nazmKuch Alfaaz

जुदाई मैं बेकसी का कोई इक मज़ार था फिर तुम मिले मेरा वजूद ज़ीस्त पर सवाल था फिर तुम मिले दिल मेरा किस क़दर ये बे-क़रार था फिर तुम मिले कुछ दिल में बाक़ी रह गया मलाल था फिर तुम मिले मंज़िल न कोई रहनुमा न था कोई महबूब ही ये ज़िंदगी तबाह थी न था कोई भी आ समाँँ मुझ में न कोई चाह थी न था कोई भी आशियाँ मैं दर-ब-दर भटक गया मिला मुझे दीवार ही थी चाह कोई चाहे इस क़दर कि फिर मैं जी उठूँ मैं टूट कर बिखर गया मिला मुझे बाज़ार ही किस ने मुझे पनाह दी ये किस ने मुझ को छू लिया दिल किस का है मचल रहा तड़प उठा हूँ मैं यहाँँ आँखों से मेरी बह रहे ये आँसू मेरे तो नहीं ये किस ने मुझ को चाहा मर चुका था फिर मैं जी गया नज़रें उठाई तुम मिले हसीन भी इतने कि मैं सब भूल बैठा अपने सारे रंज-ओ-ग़म फिर खो गया मदहोश ऐसा मैं हुआ उरूज पर जा इश्क़ के देखा न मैं ने डर तुम्हारा डर कि मुझ को खो न दो तो क्या हुआ जुदा हुए मगर मिले तो हम कभी ये कोई इंतिहा नहीं ये इक नया आग़ाज़ है मैं था तुम्हारा हूँ तुम्हारा और मेरे दिल में तुम गर याद आऊंँ मैं कभी छलक पड़े मोती अगर सुन लेना दिल की धड़कनें मिलूंँगा मैं लौ की तरह खो भी गया मैं गर कभी मिलूंँगा ख़ुशबू की तरह मेरे तुम्हारे इश्क़ की ये इक नई परवाज़ है

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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मैं मेरा कमरा और तन्हाई मैं हूँ मेरा कमरा है इक पसरी हुई तन्हाई है कुछ बिखरे से अस्बाब हैं धुॅंदली सी तेरी याद है इक टूटा हुआ आइना है टूटा हुआ मेरा दिल ढलते हुए शब की मेरी बुझती हुई परछाई है कुछ ख़्वाबों की लाशें हैं क़तरा-क़तरा मैं उन लाशों में कुछ दफ़्न किए कुछ जलाए सर्द सियह रातों में बिस्तर मेरा रोता है बेबस आँखों में आँसू मेरे जाएँ तो कहाँँ किस के काँधों पर कोई आंँचल नहीं जो इन्हें छुपाए या पी जाए किसी मय की तरह अब कोई नहीं कौन चाहेगा मुझे मेरी तरह इक क़ब्र ख़यालों का है भीतर मेरे ऐसा कोई हर दिन नई ऊंँचाई पर होता है मगर गहरा भी ख़ामोशी मेरी चीख़ती चिल्लाती है कुछ इस तरह जैसे कोई गूंँगा किसी अपने को पुकारे मगर सुन भी ले तो समझे न कोई उस की सदा जिस तरह कमरा मेरा आलम के मुंसिफ़ नज़रों के जैसा नहीं ये मेरी ख़मोशी को भी चाहता है मेरे ग़म को भी ये मुझ को न कोई भरम देता है न उम्मीद ही बातिल दुनिया की तरह कमरा मेरा सहरा नहीं दिल मेरा अकेला है गर तो क्या हुआ तन्हा नहीं

Tausif Raza

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