nazmKuch Alfaaz

मैं मेरा कमरा और तन्हाई मैं हूँ मेरा कमरा है इक पसरी हुई तन्हाई है कुछ बिखरे से अस्बाब हैं धुॅंदली सी तेरी याद है इक टूटा हुआ आइना है टूटा हुआ मेरा दिल ढलते हुए शब की मेरी बुझती हुई परछाई है कुछ ख़्वाबों की लाशें हैं क़तरा-क़तरा मैं उन लाशों में कुछ दफ़्न किए कुछ जलाए सर्द सियह रातों में बिस्तर मेरा रोता है बेबस आँखों में आँसू मेरे जाएँ तो कहाँँ किस के काँधों पर कोई आंँचल नहीं जो इन्हें छुपाए या पी जाए किसी मय की तरह अब कोई नहीं कौन चाहेगा मुझे मेरी तरह इक क़ब्र ख़यालों का है भीतर मेरे ऐसा कोई हर दिन नई ऊंँचाई पर होता है मगर गहरा भी ख़ामोशी मेरी चीख़ती चिल्लाती है कुछ इस तरह जैसे कोई गूंँगा किसी अपने को पुकारे मगर सुन भी ले तो समझे न कोई उस की सदा जिस तरह कमरा मेरा आलम के मुंसिफ़ नज़रों के जैसा नहीं ये मेरी ख़मोशी को भी चाहता है मेरे ग़म को भी ये मुझ को न कोई भरम देता है न उम्मीद ही बातिल दुनिया की तरह कमरा मेरा सहरा नहीं दिल मेरा अकेला है गर तो क्या हुआ तन्हा नहीं

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

Jaun Elia

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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जुदाई मैं बेकसी का कोई इक मज़ार था फिर तुम मिले मेरा वजूद ज़ीस्त पर सवाल था फिर तुम मिले दिल मेरा किस क़दर ये बे-क़रार था फिर तुम मिले कुछ दिल में बाक़ी रह गया मलाल था फिर तुम मिले मंज़िल न कोई रहनुमा न था कोई महबूब ही ये ज़िंदगी तबाह थी न था कोई भी आ समाँँ मुझ में न कोई चाह थी न था कोई भी आशियाँ मैं दर-ब-दर भटक गया मिला मुझे दीवार ही थी चाह कोई चाहे इस क़दर कि फिर मैं जी उठूँ मैं टूट कर बिखर गया मिला मुझे बाज़ार ही किस ने मुझे पनाह दी ये किस ने मुझ को छू लिया दिल किस का है मचल रहा तड़प उठा हूँ मैं यहाँँ आँखों से मेरी बह रहे ये आँसू मेरे तो नहीं ये किस ने मुझ को चाहा मर चुका था फिर मैं जी गया नज़रें उठाई तुम मिले हसीन भी इतने कि मैं सब भूल बैठा अपने सारे रंज-ओ-ग़म फिर खो गया मदहोश ऐसा मैं हुआ उरूज पर जा इश्क़ के देखा न मैं ने डर तुम्हारा डर कि मुझ को खो न दो तो क्या हुआ जुदा हुए मगर मिले तो हम कभी ये कोई इंतिहा नहीं ये इक नया आग़ाज़ है मैं था तुम्हारा हूँ तुम्हारा और मेरे दिल में तुम गर याद आऊंँ मैं कभी छलक पड़े मोती अगर सुन लेना दिल की धड़कनें मिलूंँगा मैं लौ की तरह खो भी गया मैं गर कभी मिलूंँगा ख़ुशबू की तरह मेरे तुम्हारे इश्क़ की ये इक नई परवाज़ है

Tausif Raza

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