना पड़ती है उन सब की तक़दीर रोए भगत कबीर महफ़िल से जो उठ कर जाए कहलाए वो बोर अपनी मस्जिद की ता'रीफ़ें बाक़ी जूते-चोर अपना झंग भला है प्यारे जहाँ हमारी हीर रोए भगत कबीर
Habib Jalib
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मैं तुझे फूल कहूँ और कहूँ भंवरो से आओ उस फूल का रस चूस के नाचो-झूमो मैं तुझे शम्अ'' कहूँ और कहूँ परवानो आओ उस शम्अ'' के होंटों को ख़ुशी से चूमो मैं तिरी आँख को तश्बीह दूँ मयख़ाने से और ख़ुद ज़हर-ए-जुदाई का तलबगार रहूँ ग़ैर सोए तिरी ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव में और मैं चाँदनी रातों मैं फ़क़त शे'र कहूँ मुझ से ये तेरे क़सीदे न लिखे जाएँगे मुझ से तेरे लिए ये ग़ज़लें न कही जाएँगी याद में तेरी मैं सुलगा न सकूँगा आँखें सख़्तियाँ दर्द की मुझ से न सही जाएँगी शहर में ऐसे मुसव्विर हैं जो सिक्कों के एवज़ हुस्न में लैला-ओ-अज़रा से बढ़ा देंगे तुझे तूल दे कर तिरी ज़ुल्फ़ों को शब-ए-ग़म की तरह फ़न के ए'जाज़ से नागिन सी बना देंगे तुझे तुझ को शहर की ज़रूरत है मोहब्बत की मुझे ऐ हसीना तिरी मंज़िल मिरी मंज़िल में नहीं नाच घर तेरी निगाहों में हैं रक़्साँ लेकिन इस तअ'य्युश की तमन्नाएँ मिरे दिल में नहीं देख के ग़ैर के पहलू में तुझे रक़्स-कुनाँ भीग जाती है मिरी आँख सरिश्क-ए-ग़म से मुझ को बरसों की ग़ुलामी का ख़याल आता है जिस ने अंदाज़-ए-वफ़ा छीन लिया है हम से मुझ को भँवरा न समझ मुझ को पतंगा न समझ मुझ को इंसान समझ मेरी सदाक़त से न खेल तेरी तफ़रीह का सामाँ न बनूँगा हरगिज़ मेरी दुनिया है यही मेरी मोहब्बत से न खेल
Habib Jalib
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देना पड़े कुछ ही हर्जाना सच ही लिखते जाना मत घबराना मत डर जाना सच ही लिखते जाना बातिल की मुँह-ज़ोर हवा से जो न कभी बुझ पाएँ वो शमएँ रौशन कर जाना सच ही लिखते जाना पल दो पल के ऐश की ख़ातिर क्या देना क्या झुकना आख़िर सब को है मर जाना सच ही लिखते जाना लौह-ए-जहाँ पर नाम तुम्हारा लिखा रहेगा यूँँही 'जालिब' सच का दम भर जाना सच ही लिखते जाना
Habib Jalib
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गोलियों से ये जवाँ आग न बुझ पाएगी गैस फेंकोगे तो कुछ और भी लहराएगी ये जवाँ आग जो हर शहर में जाग उट्ठी है तीरगी देख के इस आग को भाग उट्ठी है कब तलक इस से बचाओगे तुम अपने दामाँ ये जवाँ आग जला देगी तुम्हारे ऐवाँ ये जवाँ ख़ून बहाएा है जो तुम ने अक्सर ये जवाँ ख़ून निकल आया है बन के लश्कर ये जवाँ ख़ून सियह-रात का रहने देगा दुख में डूबे हुए हालात न रहने देगा ये जवाँ ख़ून है महलों पे लपकता तूफ़ाँ उस की यलग़ार से हर अहल-ए-सितम है लर्ज़ां ये जवाँ फ़िक्र तुम्हें ख़ून न पीने देगी ग़ासिबो अब न तुम्हें चैन से जीने देगी क़ातिलो राह से हट जाओ कि हम आते हैं अपने हाथों में लिए सुर्ख़ अलम आते हैं तोड़ देगी ये जवाँ फ़िक्र हिसार-ए-ज़िन्दाँ जाग उट्ठे हैं मिरे देस के बेकस इंसाँ
Habib Jalib
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