nazmKuch Alfaaz

"जम्हूरियत" ये वतन अब भी जलने को मजबूर है और हाकिम नशे में बहुत चूर है इक सियासत की रोटी पे ये पल रहे इनका काफ़ी पुराना ये दस्तूर है आग लगती है जब भी यहाँ से वहाँ ख़ुश तो होते हैं अक्सर ये बे-इंतिहा वो तो लोग और थे जो वतन पर मरे अब तो मिलते नहीं ऐसे भी हम-रहाँ ज़ुल्म वालों की सफ में खड़े दिख रहे चंद सिक्कों की ख़ातिर ही ये बिक रहे साफ़ दामन उन्हीं का अभी तक मिला जो ख़िलाफ़त में इनका ही सच लिख रहे बीच नफ़रत में सब को धकेला गया खेल हम सब से कुछ ऐसा खेला गया सब ने मारा है मिल कर उसी को यहाँ जो भी सड़कों पे अबतक अकेला गया

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चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीना जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

Allama Iqbal

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"मुझ सेे बिछड़ना तेरी मजबूरी सही" मुझ सेे बिछड़ना तेरी मजबूरी सही कुछ भी नहीं तो मीलों की दूरी सही किस ने कहा तर्के वफ़ा करते है हम कब ये कहा तुझ को जुदा करते है हम अपना नहीं अब मैं भी तुम भी गैर हो अब जो हुआ छोड़ो भी आगे ख़ैर हो रश्मो - वफ़ा अब ये भी ज़रूरी ही सही मुझ सेे बिछड़ना तेरी मजबूरी सही ये भी सितम के बावफ़ा हो तुम बहुत ये भी गिला की तुम किसी के हो गए मैं ख़्वाब तुम्हारे सजाता रह गया पर ख़्वाब मेरे सब किसी के हो गए लौटोगे तुम ये आस अब भी बाकी है जाँ जा चुकी है साँस अब भी बाकी है अपनी कहानी फिर कभी पूरी सही मुझ सेे बिछड़ना तेरी मजबूरी सही

karan singh rajput

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"अजनबी शाम" धुँद छाई हुई है झीलों पर उड़ रहे हैं परिंद टीलों पर सब का रुख़ है नशेमनों की तरफ़ बस्तियों की तरफ़ बनों की तरफ़ अपने गल्लों को ले के चरवाहे सरहदी बस्तियों में जा पहुँचे दिल-ए-नाकाम मैं कहाँ जाऊँ अजनबी शाम मैं कहाँ जाऊँ

Jaun Elia

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"एक तरफ़ा प्यार" लिखना चाहता ता ख़त तुझे काफ़ी अरसे से, कुछ थोड़ा लिखता फिर वो काग़ज़ फाड़ देता, अगले दिन फिर नए पन्ने पर कोशिश करता, लेकिन अपने ही ख़यालों को नहीं बटोर पाता, आख़िर एक रात चाय के नशे के दो घूँट पी लिए, और लिख डाला जो रूबरू ना बयान कर पाता फिर रखा उस ख़त को अपने पास काफ़ी दिन, क्या करता आख़िर तुझे देने के लिए लाया बहुत बार साथ में लेकिन दे ही नहीं पाया कभी

Gaurav

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"ज़बाँ-दराज़" मैं अपनी बीमारी बताने से मा'ज़ूर हूँ मुझे ज़बान की अजीब बीमारी हो गई है सो गुफ़्तुगू से परहेज़ करने पर मजबूर हूँ मेरा लहजा करख़्त और आवाज़ भारी हो गई है ज़बान में फ़ी लफ़्ज़ एक इंच इज़ाफ़ा हो रहा है पहले भी तो ये काँधों पर पड़ी थी तुम्हें मेरी मुश्किल का अंदाज़ा हो रहा है तुम जो मुझ से बात करने पर अड़ी थीं आख़िरी तकरार के बा'द मैं ने ज़बान समेट ली है अब मैं एक लफ़्ज़ भी मज़ीद नहीं बोलूँगा खींच-तान कर ज़बान अपने बदन पर लपेट ली है दुआ नहीं करूँँगा गिरह नहीं खोलूँगा हर पस्ली दूसरी पस्ली में धँसती जा रही है मेरी ज़बान मेरे बदन पर कसती जा रही है

Ammar Iqbal

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